अज़ीज़ नाज़रीन,
२०१४ से क़ब्ल मुसलमानों के ज़ेहन में कभी
भी बटवारे या तक़सीम की बात नहीं आई. जब २००२
में हिन्दू दहशतगर्दों ने साबरमती ट्रैन को आतिशे नार कर, इलज़ाम मुसलमानों पर लगा कर
तमाम गुजरात को तबाह और बर्बाद कर दिया था तब भी मुसलमानों के दिलों दिमाग में ये बात
कभी घर नहीं की, के अब तक़सीम की जानिब सोचना होगा और ये मुल्क़ अब मुसलमानों के लिए
मेहफ़ूज़ नहीं रहा.
२०१४ के बाद जब भारत में कांग्रेस हुकूमत
का तानाशाह मोदी ने बंदूक का ख़ौफ़ दिखा कर तख़्ता पलट किया और ख़ुद दिल्ली की सल्तनत पे
फ़ाइज़ हुआ, तो मुसलमान उसकी चिकनी चूपड़ी बातों में आते रहे. २०१४ से ले कर २०१९ तक ये तानाशाह मुस्लिम अवाम
पर ज़ुल्म पे ज़ुल्म करता रहा. हज सब्सिडी बंद
करने से लेकर तो हर उस हलके में मुस्लिम अवाम को तकलीफ दी है जहाँ से उनको माशी या
तालीमी इज़ाफ़ा होता था. यहाँ तक की इस कमज़ोर
मर्द ने ख़्वातीनों को इस जंग में हथियार बनाया और चंद ज़मीर फरोश मुस्लिम मस्तूरातों
के कंधे पर बंदूक रख कर बरसों पुराना शाह बानो के केस में संघी दहशत को जो ज़र्ब मुस्लिम
अवाम ने दी थी उसका बदला लिया. और शरीयत को
तब्दील कर डाला. यहाँ से मुस्लिम अवाम में
बटवारे की सुगबुगाहट होने लगी. और अब वो ज़ाफ़रानी
भारत, हिन्दू राष्ट्र के ख़िलाफ होने लगे.
उस बात का जीता जागता सबूत हैं जब असद उद्दीन
ओवेसी ने हाल में २१ दिसम्बर २०१९ एन.आर.सी. और "का" के मुख़ालेफ़त में तिरंगे को अपने घरों पर लगाने की बात कही तो इस सहाफी ने अपनी डीपी बयाई और
तिरंगे के साथ वतन की यकजेहदी की बात कही लेकिन किसी भी अवाम की ना हिन्दू और ना मुस्लिम
का उस मुद्दे पर हिमायत मिली. उससे साफ़ ज़ाहिर
हो चूका हैं की वतन का अवाम अब अलहदा तरफ सोचने पर मजबूर हो चूका हैं. सेक्युलर हिन्दू और मुस्लिम एक हो चूकें हैं लेकिन
वतन की बक़ा के लिए नहीं बरक्स उनका रद्दो अमल अब किसी और चीज़ के लिए हैं.
तीन बातें साफ़ करना चाहूंगा पहली जनवरी
२०१३ में जब धूलिया में आर.आर. पाटिल की पुलिस ने मुस्लिम अवाम के ऊपर गोलियां बरसाई
थी जिसकी मज़्ज़म्मत इस सहाफी ने की तब तमाम मुस्लिम अवाम इस सहाफी के साथ खड़ा दिखा. दूसरी मिसाल जुलाई -अगस्त २०१४ में इजराइल और फलीस्तीन
जंग में २१०० फलीस्तीनी शहीद हुए थे. इस सहाफी ने सियाह ईद बनाने की गुज़ारिश की थी
और तमाम ना सिर्फ मुल्के हिन्दुस्तान बल्कि बेरुन मुल्क इंग्लैंड, अमेरिका, मलेशिया,
दुबाई, ओमान, सूडान, इराक़ यहाँ तक की खुद इस्राईल में अवाम ने अपने बांह या सर पर काला
फीता बाँध कर सोशल मीडिया पर अपना फोटो शेयर कर एहतेजाज का हिस्सा बने थे.
तीसरी मिसाल २०१७ के रमज़ान शरीफ और उससे
पेश्तर हिन्दुस्तान में जो मुस्लिम अवाम की हलाकत हुई थी उसपे इस सहाफी ने स्याह ईद का नारा दिया था.
