अज़ीज़ नाज़रीन,
महाराष्ट्र की सियासत ने तेज़ी से करवट ली और महाविकास अघाड़ी की हुकूमत के गले लगे हुए अपने आपको बाला साहब का पुर एतेमाद सिपह सालार बोलने वाले एक ग़द्दार ने गुजिश्ता हुकूमत का सर क़लम कर दिया और खुद हाकिमियत की कुर्सी पर फ़ाइज़ हो गया। इस ग़द्दारी और अपनों के साथ दग़ा बाज़ी, धोखे बाज़ी में अंग्रेज़ों की गुलाम नस्ल, माफ़ी बाज़ तंज़ीम ने उसका खूब साथ दिया। लंगूर-लँगूरनियों की जमात इस ग़द्दारी को भी हज़म कर चले, बोलतें हैं की यह ग़द्दारी नहीं है बल्कि सियासत में सब कुछ चलता है। भाई जब आज की २१ वी सदी में एक जमहूरी निज़ाम वाले मुल्क में सब कुछ चलता है तो, बादशाही में जो बात आज हुई वोह बात कैसे ग़लत हो सकती है। हज़रत आलमगीर औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे करें तो अपने भाई का क़तल किया, और तुम करो तो सियासत में यह बातें मायने नहीं रखती। जबकी शहनशाई उमूर में सब कुछ जाइज़ होता था, और जमहूरी निज़ाम में ऐसा करना बिलकुल ख़िलाफ़े उसूल है और जम्हूरियत का क़तल है।
नाज़रीन,
हालात के देखते हुए क्या यह नतीजा अखज़ नहीं कर लेना चाहिए की माफ़ी तंज़ीम का वोह शख्स जो
इस ग़द्दारी और बग़ावत का रस्म अल ख़त था उसने ग़द्दार को बली का बकरा बनाया है। माफ़ी तंज़ीम का वज़ीरे आला की कुर्सी का सबसे ज़्यादा मुमक़िना नुमाइंदा एन वक़्त पर जंग से पीठ दिखा कर क्यों भाग गया। पीछे क्यों हट गया। उसकी सिर्फ कुछ वुजूहात समझ में आती हैं। पहली जिस ग़द्दार को वज़ीरे आला की नई हाकिमियत के
फ़र्ज़ को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी दी गई है, दरअसल उसको बली का बकरा बनाया गया है। जैसा की आम तोर पर संघी दहशतगर्दों का फलसफा होता
है जंग में खुद पीछे रहतें हैं और आगे किसी दुसरे को कर के जंग जीतना चाहतें हैं। कभी भी कोई संघी किसी जंग का हिस्सा नहीं बना। यह लोग बग़ावत करवातें हैं, गले लग कर अपने ही भाई, दोस्त
या हमवतनों का सर क़लम करने में माहिर होते हैं। लेकिन
कभी भी खुद किसी भी तहरीक का ज़ाहिर हिस्सा नहीं बनते। परदे के पीछे से काम करते हैं। दूसरी बात अब बाला साहब की तरह रिमोर्ट कण्ट्रोल
माता श्री के हाथों में होगा। बाला साहब की
तरह उनके जानशीन उद्धव हुकूमत को माता श्री से चलायेगें।
नाज़रीन माफ़ी तंज़ीम की हुकूमत की भूख है की ख़तम ही नहीं होती भले ही वोह दुसरे दर्जे की शहरी बन कर काम करेगी लेकिन हमें तो हुकूमत की नुमाइंदगी करना है। हमने हमारे गुजिश्ता मज़मून में तहरीर किया था की राजिस्थान की हालत महाराष्ट्र में होगी। राजिस्थान जैसी तो नहीं हुई हाँ अलबत्ता बिहार जैसी हो गई। जिसका ज़िक्र हमने हमारे खबरनामे "आजतक" के तबसिरे में किया था। महाराष्ट्र बनेगा दूसरा उत्तर प्रदेश और बिहार।
माफ़ी तंज़ीम की क्या ऐसी मजबूरी है की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी दरी और चादरे उठाने को तैयार हो जाती है। बिहार में सबसे बड़ी पार्टी मुनतख़ब हो कर आई थी लेकिन नितीश की अदना तंज़ीम के साथ दुसरे दर्जे में हुकूमत के फ़राइज़ को अंजाम दे रही है, और वहां पर भी वज़ीरे आला के आने से क़ब्ल माफ़ी तंज़ीम के रकूने असेंबलीदरी चादरे बिछा रहें हैं और जाने के बाद कुर्सियां उठा रहे हैं।
वही
बात महाराष्ट्र में हो गई जब भी बाग़ी वज़ीर आएगा दरी चादरे बिछाने कुर्सीयां लगाने की
ज़िम्मेदारी माफ़ी तंज़ीम के नुमाइंदों की होगी, वैसे ही जाने के बाद उनको उठाने की। फिर हर मुद्दे पर यह ज़रूरी नहीं की बाग़ी वज़ीर और
माफ़ी तंज़ीम की एक राये हो। किसी मुद्दे पर
एक राये नहीं हुई तो पड़ला बगावत और माता श्री का भारी लगता है और माफ़ी तंज़ीम को या
तो हस्बे रिवायत माफ़ी माँगना होगी या ज़हर का प्याला नोश करना होगा। ख़ैर जो भी होगा हम तो तमाशा देखेगें लेकिन यह बात
ते है बिहार के जैसे बन्दर नाच तो खूब होगा, रस्सा कशी भी होगी, बिल आख़िर अगर ज़्यादा
खेच तान हुई तो गर्दन क़लम होगी बाग़ी ग़द्दार की या हर उस मुद्दे पर जिसमे एक राये क़ायम नहीं हो सकेगी ज़हर का प्याला माफ़ी पार्टी की क़िस्मत में आएगा।
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