Thursday, 19 December 2019

अगर १८५७ के इंक़लाब भूल गए हों तो फिर याद कीजिये.......

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मज़मून सख़्त एहतेजाजी और नसीहत आमोज़ तारीख़ के सफो को बदलते हुए हालात पर मुश्तमिल है.  बात को आगे रखूँ उससे पेश्तर एक बात वाज़े करना चाहूंगा, जो ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम के अला ओहदेदारों ने ये ते किया है.  आज से उस गलीज़ जानवर, शैतान, ज़ालिम हिटलर को नया नाम दिया गया है. ना हिटलर ना तानाशाह बल्कि हिजड़ा. 

अब बात को मज़ीद आगे बढ़ाते हैं.  आज के हालात इस सहाफी को तारीख़ के सफों को टटोलने पर मजबूर कर रहें हैं.  एक बात ये साहाफी तमाम मुस्लिम उलेमा ऐ दीन, सियासतदानों, दानिशमंदों और अवामी शख्सियतों को कहना चाहेगा अगर आप हिन्दुस्तान की तारीख़ को भूल चुके हैं तो में आपको दबाव डालता हूँ की उसको फिर से याद कीजिये.    

१८५७ के ग़दर को अंग्रेज़ी हुक्काम ने किस तरह से नेस्त नाबूत किया था और उसको पाए तकमील तक पहुंचने ही नहीं दिया था.  वही गलती आज का अवाम कर रहा है.  जिसकी वजह से ज़ालिम, दहशतगर्द, ना इन्साफ हर मरहले पर तुमको शाकिस्त दे रहा है.  

१८५७ से पेश्तर ब्रिटिश हुक्काम ने एक कारतूस की ईजाद की थी जिसमे ख़िन्ज़ीर और गाय की चर्बी मुल्लावीस थी.  उस कारतूस को चलाने से पहले दांत से काटना होता था.  बस इसी वजह से हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही आग बबूला हो गए.  क्योंकि दोनों के ही मज़हबी एतिक़ाद को उस हिकमते अमली से सख़्त तरीन ठेस पहुंची थी.  ख़िन्ज़ीर इस्लाम में हराम है जबकि गाये हिन्दू मज़हब पे पाकीज़ा.  फिर शुरू हुई इंक़लाबी मोहीम लेकिन वो हर क़स्बे, शहर सूबे में फर्दन फर्दन हिकमत के साथ शुरू हुई, जिसकी वजह से अंग्रेज़ हुकूमत उस इंक़लाब के ग़दर को दबाते गए और हर इंक़लाबी को सख़्त तरीन सज़ा देते गए.  जैसा की आज जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तालिबे इल्मो के साथ दहशत और बर्बता देखी गई है.  जबकि अंग्रेजी फौजी तो भी ऐसा ज़र्ब नहीं देतें थे, जैसा की हिजड़े की फौजों ने सिर्फ मुस्लिम देख कर दिए हैं.   

समझाने का मक़सद ये ही है की जिस तरह से १८५७ का इंक़लाबी रेला नाकाम साबित हुआ था क्योंकि इंक़लाब मुश्तर्का मुहीम और इत्तेहाद की शक्ल में नहीं हुआ.  हर सूबे हर कसबे में फर्दन फर्दन हर रोज़ होता तो उस जगह की पुलिस उस ग़दर पर काबू पा लेती थी. 

अब आप लोगों को मुत्तहिद हो कर किसी एक दिन का एलान करना होगा और उस दिन तमाम भारत से अवाम जमा हों.  और ऐवान का घेराव करें.  और इस इंक़लाब की जंग को फर्दन फर्दन लड़ने के बजाये इत्तेहाद के साथ लड़ें.  फिर देखतें हैं कौन सा दहशतगर्द या हिजड़ा आके आपको रोक सकता है.  

तारीखों का एलान पोशीदा रखा जाए.  और हुकूमत को इसकी कानों कान भनक ना लगने दी जाए.  सिर्फ मुस्लिम सियासतदाओं और मज़हबी रेहनूमाओं को पोशीदा तरीक़ेकार हिकमत इख़्तियार कर के सबको एक जगह बुलाना पड़ेगा.  चाहे वो कोई ख़ानक़ाह हो, या मस्जिद या दरगाह.  उसी रोज़ ख़िलाफ़त तहरीक का बिगुल फूक दिया जाए. 

इत्तेहाद में अज़ीम ताक़त है बड़ी बड़ी सल्तनतें धुल और धूवा हो जाती है जब अवाम का हुजूम सामने आता है.  दूसरी बात इस मोहीम में क़त्तई तरंगे परचम का इस्तेमाल ना किया जाए.  उसकी हिकमत बताता हूँ.  एक आर्मी, पुलिस और हुकूमत हर हाल में जब्र और बर्बरता दिखाएगी फिर उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं होगा की सामने वाले के हाथ में तिरंगा परचम है या वो इहतजाजी वो तो उसको सिर्फ एक बाग़ी की हैसियत से देखेगें. और जब सड़क पर तिरंगा पैरों तले कुचला जाएगा तो उसकी बेइज़्ज़ती होगी.  क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट,  ऐवान और पुलिस को दस्तूर की परवाह नहीं वो उसकी धज्जियाँ उड़ाते हैं तो तरंगे की अज़मत किधर करेगें.  दूसरी हिकमत अगर किसी इंक़लाबी को ज़र्ब पहुँचती है और उसके खून के धब्बे तिरंगे पर पड़ेगें तो बदनाम हमारा परचम ही होगा.  तीसरी हिकमत जब तिरंगे के अंदर एक दहशतगर्द की लाश को लपेटा गया तो उसकी अज़मत कम करने के लिए कोई भी इक़दाम ये लोग कर सकतें हैं.  फिर लंगूर मीडिया के ज़रिये एक ख़ास अवाम की बदनामी करेंगे .  लेकिन हमें हमारे परचम को खूब संभालना है.

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