अज़ीज़ नाज़रीन
नसरानी एजेंट ज़ाफ़रानी दहशतगर्द और बीजेपी वालों के दिलों दिमाग़ पर ईमान वाले मुसलमानों का एक ख़ौफ़ तारी हो चूका है। जिसकी वजह से यह नसरानी एजेंट, ज़ाफ़रानी, हीले बाज़ी और झूट से अपने डर का इलाज कर रहें हैं। कभी कोई नसरानी एजेंट उठ कर मदरसों पर तनक़ीद कर बैठता है, कभी लव जिहाद, कभी क़ुरान, कभी वली अल्लाहों की बेअदबी और कभी तो गाये के नाम पर सियासत। एक जानिब जहाँ इंसानो को खाने को गाये का गोश्त नहीं मिल रहा है वही एक नसरानी गुलाम ज़ाफ़रानी ने गाये के लिए अलहदा वाज़ारतख़ाना खोल दिया क्या यह हमारे टैक्स का नाजाइज़ इस्तेमाल नहीं है। ठीक है खोलो वाज़ारतख़ाना लेकिन फिर हमको इसकी गर्दन काट कर ज़िबह करने की इजाज़त भी दो। जब गाये के दूध, घी, दही, मक्खन की डेरी हो सकती है तो गाये, बैल के गोश्त की दुकाने काहे को नहीं हो सकती जिस तरह दूध डेरी सरे बाजार रोड पर होती है उसी तरह गाये, बैल के गोश्त की दुकानों का भी एहतेमाम किया जाए। कभी मौलाना साद साहब, तब्लीग़ी जमात, ज़ाकिर नाइक जैसे दानिशमंदों और कामिल ईमान वालों के ऊपर सख़्त तरीन तनक़ीद और झूठे केस लादना इस बात की दलील हैं की नसरानी एजेंट ज़ाफ़रानी सख्त ख़ौफ़ज़दा हैं, और उनको उनकी मौत दिख रही है।
यही वजह है की ईमान वाले मुसलमानों के ऊपर यह नासरानी एजेंट ज़ाफ़रानी काफिर बेहद गर्द ग़ुबार निकालते रहतें हैं, क्योंकि यह लोग इन ईमानवालों से बेहद ख़ौफ़ज़दा हैं, और इन ईमान वालों का कोई शैतान, दरिंदा, कसाई, हिन्दू दहशतगर्द, ज़ालिम, जल्लाद भी कुछ नहीं बागड़ पा रहा है, चाहे वोह
१
साधू हो,
२
अमित,
३
मोदी हो या
४
कोई डाककन
५ चुड़ैल।
क्योंकि जब एक ईमान वाले को यह ज़ालिम इज़ा पहुंचाने की कवायत करतें हैं तो उसका उल्टा कर के मालिके मुतलक़ इनही लोगों के ऊपर वोह आफत और बला दोगुनी ताक़त और क़ुव्वत के साथ लौटा देता है। कभी कभी इन रूहानी आलिमों और दीने इस्लाम के सतूनों को इल्म हो जाता है की कोई शैतानी ताक़त हमको या हमारे एहले ख़ाना को इज़ा पहुंचाने के लिए भेजी गई है बस फिर क्या है इन आलिमों का जो क़ुरान और हदीस के हिसाब से इल्म होता है उससे यह आलिम उस शैतानी ताक़त को वापिस उसी जानिब दो गुनी ताक़त से वापिस लोटा देतें हैं जहां से भेजी गई थी और जिसने भेजी थी।
आज के दौरे हाजरा में जिस रूहानी इल्म को कादयानी दज्जाल बिदअत बताते हैं और बुज़ुर्गाने दीनों के लिए शक और वस्वसे डालतें हैं वही इल्म सूफियाने किराम के पास मौजूद था और अल्लाह के वली ख्वाजा ग़रीब नवाज़, निज़ामुद्दीन ओलिया बू अली शाह क़लन्दर उसी रूहानी ताक़त के जारिए शैतानों को काबू में रखते थे और उस दौर के इन्साफ पसंद बादशाहों पर नज़रे करम रहती थी। यह बात भी तारीख़ के सफों में दर्ज है की जिस बादशाह से कोई सूफी या अल्लाह का वली खुश हो गया तो उसके वारे न्यारे हो जाते थे, फिर वोह किसी भी जंग में शाकिस्त नहीं पाता था।
अब चलिए दिनी आलिमों रूहानी ताक़तों इस्लामिक फलसफे बाज़ों के बाद अब बात करतें हैं सियासत के हल्क़े की। जिस हिसाब से नसरानी एजेंट ज़ाफ़रानी सच्चे मुसलमान, रूहानी ताक़तों और सच्चे इस्लामिक फ़ल्सफ़ेबाज़ों दानिशमंदों से ख़ौफ़ज़दा होते हैं वही ख़ौफ़ और डर इन ज़नख़ों (हिजड़ों-नपुंसकों) का सियासत में ओवेसी ब्रादरान और उनकी बेहद मक़बूल और तेज़ी से उभरती हुई तंज़ीम मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन की निस्बत से है।
