हिन्द के अवाम के बीच अब बटवारे की मोहीम ने तेज़ी पकड़ ली है. जैसा की इस सहाफी ने अपने २०१७-१८ को शाया किये
हुए एक मज़मून में कहा था की इस सहाफी के बटवारे की आवाज़ फिल वक़्त पस्त है; लेकिन दानिशमंदों, अवाम, सियासतदांओं, अवामी शख्सियतों
को जब महसूस होगा की कुछ तो गलत हो रहा है,
फिर उनके साथ आते ही बटवारे की मोहिम को फरोग मिलेगी और वह एक बुलंद और क़ूव्वतदार
आवाज़ बनेगी. हालात अब वैसा ही इशारा कर रहें
हैं. बटवारे की इस मोहीम में अब ना सिर्फ मुस्लिम
बल्कि हिन्दू सेक्युलर अवाम भी शामिल हो रहे हैं.
उन सभी अवाम का खैर मक़दम हैं. हुकूमत
की इस तरह की ना इंसाफ़ी, फ़िर्क़ापरस्ती, ज़ुल्म, क़त्ल, दहशतगर्दी से तमाम अवाम बेज़ार
हो चूका है. हुकूमत के साथ सिर्फ वही लोग हैं
जो इस तरह की ज़्यात्ति और ज़ुल्म को जाइज़ ठहराते हैं.
हाल ही में दो नए मुल्क वजूद में
आये एक हिन्दू राष्ट्र के नाम से "कैलासा" और दूसरा उसके बाद " बोगनविले”
ने अपने आपको पापुआ न्यू गिनी से आज़ाद क़रार
कर दिया. जुनूबी अलक़हील (प्रशांत) इलाक़े में
वाक़ेय बोगनविले ने पापुआ न्यू गिनी से आजादी हासिल करने की हिमायत में राय शुमार किया। पापुआ न्यू गिनी का छोटा सा जज़ीरा है बोगनविले.
भारत में हिन्दू दहशतगर्द नित्यानंद के कैलासा हिन्दू राष्ट्र का एलान करने के बाद, दुनियां के नक़्शे में जल्द एक और नए
मुल्क़ का रस्मी हुकूमत ऐलान हो सकता है। न्यू पापुआ गिनी से अलग नया मुल्क बनने के
लिए बरोज़ बुध ११/१२/२०१९ को राय शुमारी के बाद नतीजों का ऐलान किया गया। बोगनविले रायशुमारी आयोग
के सदर बेरटी अहरेन ने जब इसका ऐलान किया तो लोग खुशी से रक़स करने लगे। राये शुमारी
में अलेहदा मुल्क के लिए ९८% (176,928) अवाम ने राये शुमार किया जबकि महज़ २%
(3,043) अवाम ही ऐसे थे जिन्होंने पापुआ न्यू गिनी के साथ रहने के हिमायत में वोट दिया। तवील खून रेज़ी और खाना जंगी का गवाह रहा है बोगनविले.
राये शुमारी के नतीजे वाजिब और लाज़िम हैं. इससे बोगनविले
और पापुआ न्यू गिनी के सियासतदानों के बीच ते शुदा मुहायदे से आजादी का रास्ता बनेगा।
इसके बाद पापुआ न्यू गिनी के ऐवान में इस मुद्दे पर फैसला करेंगे। लंबे वक़्फ़े तक बोगनविले के बाग़ियों ने पापुआ न्यू
गिनी और बेरुन मुल्क फौजी ताक़तों का सामना किया जिसमें २० हजार से ज़ायद अफ़राद हलाक़
हुए। इस खून रेज़ी और ख़ाना जंगी का खात्मा बिल आख़िर आज़ादी हासिल कर के हुआ।
२०२०
में ख़ालिस्तान के लिए अक़वामे मुत्तहिदा की क़यादत और सरपरस्ती में राये शुमारी होने
जा रही है. में मुस्लिम सियासतदाओं और उलेमाओं
से गुज़ारिश करूंगा की अब बोहोत हो चूका अब इन हज़रात को भी संजीदगी से बटवारे के बारे
में सोचना ही होगा, और आज़ादी व अलेहदा मुल्क़ के लिए जद्दो जेहद करना ही होगा. इस ऑपरेशन बटवारा में सेक्युलर हिन्दू
भी शामिल हो सकतें हैं. जिनको ऐसा लगता है
की मुस्लिम अवाम के साथ सख़्त तरीन हक़तल्फ़ी और ना इंसाफ़ी हो रही है. चाहे वो याक़ूब मेमन का अदालती क़त्ल हो या बाबरी
मस्जिद के साथ ना इंसाफ़ी. चाहे वो मुसलमानों
के मज़हबी एतेक़ाद पे हमला हो या दो अलाम के अज़ीम रेहनुमा पैग़म्बर मोहम्मद सल्लम की शान
में अदना दर्जे की बद कलमी. चाहे वो क़ुरान
की बेहुरमती हो या उसकी अज़मत के साथ खिलवाड़ या उसको आतिशे नार करने का गुनाह. चाहे वो एक नहीं हर इलाक़े के हुजूमी दहशत करने वालों
की हौसला अफ़ज़ाई और उनकी गुलपोशी हो या दहशतगर्द को क़ौमी परचम पे लपेटने का मामला. चाहे मुसलमानों की तालीम को ५ से १०% मेहफ़ूज़ करने
वाले बिल पर हमले का मामला हो या मुसलमानों को हुकूमत के ज़ेरे सरपरस्ती इदारों में
५-१०% रोज़गार मेहफ़ूज़ फ़राहम करने वाले बिल पर दहशत.
