Thursday, 12 November 2020

मजलिस के फ़ौजिओं के बढ़ते क़दमों से मुख़ालेफ़ीन और हुकुमरान ख़ाइफ़।

अज़ीज़ नाज़रीन,

बिहार इन्तेख़ाब ख़त्म होने और मुस्लिम इत्तेहाद मजलिस की बे पनाह कामयाबी और अवाम में उसकी बढ़ती हुई मक़बूलियत को देखते हुए मरकज़ी ज़ाफ़रानी तंज़ीम, शिद्दत पसंद हिन्दू, दहशतगर्दों के साथ साथ मुख़ालेफ़ीन और ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ भी ज़बरदस्त ख़ौफ़ज़दा हैं।  मजलिस के ६ रकूने असेम्ली की जीत और बेहतरीन कारगरदेगी पर मुबारकबाद देना तो दर किनार,  लगे तमाम मीडिया के ज़ाफ़रानी लंगूर और कांग्रेस के नुमाइंदे असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन की निस्बत से बदगुमानी फैलाने और मजलिस की कारगरदेगी पर नुक़्स निकालने उसकी वजह से ज़ाफ़रानी पार्टी आ गई।   मज़े की बात यह है की ज़ाफ़रानी पार्टी के जो लंगूर और लँगूरनियाँ हमदर्द थे और बीजेपी की जीत पर ख़ुशी से फूले नहीं समाते थे, उनके अलफ़ाज़ और खबरनामे को पढ़ने के अंदाज़े बयान बीजेपी की जीत की ख़ुशी ज़ाहिर कर देती थीवोह भी मजलिस की वजह से ज़ाफ़रानी पार्टी को कोसते हुए नज़र आये।  अगर मजलिस नहीं होती तो ज़ाफ़रानी तंज़ीम नहीं आती और राजद की सरकार बनती।  अगर किसी सहाफी और न्यूज़ एजेंसी ने मुबारक बाद दी है तो वोह है एन डी टीवी के सहाफी, उन्होंने मुजाकेरात शुरू करते ही सबसे पहले मुबारकबाद दी।  

दर असल इन ज़ाफ़रानी सहाफियों को हिदायत ही ऐसी दी गई हैकी जब जब मजलिस कुछ भी बेहतर कारगरदेगी का मुज़ाहेरा करे बदगुमानी फैला दो, बीजेपी को कोसोगे तो भी चलेगा।   अब ऐसी सोच के पीछे की हिकमत क्या है ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी, तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम और संघी दहशतगर्दों को बा खूबी मालूम है की अगर मुस्लिम अवाम के दिलो दिमाग में यह बात चस्पा कर दी गई उनको शक व शुकूक में मुब्तेला कर दिया की मजलिस की वजह से बीजेपी आती है तो वोह मजलिस से छिटक जायेगे। फिर हमारी बदकारी बदबख़्ती पर कोई सी तंज़ीम सवाल ही नहीं करेगी, क्योंकि जब तक मजलिस है और असदुद्दीन जैसे बेबाक सवाल करने वाले नुमाइंदे हैं हमें हर जानिब से घेर कर रखेगें, और हमें उनके तीखे चुब्ते हुए सवालों का जवाब देना होंगें।   रहा सवाल दीगर मुख़ालिफ़ों का तो उन से कैसे निबटना हैं हमको मालूम।   वैसे तो ज़ाफ़रानी लंगूर बीजेपी की जीत पर खुशियां मनातें हैं लेकिन अगर मजलिस जीत कर आये तो उनको बेजीपी की जीत भी खटकने लगती है उसकी वजह ही मजलिस के बे बाक अंदाज़ और हर अवाम से जुड़े हर मसाइल पर हुकूमत से सवाल करने की हिकमत है। 

