इज़हारे ख़यालात पर पेलने वालों
मुझे भी चंद अलफ़ाज़ कह लेने दो
सीता,
राधा और लक्ष्मी को मेरे हरम में रहने दो
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
हज़ारों मादाओं के बीच रहा एक ना मर्द
शादी कर के भी जो रहा बेघर,
फिर क्यों करतें हैं उसकी अज़मत काफिर,
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
कगना राणावत को समर्पित
कगना के खोल दूँ तमाम आँचल
बरहना कर दूँ उसको हमबिस्तर
अपनी आँख में जो गया पत्थर
फिर ना कहना चलो ना इस पथ पर
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
जंगलों जंगल भटक रहा, थी हावी उदासी
डाल दी दरमियान में एक लकीर
आया था जब वनवासी
साथ रहा तू भी हर दम एक नारी के
रक्षक के रूप में था तू भी भक्षकवासी,
रात को सीता राम को जगाती,
सुबह को लक्षण को पाती
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
इज़हारे ख़्यालात का मुझको भी है हक़,
क्या ज़हरीले अलफ़ाज़ मेरे ही लिए हैं सबक़
तुम करो तो नादानी, हम करें तो पशेमानी
किसी लंगूर ने दिखा दिया खोल के सीना
और दिया अपना सबूते वफादारी
उसकी वफ़ा में भी थी बेवफाई
जब दिखे सीता के साथ रावण
और राम की हुई रूस्वाई
लव कुश किस की हैं संतान
बना दो इनको भी रावण से राम
हम भी कह सकतें हैं चंद अशार
हमारे मुँह में भी है ज़ुबान
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
ख़तम करो यह धोबी का झमेला
राम रह गया फिर अकेला
करके उसने धोबी के क़ौल पर भरोसा
खोल दिया भरे दरबार अपनी सीता का नाडा
तुम्हारे तास्सुरे ख़्यालात की हिमायत में
वफ़ा और हक़ की कमी है
शब्दों की जब तुम्हारे सीमा नहीं
मुझको भी है हक़,
क्या मेरे पास हैं अलफ़ाज़ अनमोल नहीं
मुझे हक़ है मुझे कहने दो
कगना पर अपना प्यार जता लेने दो
कगना तुम ना हो परेशान
बन जाओ तुम मेरी ज़ुबान
आ जाओ एक बार मेरे हरम में
फिर हो जाएगी खुद ही पहचान।
जुबेर
No comments:
Post a Comment