असदुद्दीन, अकबरुद्दीन या उनकी तंज़ीम मजलिस के किसी भी नुमाइंदे का नाम आने पर इन लोगों को बुख़ार हो जाता है और जुलाब हो जातें हैं, अब इन ज़नख़ों (नपुंसको) में इतनी क़ुव्वत तो रहती नहीं है की खुद आ कर मैदाने जंग में मर्दे मुजाहिद से मुक़ाबला करें तो साजिश करतें हैं खुद में इतनी क़ुव्वत नहीं के अपनी अहलिया को संभाल सके लेकिन इलज़ाम तराशी और अवाम को शक वा शकूक में मुब्तेला करना कोई इनसे सीखे। मजलिस के नुमाईंदे तो अकलियतों के वोट बाँट कर बीजेपी को फायदा पहुचातें हैं।असदुद्दीन बीजेपी की बी टीम हैं असदुद्दीन तो बीजेपी से पैसा खा कर मुस्लिम मफ़ात के खिलाफ काम करतें हैं। और ऐसे इल्ज़ामात कभी यह साजिशी ज़ाफ़रानी कीड़े मुनाफ़िक़ मुस्लिम उलेमाओं और ज़र ख़रीद मुस्लिम सियासतदानों के ज़ारिये लगवाते हैं कभी खुद संघ, शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी के नुमाइंदे लगाते हैं, इनको मालूम हैं अगर मजलिस सियासत में हमारे मुक़ाबले में रही और महज़ १ नुमाइंदा (शेर) मुंतखिब हो कर आ गया तो वोह अकेला ऐवान में हम तमाम गीदड़ों को चीर फाड़ डालेगा। इसलिए बदगुमानी हम ही फैला देतें हैं ताके मुस्लिम अवाम को भरोसा ज़्यादा हो जब खुद मुस्लिम ओलेमा और सियासतदां इलज़ाम लगा रहें हैं बीजेपी का नुमाइंदा बोल रहा है तो बात में सच्चाई तो होगी, दूसरी बात अवाम शक में मुब्तेला हो जाएगा की कोई भी तंज़ीम खुद अपनी पार्टी के खिलाफ क्यों बोलेगी बात में सच्चाई होगी तभी तो बोलेगी। लेकिन यह ओलेमा बिकाऊ होतें हैं इनको क़ौम, मज़हब और मिल्लत से नहीं बल्कि अपनी मुनाफ़ेक़त से मतलब होता है, और बीजेपी के नुमाइंदे साजिशी घोड़े जो सिर्फ और सिर्फ इंतेखाब के वक़्त ही बहार निकलते हैं उसके बाद अगले इंतेखाब तक अस्तबल में क़ैद कर दिए जातें हैं।
लेकिन सच्ची बात यहाँ पर भी वही है यह लोग सख़्त ख़ौफ़ज़दा हैं असदुद्दीन अकबरुद्दीन के बढ़ते हुए क़दमों और सयासत में उनकी क़ुव्वत और ताक़त से यह लोगों बेहद घबरा गए हैं।
यही वजह है नसरानी गुलाम ज़ाफ़रानी जब चारो जानिब से घिर जातें हैं और उनको अवाम की तल्ख़ ज़ुबानी की कोई ततबीर नहीं सूजती है तो वोह लायानी मुद्दों पर अवाम का ज़हन भटकाना चाहतें हैं। अब यह लोग इतने बोखला जातें हैं की पोरस के हाथी की तरह खुद अपनी ही फौज को कुचल देतें हैं और ग़ैर क़ानूनी, ख़िलाफ़े दस्तूर बिल बनाना शुरू कर देतें हैं और ऐसे में यह जाहिल पहले से मज़ीद दिमागी मुफ़लिस और मरीज़ लगने लगतें हैं।
जहाँ तक मजलिस का सवाल है और ख़ास असद (शेर) वोह कभी भी ग़ैर अख़लाक़ी, ग़ैर क़ानूनी ख़िलाफ़े दस्तूर बात नहीं करतें हैं और ना ही वोह किसी ऐसे क़ानून की हिमायत करेंगे यह ज़ाफ़रानियों को पता हैं, यही वजह है मजलिस इन लोगों को हर थोड़े थोड़े वक़्फ़े के बाद अंगार लगा देती है। वोह भी क़ानून और दस्तूर के दायरे में रह कर। हाल ही में बिहार के मजलिस के सदर और मुंतखिब रकूने असेंबली जनाब अख्तरुल ईमान ने हिन्दुस्तान के नाम से हलफ लेने के बजाये भारत के नाम पर हलफबरदार हुए। वैसे भी दस्तूर में कही भी लफ्ज़ हिन्दुस्तान नहीं आया है बल्कि जहाँ कहीं भी ज़िक्र है वोह भारत ही के नाम से है। अब ऐसी क़ानूनी पेचीदगी और दस्तूर के अंदर रह कर किये हुए काम संघी दहशतगर्दों, बीजेपी वालों और शिद्दत पसंद काफिरों के पिछवाड़े अंगार की बत्ती लगा कर उनको उड़ाने जैसा है। मजलिस तो ऐसे ही काम करती है और कीजिये जो दस्तूर और क़ानून के दायरे में होतें हैं। फिर यह नसरानी गुलाम ज़ाफ़रानी अपना आपा खो बैठतें हैं गुस्से से लाल हो कर हर काम गैर क़ानूनी और ख़िलाफ़े आईन कर बैठतें हैं। संघियों का शिद्दतपसन्द काफिरों का बीजेपी वालों का पिछवाड़ा लाल करना है तो असद उद्दीन अकबरुद्दीन और मजलिस को पिटाई करने लगा दो। जब तक यह संघी माफ़ी नहीं मांग लेते यह लोग पीटते रहते हैं दे दना दन। १५ मिनिट ज़िन्दगी भर याद रहेगें काफिरों को।
यही वजह है की मजलिस से संघ और नसरानी गुलामों ज़ाफ़रानियों को हद दर्जे का ख़ौफ़ और डर है अगर मजलिस का एक शेर भी आ गया तो हम तमाम गीदड़ों को हलाक कर डालेगा। इनको ख़ौफ़ है की भारत में हम १०० करोड़ के लिए तो मजलिस के १५ करोड़ ही काफी हैं। और ऐवान में ३६५ के लिए महज़ ५ शेर।
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