बिल आख़िर बरोज़ पीर १६ नवंबर २०२० को नितीश कुमार फिर से बिहार के वज़ीरे आला के ओहदे के लिए नामज़द किये गए। उसके बाद उन्होंने एक सादे से इजलास में हलफबरदार हुए। नाज़रीन अब यहाँ यह बात को ज़हन नशीन कर लें की यह ज़ाफ़रानी पार्टी की फतह हो कर भी शाकिस्त है बल्कि करारी शाकिस्त है। जिसको इस सहाफी ने अपनी उर्दू नज़म में मई या जून २०२० में शायरी के ज़रिये आगाही की है। "३६५ जो जीत के भी हार गए वग़ैरा"।
ज़ाफ़रानी तंज़ीम की ऐसी क्या मजबूरी रही थी जिसकी वजह से उसके
ज़्यादा रकूने असेंबली होते हुए भी एक अदना अक़लियत वाली तंज़ीम के शख्स को सूबे के सबसे
अज़ीम ओहदे पर फ़ाइज़ किया। अब यह तो वही बात हुई अक्सरियत (बहुसंख्यक) पर अक़लियत (माइनॉरिटी)
हुकूमत कर रही है। फिर यह तो उलटी गंगा बहाने
वाली बात हुई, गंगा
पटना से कलकत्ता की जानिब बह कर ख़लीज बंगाल में ग़र्क़ाब होती है,
लेकिन ज़ाफ़रानी पार्टी ने तो उसको उल्टा कलकत्ता से पटना की जानिब
बहा डाला और यहीं पर जम्हूरियत का क़तल या इज्तेमाई
अस्मत दरी हुई है। ज़ाफ़रानी पार्टी और मोदी
हर वक़्त उल्टा काम करतें हैं ख़िलाफ़े दस्तूर, ख़िलाफ़े क़ानून, ख़िलाफ़े अख़लाक़ काम करतें हैं। शायद बहार आना भी उल्टा ही होगा पहले पैर फिर सर।
फिर यह काम ख़िलाफ़े दस्तूर ख़िलाफ़े आइन और ख़िलाफ़े उसूल हुआ है, जमहूरियत की रूह क्या है, वोह यह की इन्तेख़ाब में जो भी सबसे बड़ी तंज़ीम होगी उसको सबसे पहले सदरे जमुहरिया हुकूमत बनाने का और नुमाइंदगी करने की पेशकश करेगें, हुकूमत बनाने में सबसे बड़े महाज़ का तो तस्सवुर ही नहीं है, फिर भी चलो मान लिया ज़ाफ़रानी सबसे बड़ा महाज़ था तो उसमे सबसे बड़ी तो ज़ाफ़रानी तंज़ीम थी फिर उसने अपने सबसे एहम ओहदे पर एक अदना दर्जे की तंज़ीम के नुमाइंदे को कैसे नामज़द किया। क्योंकि नितीश कुमार को ज़ाफ़रानी तंज़ीम के सरबराहों ने वज़ीरे आला के लिए नामज़द किया है उसको महाज़ के तमाम रकूने असेंबली ने मुंतखिब नहीं किया। यह काम भी ख़िलाफ़े दस्तूर हुआ है, और जमहूरियत की इजतेमाई अस्मतदरी की गई है।
अब यह तो वही बात हुई के अक्सरियत वाली तंज़ीम अपनी बेटी कंगना राणावत को अदना दर्जे की तंज़ीम या अक़लियत के पास भेज रही है और खुद आगे रह कर उस अक़लियत को पेश कर रही है की जितने भी तुम्हारे नुमाइंदे मुंतखिब हो कर आये हैं इसकी खूब इजतेमाई अस्मतदरी करें। अब इस घोड़ी के ऊपर जो भी वज़ीर रकूने असेंबली चाहेगा सवारी करेगा। यह तो ज़ाफ़रानी तंज़ीम का #सियासीजिहाद है।