फिर जिस अंदाज़ में कांग्रेस के नुमाइंदों, ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों ने गलीज़, वाहियात और झूटी बातें कर के मजलिस की निस्बत से बदगुमानी फैलाई थी, उससे उनके पुश्त (पुड्डे, कूल्हे, पिछवाड़े) में लगी हुई आग को साफ़ तोर से महसूस किया जा सकता था।   नाज़रीन जिस हिसाब से तमाम लंगूर और लँगूरनियाँ तमाम मुखालिफ एक सुर में सिर्फ और सिर्फ असदउद्दीन और मजिलस को हर हर मुद्दे पर हाशिये पर रख रहें हैं वोह  मजिलस के बढ़ते हुए ग्राफ और असद के रुतबे, मक़बूलियत में इज़ाफ़े का सबूत है।   दौरान इन्तेख़ाब बिहार कांग्रेस के नुमाइंदे अब्दुल जलील मस्तान ने राहुल गाँधी की मौजूदगी में एक इजलास से ख़िताब करते हुए बोला की असदुद्दीन के हाथ पैर काट कर उसको हैदराबाद पार्सल कर देंगे।  

बिहार इन्तेख़ाब ख़त्म होने के बाद राजदीप सरदेसाई के एक सहाफी इजलास में कांग्रेसी तर्जुमान पवन खेड़ा निहायत ही निचले और अदना दर्जे से असदुद्दीन को मुखातिब करतें हैं और बोलतें हैं की यह मेरा स्तर नहीं की में हर किसी जिनको में जानता भी नहीं उनकी बात पर तब्सिरा दूँ।

फिर उन्होंने अपनी तंज़ीम कांग्रेस की मौवाफ़ेक़त करते हुए इलज़ाम लगाया की हमने कभी भी दहशत को फरोग नहीं दिया और ना ही हम शिद्दतपसन्द को फरोग देंतें हैं।   लेकिन असदुद्दीन ओवेसी और उनकी तंज़ीम मुस्लिम नौजवानों में शिद्दतपसन्दी को फरोग दे रहें हैं, और ख़ौफ़ पैदा कर के वोट लेते हैं।अब अवाम खुद ही ते करे की जिस तंज़ीम कांग्रेस के सरबराह राहुल गांधी की मौजूदगी में इन्तेख़ाबी इजलास में उनका नुमाइंदा हाथ पैर काटने के बात करे और पार्सल भेज देंगे ऐसी बात कर तो कौन सी तंज़ीम शिद्दतपसनदी को फरोग देती है, और कौन सी हक़ पसंदी को।  

इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के शिद्दतपसन्द सोच के ज़ाफ़रानी लंगूरों को माक़ूल जवाब और सबक़ सिखाना चाहिए।   असल में हो क्या रहा है जितने भी नपुंसक हैं जो की जंग में मुक़ाबला कर के जीत हासिल नहीं कर सकते तो दहशतगर्दों और ज़ाफ़रानी ज़ालिम फ़ौजिओं (नेताओं) से अपनी इज़्ज़त (महिलाओं) का सौदा करते।  जब सौदा हो जाता तो यह दहशतगर्द, ज़ालिम फौजी (ज़ाफ़रानी नेता-बीजेपी) इनका और इनकी इज़्ज़त का इसतेसाल (शोषण) करते हैं।   अब होता क्या है जो भी बिल पार्लियामेंट में पेश होता पहले से दहशतगर्द मुख़ालिफ़ों की गर्दन पर तलवार रख कर उनको ब्लेक मेल करते की हमारे बिल को पास होने देना और कोई रुकावट पैदा मत करना नहीं तो तुम्हारी गर्दन क़लम। फिर ऐसे नपुंसक, डरपोक, ख़ौफ़ज़दा फौजी अपनी गर्दन बचाने के लिए मुस्लिम अवाम की गर्दन का सौदा कर डालते और मरते कौन हैं मुस्लिम।  

