अज़ीज़ नाज़रीन.
दानिशमंद, तालीमयाफ्ता, दूरंदेश शख़्स किसी भी मुल्क़ के मौजूदा हालात को देखते हुए उस मुल्क़ में आने वाली ५० साल आगे की तबाही को बता देता है. और वो बातें सो फी सद सही और दुरुस्त साबित होतीं हैं.
हाल ही में जो कुछ जामियां में हुआ वो किस्सा अब यही नहीं रूकेगा बरक्स ये आतिश जो शिद्दत पसंदों ने लगाईं है उसमे खुद इनके घर जलेगें. जिस तरह से हिन्दुस्तान के मुस्तक़बिल और तालिबे इल्मों को दिल्ली पुलीस ने ज़लील किया है उनके साथ वेह्शाना बर्ताव और एक मुजरिम के जैसे उनके हाथों को ऊपर उठवा के परेड करवाई गई है, उस कारगरदेगी के बाद अब हिंदुस्तान का वजूद खतरे में देख रहा है ये सहाफी. फिल वक़्त पुलिस अपनी पीठ थप थपा सकती है. पुलिस के ठोलों ने उनके अंदर भरे गए ज़ाफ़रानी ज़हर को इन तालिबे इल्मों के ऊपर शिद्दत कर के निकाल तो दिया लेकिन इसके दूरंदेश नताईज मुज़िर साबित होंगे. इस तरह की कारगरदेगी एक मुजरिमाना सोच और अमित शाह जैसे दहशतगर्द, मुजरिम तड़ी पार, ज़िनाकार, जासूसी करनवाने वाले के लिए तो ठीक है लेकिन एक तालिबे इल्म इस तरह के पुलिसिया दहशत को हज़म नहीं कर पायेगें.
मुस्लिम नस्लकुशी का जो नया क़ानून आया है अब तो उस क़ानून के खिलाफ ना सिर्फ मुसलमान बल्कि सेक्युलर हिन्दू भी मुख़ालेफ़त में आ गए हैं. उन सभी का ये कहना है की क्या मुसलमान इस मुल्क़ के बाशिंदे नहीं हैं. क्या इस मुल्क को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाने में मुस्लिम क़ौम का कोई हिस्सा नहीं है. और जब अवाम जाग उठता है तब बड़ी बड़ी सल्तन की नीव कमज़ोर हो जाती है. फिर ये तो नया ख़ून है जवान ख़ून है.
एक बात वाज़े है हर शख़्स अपने जैसे दुसरे शख़्स की इज़्ज़त और अज़मत करता है क्योंकि उसको मालूम होता है की जिस मुक़ाम पे आज वो है, उसी मुक़ाम पर उसका साथी है, तो जो तकलीफ और अज़ीयत बर्दाश्त करके में इस मुक़ाम पर पंहुचा हूँ तो सामने वाले ने भी वही सब सहा होगा. एक सूफी दरवेश दुसरे सूफी और दरवेश को बाखूबी पहचान जाता है और उसकी इज़्ज़त करता है, तालीमी अफ्ता अवाम दुसरे तालीम और पड़े लिखे इंसान से मुत्तासिर होतें हैं और उसकी इज़्ज़त करतें हैं. जाहिल, अनपढ़, दहशतगर्द अपने जैसे लोगों को देख कर खुश होता है और उसकी इज़्ज़त करता है. फिर जब जाहिल और दहशतगर्द के सामने एक पड़ा लिखा तालीमी आफ़ता इंसान आता है तो उसको उससे हसद जलन और नफरत होने लगती है. फिर वो उस चिराग को ही गुल करने की फ़िराक में रहता है जिस जगह से इल्म की रोशिनी फ़ैल रही है. और वो चाहता है की जिस तरह से हम तबाह और बर्बाद हुए सामने वाले भी वैसे ही हो जाए.
मोदी अपनी शरीके हयात और लुगाई को नहीं संभाल पाया और फरार हो गया और उस जैसे ज़न्खे (हिजड़े) को मुल्क चलाने दे दिया तो वो यही चाहेगा की तमाम अवाम उसके जैसा हिजड़ा और नपुंसक हो जाए. उनके अंदर ज़र्रा बराबर मर्दानगी ना रहे. हक़ बोलने की क़ुव्वत ना रहे. ये महज़ जामिया का किस्सा नहीं है. बल्कि हिजड़े और जाहिल के मुल्क की संसद पर क़ाबिज़ होने के बाद हर उस यूनिवर्सिटी में बवाल मचा है जो अपने हक़ के लिए हिजड़े से सख्त अलफ़ाज़ में आँख में आँख डाल कर बात करतें हैं. ये तालिबे इल्म हैं एहतेजाज करना इनका हक़ है, इनके अंदर के जज़्बे को ख़त्म कर के हिजड़ा अपने मुल्क की सालमियत ख़त्म कर रहा है.
