Saturday, 21 December 2019

अब कैसे मेहफ़ूज़ रहेगा भारत.........

जिस मुल्क़ में मवाद, ज़हर की अक्सरियत उस हद तक बढ़ जाए की मुल्क का वज़ीरे दाख़ला के ज़हन में इतना आलूद और गंदगी भरी होगी जब वज़ीरे आज़म के दिलों दिमाग में इतनी गंदगी भरी होगी की वोह कपड़ों से शिद्दत मचाने वालों को पहचान सकतें हैं, फिर मुल्क़ के उस अवाम को ये समझने में देर नहीं करना चाहिये की उनके साथ मज़ीद सख़्त हक़तल्फ़ी होने वाली है. .   वीडियो देखिये.


वज़ीरे आज़म महज़ कपड़ों और चेहरे से आप पहचान सकतें हैं की आग लगाने वाले और दंगा मचाने वाले कौन हैं. तो में आपको सबसे बड़ा बेवक़ूफ़, जाहिल और अनपढ़ कहूंगा.  जिसकी फितरत में ही चाय फ़रोख़्त करना है.  महज़ कपड़ों और चेहरे से आप इंसान का किरदार और अमल नहीं पहचान सकते.  उसके लिए आपको एक आला ज़हन और उस क़िस्म की आला तालीम चाहिए.   आपके मुवाफ़िक़ संघी इस्लामिक लिबास पेहेन कर चेहरा मुसलमानों की तरह अपना कर जुर्म में मुलव्विस रहतें हैं.  जितने भी संघी ऐसे कारनामों में शामिल रहतें हैं वो अपने चेहरे को रूमाल से पोशीदा कर लेते हैं.  दूसरी आपके संघी दूसरों के नामों से इस्लाम, क़ुरान, पैग़म्बर और मुसलमानों को बरजस्ता गाली गलोच करतें हैं.  अक्सर ऐसे फरेबी और झूठे अनासिर मुसलमान का नाम लिख कर खुद इस्लाम और मुसलमानों को गन्दी और गलीज़ गाली देतें हैं. 

तीसरी बात आपके वाहियात और निहायत अदना सोच की आतिश और दंगे करने वाले उनके कपड़ों से पहचान लिए जातें हैं.  आपकी ऐसी अदना सोच का जवाब देने के लिए उसके बाद जितने भी एहतेजाज हुए उसमे ज़्यादातर सेक्युलर हिन्दू और कॉलेज के हिन्दू तुलबा इस्लामिक लिबास सफ़ेद या सियाह पैजामा कुरता पहन और लड़किया नक़ाब पेहेन कर एहतेजाज में शामिल हुए.  उन बच्चों का सिर्फ आपकी अदना दर्जे की सोच को जवाब देना था.  इसमें आपकी भी कुछ गलती नहीं है.  आप जिस माहौल में रहे एक चाय वाले को जिस तरह से हर रोज़ गन्दी गाली गलोच सुनना पड़ती है तो वो उसी सोच का आदि हो जाता है.   

जब रकूने पार्लियमानों के ज़ेहनों में इतनी गंदगी भरी होगी के वो किसी ख़ास जमात ख़ास मज़हब के नुमाइंदों के हलफबरदारी  पर ना ज़ेबा नारे लगातें हों, जब अदलिया और इन्साफ की कुर्सी पर फ़ाइज़ जज का ज़हन इतना मुत्तसिब और फ़िरक़ापरस्त हो गया की जामिया मिलिया इस्लामिया के ऊपर दहशतगर्द हमला होने पर भी वो एक पेटिशन पर कोई फैसला नहीं देतें हैं.  बरक्स नज़ारिया क़ायम कर लिया और बोले पहले तालिबे इल्म शिद्दत ख़त्म करें.  दूसरा तास्सुर दिया की आप तालिबे इल्म हो तो आपको कोई हक़ नहीं की आप अवामी जायदाद को आतिशे नार करें. जब किसी मुल्क़ की अदलिया किसी ख़ास मज़हब के अवाम के लिए तास्सुरात ग़लत क़ायम कर ले और बग़ैर सबूतों की जांच और तहक़ीक़ात किये अगर ये नज़रिया क़याम कर ले की गुनाहगार उसी मज़हब के अवाम या तालिबे इल्म होंगे तो समझ लेना चाहिये की हालात उस मज़हब के अवाम और उस मुल्क़ के मुस्तक़बिल के लिए खतरनाक हो चले हैं. तो ऐसे मुल्क़ में अब मुसलमानों का मुस्तक़बिल और वजूद दोनों खतरे में है.  क्योंकि किसी भी मुल्क का अवाम अपने आपको मेहफ़ूज़ कब तक समझ सकता है जब तक हुकूमत और पुलिस से उसको इन्साफ मिले, नहीं तो ऐवान से बिल आखिर अदलिया से.  लेकिन यहाँ तो सब ही एक हम्माम में बरहना हो चुके हैं.  और अब तो जग ज़ाहिर हो चूका है की आलूद और ज़हर की अक्सरियत किस हद तक हुकूमत के सर चढ़ गई है.  

मुस्लिम और सेक्युलर सियासतदानमुस्लिम उलेमा दस्तूर बचाने की मोहीम चला रहे हैं. किस के ज़ोर और क़ुव्वत पर आप ऐसा कर रहे हो.  सुप्रीम अदलिया तो आपकी सून ही नहीं रही.  रहा सवाल ऐवान का तो आपकी शरीयत की धज्जिया उड़ा दी आप देखते रह गए.  बाबरी मस्जिद का फैसला आया आपके खिलाफ आप देखते रह गए.  आपके साथ इन्साफ होगा या मुनसेफाना फैसला होगा ये आपको कहाँ से तरग़ीब मिली.    

मेरी तो तमाम मुस्लिम सियसतदाँओं से सिर्फ और सिर्फ एक ही गुज़ारिश है की अब इस मुल्क़ को अपना तस्लीम करने का कोई फायदा नहीं और ना ही इसके लिए वफादारी दिखाने का कोई फायदा होगा.  बरक्स अब अक़वामे मुत्तहिदा की जानिब जाने का रास्ता तलाशें.  जो कुछ भी खर्च और इख़राजात होंगे वो मुस्लिम अवाम बढ़ चढ़ कर पूरा कर देंगे. 

सवाल यहाँ बटवारे की जानिब सोचने की सबसे वाजिब वजह है उस ज़हरीली ज़ेहनियत का जो अब हुकूमत में वज़ीरे अज़ाम और वज़ीरे दाख़ला, अदलिया और एक नहीं तमाम रकूने पार्लियमान, रकूने असेंबली और रकूने बल्दिया तक पहुंच गई. तो आपके साथ  हुसने सुलूक कौन करेगा.  हुकूमत अगर इन्साफ पसंद होती और फ़िर्क़ावाराना  ज़हर उसमे नहीं होता बरक्स अवाम ज़हरीला हो जाता तो भी चलता.  क्योंकि हुकूमत के फैसलों से मुल्क चलता है अवाम के फैसलों से नहीं.  इसलिए अब अलहदा मुल्क की तहरीक चलाना पड़ेगी. 

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