क्योंकि २०१४ के बाद जितने भी मुस्लिम मुख़लिफ़ बिल पास हुए उनमे मुख़ालिफ़ों का मनफ़ी किरदार रहा, नहीं तो एक भी बिल मुस्लिम नस्ल कुशी की निस्बत से पास ना होता।   और उन सब में कांग्रेस, सपा, एन सी पी, तृणमूल, राजद, जनता दल यूनाइटेड, लेफ्ट और जितनी भी तंज़ीमे हैं उन सब ने मिल कर हुकूमत को बराहे रास्त या बिला वास्ता हिकमत से मदद की और बिल पास हो गया।   राज्य सभा में ज़ालिम फ़ौजिओं की अकसरियत ही नहीं है फिर कैसे मुस्लिम नस्ल कुशी के तमाम बिल पास हो गए।   किसी नो निहाद सेक्युलर तंज़ीमों ने बिल को सपोर्ट किया तो किसी ने वाक आउट किया।   अगर यही वाक आउट ना करते हुए बिल में मुखालिफ वोट करते तो बिल ही गिर जाता, लेकिन तलवार जो गर्दन पर रखी हुई थी।

तंज़ीम के सरबराह की गर्दन जो तलवार रखी हुई थी उससे सर क़लम हो जाता।  बीजेपी, शिद्दत पसंद, और संघी दहशतगर्दों को भी कांग्रेस, सपा, तृणमूल, जनता दल, राजद, एन सी पी या किसी और सेक्युलर तंज़ीम के मुस्लिम नुमाइंदों से कोई गीला नहीं है क्योंकि उनको मालूम हैं की यह मुस्लिम नुमाईंदे गुलाम हैंइनकी सोच गुलाम, इनका किरदार गुलाम इनकी ज़ुबान गुलाम यह वैसा ही बोलेगें या करेगें जैसा की इनकी तंज़ीम कहेगी।   और मुस्लिम मफ़ात और अकलियतों के किसी भी मुद्दे पर यह ज़ाफ़रानी तंज़ीम के ज़ालिम फौजी तंज़ीम के सरबारह को ही क़ैद कर लेते हैं और गर्दन पर तलवार रख देतें हैंफिर जो कुछ भी हुकुम तंज़ीम की जानिब से होता है मुस्लिम नुमाइंदों को मिला कर सब वैसा ही करतें हैं। 

ज़ाफ़रानी तंज़ीम को मालूम हैं की हम जो कुछ भी सेक्युलर तंज़ीमों के साथ करतें हैं वोह असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मजलिस इत्तेहादुल मुस्लेमीन के साथ नहीं चलेगा।   यह शक्स गर्दन क़लम करवा लेगा लेकिन हक़ से ग़ाफ़िल नहीं होगा, और इन ज़ाफ़रानिओं को इज़ा और ज़र्ब भी मजलिस से ही पहुँचती है जब किसी भी ना ज़ेबा बिल या ख़िलाफ़े दस्तूर बिल पेश होता है तो मजलिस सख़्ती से एहतेजाज करती है और बिल के पास होने में रोड़ा डालती है।   फिर वोह बात ऐवान की कारवाही में मुख़लिफ़ वोट भी पड़े थे इस बात की गवाही भी दर्ज हो जाती है।

दरअसल तमाम सेक्युलर तंज़ीमों को मुस्लिम मसाइल हल नहीं करना हैं बस उनके वोट पर ऐश करना हैमजलिस से सख्त नाराज़गी की दूसरी वजह है की इन तमाम तंज़ीमों को मुस्लिम वोट तो चाहिए लेकिन मुस्लिम क़यादत नहीं।   में इन तमाम नो निहाद सेक्युलर तंज़ीमों बीजेपी को मिला कर एक सवाल करता हूँ, चलो आपको मजलिस की क़यादत क़ुबूल नहीं तो आपने कितने मुस्लिम नुमाइंदों को अपनी ताज़ीम का सरबराह और सदर बनाया।  आज तक शायद आज़ाद भारत में किसी भी तंज़ीम ने अपना सदर कोई मुस्लिम नहीं बनाया होगा।   आप तो मुस्लिम वोट तक़सीम ना हो जाएँ इस बात की फ़िक्र करते हो तो आपने क्यों किसी मुस्लिम को सदर नहीं मुंतखिब किया।   जिसके हुकुम पर तमाम तंज़ीम काम करे।   है कोई सेक्युलर तंज़ीम जो कहे की हमने किया है।       

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