२६ जून २०१७ के रोज़ उस ईद पर तमाम अवाम ने
काली पट्टी बाँध कर ईद बनाई थी. किसी किसी
ने तमाम कपडे काले पहने थे. और ये एहतेजाज
भी सिर्फ मुल्के हिन्द तक महदूत नहीं रहा था बरक्स तमाम आलमी बरादरी ने उस रोज़ काली
पट्टी बाँधी थी, जबकि बेरुन मुल्क में तो ईद एक रोज़ क़ब्ल हो गई थी, लेकिन सिर्फ यकजेहदी
दिखाना मक़सद था, तो जिस रोज़ मुल्के हिन्द में ईद थी उस रोज़ काली पट्टी बाँध कर फोटो
शेयर की.
अब आइये आतें हैं अपने असल मसले पर. इस सहाफी ने कुछ २१ दिसम्बर २०१९ को भी ऐसी ही एक
मोहीम क़ौमी परचम की निस्बत से चलाई थी की तमाम अवाम अपने घरों के ऊपर क़ौमी परचम लहराए
और उसका फोटो सोशल मीडिया पर भेजें, मुल्क की सालमियत को क़ायम रखें. तो कोई भी इस सहाफी का हामी ना दिखा. मतलब साफ़ ज़ाहिर होता हैं की अब अवाम का एक बड़ा तपका
इस मुद्दे पर फिर से तक़सीम देख रहा हैं. और
वो किसी भी उस सयासी या समाजी तंज़ीम के साथ नहीं दिखेगा जो मुल्क की सालमियत का दम
भरतें दिखेगें. हाँ अलबत्ता हिन्दू मुस्लिम यकजेहदी की बात होगी तो अवाम बढ़ चढ़ कर हिस्सा
लेंगें.
ऐसे एहसासात से साफ़ ज़ाहिर हो रहा हैं की
अब अवाम हुकूमत की कारगुज़ारी को साफ़ और वाज़े अलफ़ाज़ में इशारा दे चूका हैं आपको जो करना
हैं कर लो हम तो तक़सीम के बारे में सोच चुके हैं.
आज सयासी जमातें मुस्लिम या सेक्युलर बढ़ी
बढ़ी बातें करतीं हैं दस्तूर को बचाना है, जमुहरियत को बचाना है, इन्साफ के लिए काम
करना है. जमुहरियत को ज़िंदा रखना है. उन तमाम जमातों के सरबराहों से ये सहाफी पूछना चाहता
है, आपके पास कोई ख़ाका है, क्या हिकमते अमली है. आप कैसे दस्तूर की हिफाज़त करेंगे या
उसके मुहाफ़िज़ बनेगें. भारीतय ऐवान और ऐवाने
असेम्लीज़ की जो हालत है आप लोगों से पोशीदा नहीं है. उसके ऊपर आला तरीन अदलिया (सुप्रीम कोर्ट) जो आपके
ख़िलाफ़ हर फैसला दे रहा हैं. तो आप किस कूव्वत और ताक़त के बल पर ऐसा बेहूदा मज़ाक़ और
बात कर सकते हो.
आज की तारीख़ में ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के
मुल्के हिन्द पर क़ाबिज़ होने के बाद हुकूमत मुसलमानों के ख़िलाफ़, ऐवान ख़िलाफ़, आर्मी ख़िलाफ़,
पुलिस ख़िलाफ़ बिल आखिर अदलिया जिसके ऊपर किसी भी मुल्क़ के बाशिंदे को एक चट्टान के जैसा
अज़्म और भरोसा होता हैं की ये हमारे साथ कुछ भी ग़लत नहीं होने देगी वो भी आपके खिलाफ.
सदरे जमुहरिया जिनके कन्धों पर जमुहरियत
को मेहफ़ूज़ रखने की ज़िम्मेदारी होती हैं और उनको पूरा इख़्तियार और हक़ हैं की जहाँ कहीं
भी हुकूमत के ख़िलाफ़े आईन काम देखें या जमुहरियत का क़त्ल होते हुए देखें तो उस बिल को
या तो वापिस हुकूमत को लौटा सकता हैं या तरमीम सकता है, उसको रद्द या ख़ारिज कर सकता
हैं. लेकिन आज के सदरे जमुहरिया के ज़ईफ़ कन्धों
में इतनी भी क़ुव्वत ना रही के एक साधू अदना मुलाज़िम वज़ीरे आला की तपिश और दहशत को बर्दाश्त
कर सके सो उसके सामने हाथों को जोड़ के सर झुका लिए तो उसमे इतनी क़ुव्वत कहाँ से आएगी
की वो वज़ीरे अज़ाम के बिल को वापिस कर सकेगा.