हैदराबाद यूनिवर्सिटी और रोहित वेमुला को कौन है जो शायद ही भूल पायेगा. उसके बाद क्या बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में बवाल नहीं मचा. वहां तो तुलबाओं की एक वाजिब मांग थी. यूनिवर्सिटी कैम्पस में जो संघ और ऐ.बी.वी.पी के गुंडे जो पढ़ाई लिखाई तो करते नहीं है बरक्स लड़कियों पे गन्दी नज़रे रखतें हैं. आते जाते उनके ऊपर हर रोज़ के फ़िक़रे कसना, उनके ज़ाती आज़ा को क़सदन टल्ला मारना और बोहोत कुछ करते थे ये संघ के शोहदे जिसकी वजह से बच्चिओं में एक अजीब सी दहशत थी. फिर क्या हुआ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में पुलिस ने ठीक वैसा ही किया जैसा की आज जामिया में किया है. फ़र्क़ इतना है की हिन्दू यूनिवर्सिटी में दिन
के उजाले और रोड पे एहतेजाज करती हुई लड़कियों के साथ बर्बरता दिखाई. और
जामिया में रात की तारीकी में डाकूओं की तरह पोशीदा अंदाज़ में दहशतगर्दों की तरह हमला रेज़ हुए ये खाकी दहशतगर्द.
जो ज़हर संघ और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम ने ख़ाकी दहशतगर्दों के ज़हन में भरा था, की यूनिवर्सिटी में दहशत की तालीम दी जाती है और वहां कई दहशतगर्द पनप रहे हैं, इसी वजह से ख़ाकी दहशत तुलबा पर टूटी. ये तुलबा का महज़ एहतेजाज था, और कोई ते शुदा एहतेजाज नहीं था जो हिकमत हुकूमत ने की उसके प्रोटेस्ट में जमा हुए थे तमाम तुलबा. उसमें हिन्दू भी थे मुस्लिम भी थे, बच्चिया भी थी सभी थे. उनके ऊपर एक मुजरिम के जैसे बर्बरता दिखाना कहाँ का इन्साफ है. वो कोई दहशतगर्द नहीं है, उन्हों ने अपने जिस्म को मेहफ़ूज़ करने के लिए ज़रूरी इक़दाम भी नहीं किये थे. ना ही मेहफ़ूज़ जैकेट था और ना ही सर को बचाने के लिए हेलमेट. यूनिवर्सिटी के अंदर बंदूक, एक-४७, आँसू गैस के असलहे के साथ बग़ैर इजाज़त दाख़िल होने के पीछे की नियत और हिकमत इन खाकी दहशतगर्दों की क्या थी. फिर लेडीज रूम तोडना, लेडीज टॉयलेट को नहीं छोड़ा गया. शर्म आती है. सुप्रीम दहशतगर्द भी सोच रहा होगा में भी अपनी हवस निकाल लू तभी उसने इन खाकी दहशत को सराहा है. जिस तरह से आसिफा के एक ज़ानी ने उसके फ़ौत होने के बाद भी उसकी जसत के साथ ये बोलते हुए ज़िना किया रूको पहले में एक आखिर बार ज़िना कर लू. अब सुप्रीम दहशतगर्द लीपा पोती में लगा है. क्योंकि वो भी आज कल अपने जैसे दहशतगर्दों को पेचानता है और उनकी अज़मत और इज़्ज़त करना उसके ऊपर लाज़मी हो जाता है.
