अज़ीज़ मोहतरम उम्मा,
मोमीनों अपनी रूह को ज़िंदा करो तुम्हारा साथ अल्लाह देगा। जिसका ज़िक्र इस सहाफ़ी ने अपनी कई नज़्मों और मज़ामीनों में किया है।
"ए मोमीनों जिस्म तेरा कमज़ोर ही सही,
रूह को अपनी मज़बूत कर,
साथ में तेरे रेहमान आये
अमल तो पहले ऐसे कर"।
सहाफ़ी जुबेर।
२०१४ के बाद से मुसलमानों ने अपनी रूह पर अमल करना शुरू किया है। और अब जब भी जंग होगी एक एक अदना सा समझा जाने वाला ईमान वाला मुसलमान हज़ार हज़ार काफ़िरों को हलाक करेगा। दूसरी बात हर बार ज़लालत मोदी एंड कंपनी के हक़ में लिख दी गई है और हो रही है। इस्लामिक शरीयत के क़ानून के अंदर मदाख़लत कर के मोदी ने ट्रिपल तलाक़ ख़तम किया फिर मुँह से गंदगी निकाली। आज हमने १४०० साल पुरानी रिवायत को इतिहास के कूड़े दान में फेंक दिया।
अल्लाह बोहोत ही कारसाज़ है ३ साल भी नहीं गुज़रे थे की इस मोदी नाम के जल्लाद, क़साई को उसकी औक़ात दिखा दी और उसको ख़ुद को कूड़े दान के डब्बे पर चस्पा कर दिया। जो कभी नहीं हुआ वोह तारिख़ के सफों में दर्ज हो गया. जो भारत के किसी भी वज़ीरे आज़म के साथ नहीं हुआ वोह मोदी के साथ हो गया। उसका ना सिर्फ नाम बल्कि फोटो को भी कुवैत, दूबाई, मालदीव जैसे मुमालिकों ने अपनी गंदगी के डब्बो पर चस्पा कर दिया। उसका ना सिर्फ नाम बल्कि फोटो भी तारिख़ के कूड़ेदान में फेंक दिया गया।
नबी सल्लम की शाने अक़दस में बदकलामी और अदना दर्जे की ज़ुबान इस्तेमाल करना यह एक हिन्दू आम रूझान हो गया था। दरसअल इसके लिए हम ख़ुद ही ज़िम्मेदार थे। हमने कभी इतने जारिहाना अंदाज़ में एहतेजाज नहीं किया, असल में ज़ाफ़रानी दहशत का एक ख़ौफ़ था। मेने इससे पेश्तर भी कई मज़मूम शाया किये थे, जब ॐ स्वामी, कमलेश तिवार और उससे पेश्तर कई शिद्दत पसंद काफ़िरों ने नबी की शान में बदकलामी की थी और झूट फैलाया था। तब भी कहा था कहाँ हैं उलेमा क्या ऐसी बदकलामी सुन कर उनका ख़ून नहीं खोलता है। वोह काहे को जिहाद का फतवा नहीं देते। या तो बदकलामी करने वाले को क़तल कर दो "सर तन से जुदा" या फिर ख़ुद जंग में जामे शहादत नोश कर लो।
दरअसल इसमें ग़लती मुस्लिम उम्मा की ही है। शुरू में जब इन शिद्दत पसंद काफ़िरों ने बुज़ुरगाने दीन की शान में बकवास करना शुरू किया था तभी एक आधा का सर तन से जुदा हो जाता तो आज नौबत नबी की शान तक पहुंच ही नहीं पाती। बीजेपी के ज़ालिम ज़ुबान दराज़ टीवी पर आ कर वली सिफ़त हाकिम आलमगीर औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह के बारे में ऊल जलूल अपने मुँह की गंदगी ख़ारिज कर के चले जातें हैं। दरअसल होना तो यह चाहिए था की किसी भी वली की शान में गुस्ताखी करने वाले को मुस्लिम उम्मा फ़ौरन सज़ा देतें तो नबी की अज़मत तक पहुंचने का तस्सव्वुर ही नहीं होता।
