Thursday, 30 June 2022

कान्हा के बाद अब हनुमान को मौत के घाट उतारा।

नाज़रीन

जिस हिसाब से हिन्दू शिद्दत अपने ऊरूज पर है उसी हिसाब से उनके आक़ाओं को मौत के घाट मुतावातिर उतारा जा रहा है।  अभी कंन्हैया  लाल की आकस्मिक हलाक़त से अवाम उभर भी नहीं पाया था की सूबे शुमाल के अमेठी में दो अफ़राद ने हनुमान को मौत के घाट उतार दिया। जिस तरह कान्हा का वीडियो तेज़ी से वाइरल हुआ था उसी तर्ज़ पर हनुमान को मौत के घाट उतारने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वाइरल हो रहा है। उम्मीद करता हूँ जैसा बवाल लंगूरों की टोली ने राजिस्थान हादसे पर मचाया था साधू के सूबे के लिए उससे ज़्यादा मचाया जाएगा।  

नज़रिम उम्मीद करता हूँ जिस हिसाब से तमाम सेक्युलर जमातें मजलिस के कारिंदों से ले कर तो आप तक, श्राप से ले कर तो पाप तक सभी कान्हा की हलाक़त पर तशवीश ज़ाहिर कर रहे थे।  लेकिन सूबे शुमाल में हनुमान को पीट पीट कर ज़मीन पर लीटा लीटा कर लातों से मारने वाला वीडियो उदयपुर के वीडियो से ज़्यादा हैबतनाक और भयानक है। होने के बावजूद भी सभी ख़ामोश हैं।  क्यों।  क्यों सवाल ना करूँ।

वीडियो में दो नावाक़िफ़ अफ़राद लंगूर को बेज़र्ब ईंटों से पत्थरों से लातों से उस वक़्त तक मारते हैं जब तक उसकी जान नहीं निकल जाती।  अब ज़ाफ़रानी मीडिया के लँगूरों से गुज़ारिश है की इसके ऊपर भी ब्रेकिंग न्यूज़ चलाएं।  और दिखाए की कैसे एक हैवान हनुमान को इंसान ने हैवानों की तरह मार डाला।  है हिम्मत लंगूरों तुम में ऐसा कुछ दिखाने की अगर दिखाया तो साधू अंदर हाथ डाल के पेट की आंतें उजड़ी निकाल देगा।  डरपोक बिल्ले

कल उदयपुर के मुद्दे पर जो लंगूर लँगूरनियाँ और सियासी जमातें रूदाली गेंग क़ानून की दुहाई दे रहें थे दस्तूर के हिसाब से काम करने की बात कर रहें थे।  आज पूरी तरह से ख़ामोश कियों हैं।  कहाँ हैं वोह हैवान मुहाफ़िज़ वाले, जो ईद ऐ क़ुर्बान आते ही जानवरों के मुहाफ़िज़ बन जातें थे।   जो लोग हर मुद्दे पर क़ानून दस्तूर की दुहाई देतें हैं उससे इतना सा सवाल है क्या अभी भी उनको यक़ीन है की हिंदुस्तान में क़ानून नाम की कोई चीज़ बची है। कोई भी काम दस्तूर के हिसाब से हो रहा है।  अगर हाँ तो योगी आदित्यनाथ चीफ जस्टिस ऑफ़ उत्तर प्रदेश कैसे बन गया।  दूसरी बात जिस मुल्क में क़तल कर के बेल पर आने वालों का फूल माला से खैरमक़दम होता है फूल बरसाए जातें हैं मिठाई खिलाई जाती है ढोल ताशों से उनका जुलूस निकाला जाता है।  रामनवमी पर हाथ में तीर कमान के साथ उस हत्यारे के फोटो पब्लिक किये जातें हैं तो अब कुछ भी मुमकिन हैं।

नाज़रीन अमेठी में जिसको मारा गया यह वही हनुमान है जिसके झूठे इलज़ाम में किसी हनुमान भक्त ने मोहम्मद जुबेर को दिल्ली पुलिस की टीम ने ख़याली गिरफ़्तार किया था।  मज़े की बात यह है की जिस तरह गिरफ्तारी ख़याली थी उसी तरह ऑफ आई  आर भी ख़याली और जुर्म भी ख़याली उनको रखा भी किसी नावाक़िफ़ पोशीदा जगह पर छुपा कर।  अब इन मुजरिमों के ख़िलाफ़ लंगूरों की टोली की जानिब से ज़हर अंगेशी नहीं की जाएगी।  कियोंके दोनों मुजरिम संजय कोरी और सूरज कोरी हैं।  यह दोनों मुजरिम नहवाण गाँव के रहने वाले हैं।  लेकिन देखिये दोगला पैन और मुनाफ़ेक़त इन लंगूरों की उनकी ही बरादरी का एक हैवान मारा गया।  जो हिन्दू मज़हबी हिसाब से भी मुक्क़द्दस है, इसी हनुमान के नाम पर लंगूर चालीसा की जंग का आगाज़ हुआ था और जब इसी हनुमान को मौत के घाट बेरहमी से उतार दिया जाता है ना तो इनकी बरादरी के ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर-लँगूरनियाँ कुछ बोलतें हैं और ना ही हिन्दू मज़हब को कोई इज़ा पहुँचती है।  

और मोहम्मद ज़ुबैर के हनुमान के ऊपर एक सच्ची बात कहने पर फ़र्ज़ी हनुमान भक्त के मज़हबी अक़ीदे पर चोट पहुंच जाती है।  वाह क्या बात है।  जब तुम गुनाह करो तो अपनी गर्दन को शतुर्मुर्ग के जैसे रेत में डाल दो,  और समझो की कोई नहीं देख रहा है वहीँ किसी दुसरे से ऐसा काम हो जाए तो बवाल मचा दो।  आतंकी हमला तक क़रार कर दो।  मुझे तो अभी तक सेक्युलर जमातों पर तरस आता था लेकिन अब अपनी खुद की जमात पर तरस आ रहा है।  मोदी, संघ का हव्वा और दहशत इतनी हावी हो गई की ख़ुदा से ख़ौफ़ज़दा होने के बजाये इन लम्पट लोगों से साहब ख़ौफ़ खाने लगे।  सच्चाई बयान करने के बजाये हिकमत से बात को रखने के बजाये सीधे सीधे उदयपुर के हादसे पर सख़्त सज़ा की सिफारिश करने लगे।  हमारे हिन्दू भाई को क़तल किया जिसने उसको सख़्त से सख़्त सजा दो।  वाह क्या फालसा है साहब।

Zuber

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