जो ज़हर संघ और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम ने ख़ाकी दहशतगर्दों के ज़हन में भरा था, की यूनिवर्सिटी में दहशत की तालीम दी जाती है और वहां कई दहशतगर्द पनप रहे हैं, इसी वजह से ख़ाकी दहशत तुलबा पर टूटी. ये तुलबा का महज़ एहतेजाज था, और कोई ते शुदा एहतेजाज नहीं था जो हिकमत हुकूमत ने की उसके प्रोटेस्ट में जमा हुए थे तमाम तुलबा. उसमें हिन्दू भी थे मुस्लिम भी थे, बच्चिया भी थी सभी थे. उनके ऊपर एक मुजरिम के जैसे बर्बरता दिखाना कहाँ का इन्साफ है. वो कोई दहशतगर्द नहीं है, उन्हों ने अपने जिस्म को मेहफ़ूज़ करने के लिए ज़रूरी इक़दाम भी नहीं किये थे. ना ही मेहफ़ूज़ जैकेट था और ना ही सर को बचाने के लिए हेलमेट. यूनिवर्सिटी के अंदर बंदूक, एक-४७, आँसू गैस के असलहे के साथ बग़ैर इजाज़त दाख़िल होने के पीछे की नियत और हिकमत इन खाकी दहशतगर्दों की क्या थी. फिर लेडीज रूम तोडना, लेडीज टॉयलेट को नहीं छोड़ा गया. शर्म आती है. सुप्रीम दहशतगर्द भी सोच रहा होगा में भी अपनी हवस निकाल लू तभी उसने इन खाकी दहशत को सराहा है. जिस तरह से आसिफा के एक ज़ानी ने उसके फ़ौत होने के बाद भी उसकी जसत के साथ ये बोलते हुए ज़िना किया रूको पहले में एक आखिर बार ज़िना कर लू. अब सुप्रीम दहशतगर्द लीपा पोती में लगा है. क्योंकि वो भी आज कल अपने जैसे दहशतगर्दों को पेचानता है और उनकी अज़मत और इज़्ज़त करना उसके ऊपर लाज़मी हो जाता है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुलिम यूनिवर्सिटी, उसके बाद जे.एन.यूं. में भी बवाल होता रहता है. अभी हाल ही में फीस बढ़ाने के मुद्दे पर गुजरात के सूरत और अहमदाबाद यूनिवर्सिटी के तुलबा मोदी और गुजरात के वीरानी हुकूमत के खिलाफ अलमबरदार हुए लेकिन उस मुद्दे को ज़्यादा हवा मिले उससे पहले ही दबा दिया गया. कहाँ कहाँ ये हिजड़ा यूनिवर्सिटी से पथराव हुआ बोल के अपनी नामर्दानी को छूपायेगा इसलिए पुलिस शैतान बन गई और दहशत मचाने लगी.
श्री
नगर की कश्मीर यूनिवर्सिटी में इन भारतीय टेरर फ़ोर्स ने दहशत मचाई थी उस वक़्त तो बीजेपी
हुकूमत में थी. ऐसे ही बच्चिओं के साथ बर्बरता
की गई थी जैसे की जामिया में की है. लेकिन
कश्मीर ठहरा एक मुतानाज़ा हिस्सा और कश्मिरिओं से तमाम हिन्दू, मुस्लिम सभी को अज़हद
नफरत और बुग्स है सो वो बात वहीँ दब गयी. मेरे
पास रिपोर्ट है की फौज ने कई बच्चिओं के साथ ज़िना और गिरोह गर्दाना ज़िना किया था. जोहर अली
यूनिवर्सिटी को मिस्मार कर दिया और उन तमाम तुलबा के मुस्तक़बिल को लूट लिया.
इन
तमाम वाक़ियात से ये ज़ाहिर होता है की हिजड़े को इल्म की रौशनी से ही नफरत है और दहशत
को फ़रोग़ देने वाले इक़दाम कर रहा है. लेकिन
जो ज़ेहर का बीज इस हिजड़े, और दहशतगर्द अमित ने बोया है अब वो नासूर की शक्ल में एक
बोहोत ही बड़ा दरख़्त बन चूका है और उसकी हर शाख पर उल्लू और एक जाहिल बैठा है.
अब
वो नासूर महज़ ज़ुबानी मरहम लगाने से नहीं ठीक होगा उसको अलहदा ही करना पड़ेगा. जामिया के तुलबा पे हमला अब यहीं नहीं रूकेगा. बरक्स अब तो हिजड़े और दहशतगर्द अमित का सख्त इम्तेहान
है. इस जंग में हर वो इंसान एक जानिब होगा
जो हुकूमत की कारगरदेगी को गलत तस्लीम करता है और समझ सकता है की एक ख़ास फ़रीक़ के साथ
बे हद ज़ुल्म हो चूका अब इन्साफ हम करेगें.
दूसरी जानिब ज़ालिम, दहशतगर्द, और जाहिलों की फौज होगी. लेकिन इन्साफ और ना इन्साफ की इस जंग में बिल आखिर जीत तो
उसी ही की होगी जो ज़हीन होगा तालीमी आफ़ता होगा और हक़ पर होगा.
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