अज़ीज़ नाज़रीन,
आज आप लोगों के दरमियान एक कहानी को ले कर हाज़िर ख़िदमत हुआ हूँ। उम्मीद करता हूँ आपको कहानी पसंद आएगी और अल्लाह से दुआ गौ हूँ हर सच्चे इंसान को दुरुस्त हिदायत आता करे।
किसी शहर में अब्दुल्लाह नाम का एक जुलाहा रहता था, वोह कपडे की तिजारत करता था। उसको एक फ़रज़न्द था। जो अवाम को नियाहत ही कमज़ोर और दुबला पतला महसूस होता था। लेकिन उस नोजवान का अज़्म अपने मालिके दो जहां पर बोहोत ही पुख़्ता था। जुलाहे के फ़रज़न्द में ईमान की दर्जे हरारत इस क़दर सख़्त और मज़बूत थी की बड़ी से बड़ी चट्टान और आफ़त उसके सामने आ कर दम तोड़ देती थी।
जुलाहा
अपने बुढ़ापे को पहुंच चूका था सो तिजारत की तमाम ज़िम्मेदारी उसके फ़रज़न्द ने उठा ली। जो बाप ने कमाया था या अपने फ़रज़न्द को दिया था अब
उस जुलाहे के बेटे ने अपनी सलाहाहियत से उस तिजारत को मज़ीद ऊरूज पर ले गया। तिजारत बेपनाह फ़ैल गई। जुलाहे के बेटे की एक आदत थी की वोह कितनी भी बड़ी
मुसीबत या आफत आ जाए कभी गुस्से को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता था। हर मुश्किल ख़्वाहा वोह इंसानी हो या शैतानी हर मुसीबत
में उसके लबो पर मुस्कराहट और चेहरे पर सुकून के निशान नुमाया रहते थे।
अब जुलाहे के फ़रज़न्द के चर्चे एक शहर से निकल कर दुसरे शहर दुसरे से तीसरे अल गरज़ पूरे मुल्क में फ़ैल गए। फिर जहाँ रेहमान होता है वहां शैतान भी होता है। और शैतान तो हर दम वली सिफ़त इंसानों को तकलीफ देता है। उनको अदना दर्जे से बोलना घटिया बात बोलना नीचे दिखाने की कोशिश करना, तकलीफ देना ख़्वाहा माशी या जिस्मानी।
उस मुल्क का हाकिम निहायत ही ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त शख्स था, उससे ज़्यादा ज़ालिम उसकी नस्ल, चेले चपाटे और ओहदेदार। अब उसकी दूकान पर हाकिम का फ़रज़न्द आया। जो ग़ुरूर और तकब्बुर से भरा हुआ था। दौलत और हाकिमियत का नशा ऐसा की हर शख़्स को अपने से अदना तसव्वुर करना। उसने जुलाहे के लड़के से एक मीटर का सफ़ेद कपड़ा माँगा। जुलाहे के लड़के ने जो टुकड़ा सामने रखा था वोह उठा कर उसको दिखाया। ज़ालिम हाकिम का फ़रज़न्द ज़िद करने लगा की मुझे थान में से काट कर १ मीटर टुकड़ा दो। चुनांचे जुलाहे के लड़के ने थान में से एक मीटर सफ़ेद कपडा उसको दे दिया। ज़ालिम हाकिम का फ़रज़न्द उस जुलाहे के बेटे को मज़ीद तकलीफ देना चाहता था, उसने कहा इसको दो टुकड़े कर दो, फिर कहा नहीं तीन चार पांच हर काट के ऊपर जुलाहे का फ़रज़न्द मज़ीद नूरानी मुस्कराहट के साथ उसके साथ पेश आया और उसके कहे हिसाब से कपडे का मज़ीद टुकड़ा कर देता। अल ग़र्ज़ा जब वोह कपड़ा चिंदे चिंदे हो गया तब उसने बोला नहीं अब नहीं चाहिए चिंदे चिंदे हो गए।
इतने में उस ज़ालिम हाकिम के फ़रज़न्द के मुहाफ़िज़ सिपाही आ गए और उन्होंने मज़ीद उस जुलाहे के फ़रज़न्द को ज़लील करना चाहा, वोह बोले अरे तुम्हारे कपडे के तो चिंदे चिंदे हो गए, अच्छा बोलो एक चिंदे का कितना पैसा हुआ उस हिसाब से तमाम चिंदों के पैसे का हिसाब बता दो हम तुम्हारा पूरा हर्जाना वापिस कर देगें।
उन
मुहाफिजों के जवाब पर जुलाहे का फ़रज़न्द नूरानी मुस्कुराया और बोला क़ीमत उसकी जो काम
आ सके। अब यह चिंदे ना तो आपके काम के हैं
और ना ही मेरे काम के रहे। इसकी कोई क़ीमत नहीं।
जुलाहे के फ़रज़न्द का जवाब सून कर ज़ालिम हाकिम का फ़रज़न्द और उसके मुहाफ़िज़ बोहोत ही पशेमान हुए और उनको यक़ीन हो गया की, जुलाहे का फ़रज़न्द कोई मामूली शख्स नहीं है। हमारे इतना इसतेसाल करने पर भी इसको कोई मलाल और गुस्सा नहीं। वोह सब उसके आशिक़ हो गए और उस लड़के से उसका मज़हब पूछने लगे।
बाद में वोह सब उसके ही नक़्शे क़दम चल कर उसका मज़हब इख़्तेयार कर लिए।
कहानी का सार है शैतान चाहे कितना भी ताक़तवर या क़ुव्वत वाला हो अल्लाह के सच्चे वली से कभी भी नहीं जीत सकता है। फील वक़्त अल्लाह के वली को ईज़ा और तकलीफ हो सकती है बिल आख़िर जीत अल्लाह वालों की ही होती है, शैतान की नहीं।
जो
फ़ारस से वेस्ट बंगाल और कश्मीर से कन्यकुमारी तक हाकिमियत का माद्दा रखता है वोह कोई
मामूली हाकिम नहीं होता है वोह तो अल्लाह का वली ही होता है। फिर उस वली की शान में ग़ुस्ताख़ी करने वाले की तो
नस्ले बर्बाद होगी और हर हाल में होंगी।
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