नाज़रीन एक बात वाज़े है की यह सरकार ज़्यादा दिन नहीं चल सकेगी। क्या बीजेपी के रकूने असेंबली जो अक्सरियत में हैं इस बात को तस्लीम कर पाएंगे या हज़म करेगें की उनके ऊपर एक अदना तंज़ीम या अक़लियत वाली तंज़ीम हुकूमत करे। अब फलसफा वही होगा हम अक्सरियत में होते हुए भी क्या महज़ दरी और कुर्सियां लगाने और उठाने के लिए ही रह गए हैं। अब इसको मालिके मुतलक़ का बदला समझ लो या अपनी बदबख़्ती, बदकारियों, बदकलामी और मुस्लिम दिल आज़ारी का फल। संघी, शिद्दत पसंद, बीजेपी वाले ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ हर वक़्त मुस्लिम अवाम को पंचर बाज़ बोल के तंज़ कस्ते थे। अब हो क्या रहा है अक्सरियत में होते हुए भी यह बीजेपी वाले दरी उठाने लगाने और कुर्सियां बिठाने के काम के रह गए हैं। क्या यह किसी ज़लालत से कम है, यह ऊपर वाले का इन ज़ाफ़रानियों से सख़्त तरीन बदला है, तुम सबसे बड़ी तंज़ीम होते हुए भी अदना रहोगे और तुम्हारे ऊपर एक ऐसा हाकिम होगा जो अक़लियत वाली तंज़ीम से होगा।
नाज़रीन रस्सा कशी तो होगी और हर हाल में होगी, और यह सरकार ज़्यादा दिन नहीं चलेगी, बिल फ़र्ज़ चल गई तो हर वक़्त ज़ाफ़रानी तंज़ीम के रकूनों, शिद्दत पसंद हिन्दू और संघी दहशतगर्दों को इस बात का इल्म और मलाल होता रहेगा की हम अक्सरियत में होते हुए भी अदना हैं, हर वक़्त उनको ज़लालत और बेइज़्ज़ती का जाम पीना पड़ेगा जब उनको अक्सरियत होते हुए महज़ दरी उठाने बिछाने और कुर्सिओं को तरतीब से जमाने के काम के लिए ही वक़्फ़ किया जाएगा।
फिर अगर एहतेजाज किया तो गिरी हुकूमत और अब नितीश को कोई सी तंज़ीम गले भी नहीं लगाएगी क्योंकि सभी को उसकी ग़द्दारी और दल बदलू हिकमते अमली से वक़फ़ियत हो चुकी है। जहाँ फायदा वहां यह ग़द्दार, फिर इसका सेक्युलरिज़म, वतन परस्ती, मस्तूरातों के हुक़ूक़ जैसे तमाम मसले फ़िज़ूल हो जातें हैं। अब ऐसा गधा ना घर का रहता है और ना घाट का। जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने जून २०२० को लिखे एक मज़मून में कर दिया था जिसका उन्वान था गधों की पुकार कैसे बचाएं बिहार.
नाज़रीन मेरे मज़मून और उसके उन्वान को देख कर बोहोत से अवाम इबरत हासिल कर सकतें हैं या गुमराह हो सकतें हैं। बिहार के मुद्दे पर अब वही कैफियत है या तो संघी, शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी वाले जिस ज़हर की काश्त इतने तमाम सालों तक करते रहे जिसकी ज़द में हर वक़्त मुस्लिम अवाम रहता था अगर हुकूमत चलानी है तो उसी ज़हर को अब इनको पीना होगा, पल पल इनको इस बात का एहसास होगा हम अक्सरियत होते हुए भी अदना हैं। हमेशा यह लोग अक्सरियत पा कर भी एहसासे कमतरी में मुब्तेला रहेगें। या नहीं तो हुकूमत गिरेगी। सिर्फ दो ही रास्तें हैं या तो चलेगी या गिरेगी। अगर चलेगी तो बेइज़्ज़ती, ज़लालत का ज़हर पी कर चलेगी या फिर गिरेगी।
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