में २०१० से सहाफ़त की रूहानी दुनियाँ में आया था। और मेरा मक़सदे ऊला था की इन जैसे बदज़बानों ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियों पर चाबुक चलाया जाए। क्योंकि जो इज़ा मुसलमानों, इस्लाम, मस्जिद, तब्लीग़ी जमात पर झूठी सच्ची बेफज़ूल डिबेट करने पर दुसरे को होती है वही मुझे भी होती थी। फिर नबी की अज़मत तो बोहोत ही आला है। उनकी शान में बदकलामी कोई भी सड़क पर चलता फिरता कैसे कर सकता है। लेकिन बात वही है नबी की शान में बदकलामी पर भी अगर किसी आरिफ जैसे का ख़ून नहीं ख़ौल रहा है और वोह उस मुद्दे को बोल रहा है की असदुद्दीन और अरबों ने मुद्दे को ज़बरदस्ती तूल दिया कोई इतनी बड़ी बात नहीं थी। तो ऐसा शख़्स हमख़ास मुनाफ़िक़ है और उसके अंदर ईमान की हरारत का दर्जा अदना से भी कम है। यही लोग खोवारा और अबू लहब की औलादें हैं। और इन्ही जैसे मुनाफ़िक़ों के बारे में मेने अपने नज़ारियात में पूरी तहक़ीक़ात के साथ इस बात को वाज़े लिखा है की यह लोग तो मोदी को नबी अख़िरुज़्ज़म्मा तस्लीम कर चुके हैं। तभी मोदी के बारे में कुछ भी बोला गया या लिखा गया तो आरिफ जैसे मुनाफ़िक़ों का ख़ून ख़ोल जाता है लेकिन नबी के बारे में बोलने पर नहीं।
आरिफ ख़ान और हूकूमते हिन्द अल क़ायदा पर तनक़ीद कर रहें हैं की नबी के मुद्दे पर हमें दहशतगर्दों की मदद की ज़रुरत नहीं है। तो यह उनका सोचना सरा सर ग़लत और ग़फ़लत से भरा हुआ है और उनको अपनी इस्लाह की ज़रुरत है। क्या पता हम आज अपने आपको नबी का सबसे बड़ा मोहब्बत करने वाला समझ रहें हो लेकिन अल्लाह तो दिलों के पोशीदा हाल को भी जानता है उसके नज़दीक अल क़ायदा जैसी तंज़ीम ही अफ़ज़ल हो और नबी की अज़मत पर नामूस-ए-रिसालत पर गुस्ताखे रसूल को क़तल करने की क़ुव्वत अल्लाह ने उनको दी हो और आपको नहीं।
दूसरी बात नबी तो दोनों आलम के नबी हैं इंसान, जिन्नात, फ़रिश्ते, हजर, शजर, हैवान, चरिन्द परिन्द हवा, चाँद सूरज तारों की कहकशा, जन्नत, दोज़ख सभी के लिए नबी हैं। तो उनकी बेहुरमती पर जो इज़ा एक सियासतदान या एक आम मुसलमान को हुई हर सच्चे मोमीन को हो सकती है ख़्वाहा वोह अलक़ायदा के सर्बाह ही क्यों ना हों। अब आरिफ, नक़वी, शाहनवाज़ जैसे मुनाफ़िक़ों की कोई बात नहीं वोह मोदी इश्क़ में गोल मोल बात कर सकतें हैं। कोई भी मुस्लिम सियासतदान यह कहना चाहता है की नबी सल्लम सिर्फ हमारे नबी है नामूस-ए-रिसालत की ज़िम्मेदारी सिर्फ हमारी है। नहीं ग़लत है, नबी, इस्लाम, मस्जिद, क़ुरान पर जब काफ़िरों की जानिब से हर्फ़ आये तो तमाम आलम के मुस्लिमों को हक़ है की बदला ले सकतें हैं और उसके ऊपर बोल सकतें हैं। सियासतदानों को इस पचड़े में पढ़ने की ज़रुरत ही नहीं है। अच्छा होता की डच के उस ख़बीस रकूने पार्लिअमान के नबी के दुश्मनों के मुवाफ़ेक़त में दिए हुए बयान पर कुछ बोल देतें।
फिर वोह मसला किसी भी मुल्क की अज़मत और तहफ़्फ़ुज़ से ज़्यादा बड़ा हो जाता है। नबी की शान में गुस्ताख़ी करने वाले काफ़िर मुल्क के ख़िलाफ़ अगर ओलेमा एलान जंग का भी हुकुम नाफ़िज़ करतें हैं तो वोह सही और दुर्सुत होगा।
No comments:
Post a Comment