चाहे
वो भोपाल में ७ मासूम मुसलमानों के ऊपर दहशतगर्दी का इलज़ाम तराशी कर के शहीद करने का
मामला हो या हैदराबाद में एक मुसलमान को क़सदन ज़िना बिल जब्र के इलज़ाम में गिरफ्तार
कर के हलाक़ करने का मामला. चाहे वो आसिफा के
ज़ानियों को बरी करने का मामला हो या कुछ को फ़ासी के बजाये अदना दर्जे की सज़ा देने का
मामला.
अब
ज़ालिम हमारी हुदूत में दाख़िल हो चूका है ख़ुदारा बड़ी तबाही आये उससे पेश्तर बटवारे का
बिगुल फूक देना चाहिए. मुस्लिम सियासतदान
(असद, आज़म, अकबर) दानिशवर, तालीमसाज़ (प्रोफेसर्स) मुल्क की हिमायत करतें हैं और हर
मजलिस और जलसों में चीख़ चीख़ के बोलते हैं की हमको दस्तूर को बचाना है, मुल्क की सालमियत
को क़ायम रखना है. मेरा उनसे सवाल बस इतना ही
है की कैसे आप दस्तूर को बचा पाओगे. आपके पास
क्या हिकमते अमली है जिसकी बुनयाद पर आप ऐसा बोल रहे हो. आज ना सिर्फ मरकज़ बल्कि कमो बेश निस्फ़ भारत के ऐवान
ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत से मुत्तासिर हैं. अदलिया
आपकी कोई बात नहीं सून रही. हाई कोर्ट और सुप्रीम
कोर्ट के फैसले मुत्तास्सिब और तशवीशनाक इन्साफ का क़त्ले आम और दस्तूर के खिलाफ़वर्ज़ी
करने वाले आ रहें हैं; तो आप किस बुनयाद पर ये बोल सकतें हैं की दस्तूर को, हिन्दुस्तान
की गंगा जमुना तहज़ीब को, इन्साफ को मेहफ़ूज़ करना है, हिन्दुस्तान की सालमियत को क़ायम
रखना है. आप किस के नाम पर इतनी बड़ी बड़ी बातें
कर रहे हो, जब मुंसिफ के हाथ में शमशीर बरहना है और वो आपकी गर्दन क़लम (इन्साफ का क़त्ल)
करने के लिए बेताब हैं. ऐसे हालात में आप किस
से तवक़्क़ो कर सकते हो की वो आपकी रेहनूमाई एक वालिद के जैसे करेगा और इन्साफ की इस
जंग में आपके शाना बा शाना हमक़दम होगा.
ना
इंसाफ़ी, हक़तल्फ़ी, ज़ुल्म, तशद्दुत, फ़िरक़ापरस्ती, बर्बरियत के ख़िलाफ़ अगर कोई होगा तो
बस अब वो आपका ज़मीर ही होगा. जो आपके बटवारे की आवाज़ हक़तल्फ़ी के खिलाफ, ना इंसाफ़ी
के ख़िलाफ़ जज़्बाए हुर्रियत को, आज़ादी की आवाज़ को मज़ीद पुख़्ता करेगा. जब कश्मीर
के नवजवानों के जज़्बाए हुर्रियत को ३० साल से ज़ाइद भी हुकूमते हिन्द दबा नहीं सकी तो
आपकी आज शुरू की हुई मोहीम मुस्लिम नस्लों के लिए मुफीद साबित होंगी. बरक्स अगर आज ख़ामोशी की हिकमत इख्तियार की तो हुकूमते
हिन्द ने तो पूरे इक़दाम कर लिए हैं की आती मुस्लिम नस्ले बर्बाद हों और अपने बड़ों को
कोसे की वक़्त पर हमारे बाप दादाओं ने कुछ हिकमत इख़्तियार नहीं की और आज हमको इस तकलीफ
का सामना करना पड़ रहा है. हुकूमत के साथ जो ज़मीर फरोश मुस्लिम हैं वो तो आपकी हक़ की आवाज़ का गला घोटेगें. और ऐसे ही लोग आपके दुश्मन और मुनाफ़िक़ों की जमात में से होंगे.
बटवारे या आज़ादी की मांग के पीछे एक और ठोस वजह है मुसलमानों की भारत में हक़तल्फ़ी और उनके हुनर की अनदेखी. आज उनको किसी बात की फ़राग़त नहीं है. ना तालीम, ना रोज़गार और ना ही वो मेहफ़ूज़ हैं. उनके मज़हबी एतेक़ाद पर कोई भी सड़कछाप, चव्वन्नी छाप हमलारेज़ हो सकता है. मस्जिद में घूस कर इमाम का क़त्ले आम कर सकता हैं.
किसी भी तेहरीक़ को शुरू करने के लिए के लिए ४ अनासिर नुमाया किरदार अदा करतें हैं।
१. बड़ी तादाद में उस खुसूसी अवाम की हक़तल्फ़ी, उनके साथ ना इंसाफ़ी.
२. बड़ी तादात में उस खुसूसी अवाम की पसमांदगी, मुफलिसी.
३. बड़ी तादात
में उस खुसूसी अवाम की हलाकत.
४. बड़ी तादात
में उस खुसूसी अवाम में जहालत.
जब माशरे में एक ख़ास तपके या हिस्से को जब अलहदा मुल्क़
का ऐलान किया जाता है तो यह लाज़मी है कि दुनिया के रू बरू कानूनी रद्दो अमल के तहत इसका ऐलान भी हो।
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