जब वज़ीरे आला के सामने हाथ जोड़ दिए थे और सर झुका दिया था बिल फ़र्ज़ वज़ीरे आज़ाम
आ गए तो गर्दन ही क़लम हो जायेगी इस ख़ौफ़ और दहशत के चलते बिल पे फ़ौरन दस्तख्वत कर दिए.
संघी दहशतगर्द, ज़ाफ़रानी महाज़ के कारकून
और रकून बड़ी बड़ी बातें करतें हैं. इन देश के
गद्दारों को गोली मारो सालों को. उनसे ये सहाफी
कहना चाहता हैं बल्कि खुल के ललकारता हैं की हाँ में हूँ गद्दार चलो पहली गोली मेरे
को मारो. चूनौती हैं तुमको. इससे पेश्तर एक संघी दहशतगर्द कमलेश बोहोत उछल कूद
कर रहा था उसने इस सहाफी को मौत के घाट उतार देने का चेलेंज किया. इस सहाफी ने उसका चेलेंज मंज़ूर किया और सोशल मीडिया
पे आज तक की एक खबर पे कमेंट वायरल भी किया.
की इस शख्स का चेलेंज मंज़ूर हैं लेकिन ये अपने मक़सद में कभी कामयाब नहीं हो
पायेगा. चेहरे बदल दिए जायेगे और फिर जो कुछ
भी होगा इसके घर वाले रो रो कर मीडिया के सामने बयान करेंगे.
Admin ·
@@@>>> कुछ संघी आतंकी हमको शांत करना चाहते हैं और बोल रहे हैं अगर शांत नहीं हुआ तो घर में घूस के मारेंगे. उनसे कहना चाहता हूँ पहले घर तक तो पहुँचो फिर मारने के बारे में सोचना. पहले कई ऐसी हिमाक़त कर चुके है लेकिन रस्ते में ही मौत की आगोश में चले गए. जितने निकले सब एक्सीडेंट में मारे गए. फिर भी इन संघी का चेलेंज मंज़ूर है चलो आप भी अपनी हसरत पूरी कर लो. निकलो घर से हमको मारने का अज़्म कर के फिर क्या होता है आपके अपने रिश्तेदार बतायेगे मिडीया के सामने???>>>> अरे जब तुम्हारी पुलिस आर्मी १५ दिन का चेलेंज पूरा नहीं कर पाई वो भी अमित जैसे आतंकी के ग्रह मंत्री होते हुए और मोदी जैसे हिटलर के होते हुए तो तुम्हारी क्या औक़ात क्या बिसात है. गंदे पानी का क़तरा हो तुम मट्टी में मिला दिए जाओगे.
कूल मिला के ये सहाफी इस नतीजे पर पंहुचा
है की अब ज़्यादा निचोड़ने का कोई फायदा नहीं जितना आबे आलूद निकलना था निकल गया. तमाम संघी, हुकमत, ऐवान और अदलिया और सदरे जमुहरिया
सब बरहना हो गए और सबकी मुत्तसिब ज़ेहनियत और दिलों दिमाग में भरा हुआ आलूद और गंदगी
बहार आ गई. तो अब मसले को अलामी चबूतरे पर
ले कर जाना चाहिए और अलामी बरादरी से सिफारती दबाव डलवाना चाहिए. जब अदलिया इतनी मुत्तसिब हो जाए की बग़ैर सबूतों
की जांच, तहक़ीक़ात किये ऐसा नज़ारिया क़याम कर ले की तमाम शिद्दत मुस्लिम अवाम की जानिब
से ही है और वो किसी भी किस्म की पेटिशन समात करने से मना कर दे और कहे पहले आगज़नी
और दंगा फसाद बंद करे तुलबा. दूसरी नज़ारिया अदालत की जानिब से आया तुलबा हो मतलब तुमको
क़ौमी जायदात को आतिशे नार करने का हक़ नहीं है. तो समझ लेना चाहिए अब राहें मज़ीद मुश्किल
और सख़्त हैं.
इन सब ना इंसाफ़ी और हक़तल्फ़ी का
एक वाहिद हल है एक और बटवारा, तक़सीम.
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