आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच गुजिश्ता २७-२८ दिनों से जारी ज़बरदस्त जंग अब इक़्तेदाम पर पहुंच गई है और अर्मेनिया ने अपनी हार क़ुबूल कर ली है। अज़रबाइजान ने अपने तमाम एहम शहरों को अर्मेनिया के ना जाइज़ क़ब्ज़े और ज़ुल्म सितम से आज़ाद करवा लिया है। अज़रबाइजान का ख़ास और बड़ा शहर नागोना करबाग़ में अज़रबाइजान ने ज़बरदस्त कारकर्दगी करते हुए अर्मेनिया के फौजी ठिकानों और रसद को तबाह कर दिया और अर्मेनिया फ़ौजिओं को नेस्त नाबूत कर के वापिस से उस शहर पर क़ब्ज़ा हासिल किया है। अज़रबाइजान की फौजें जब शहर में दाख़िल हुई और अर्मेनिया की फौज की जड़ें जब उखाड़ फेंकी तब अर्मेनिया के मौवाफिक़ और हमदर्द तमाम अवाम डर और ख़ौफ़ज़दा हो कर भागने लगे एक तरफ एक एक क़ाबिज़ फौजी को अज़रबाइजान के बहादुर फौजी चुन चुन के मौत के घाट उतार रहे थे तो दूसरी जानिब अवाम अपनी फौज और मुल्क की हार पर ग़मज़दा ख़ौफ़ से या तो मर रहे थे या जान बचा कर भाग रहे थे। जब तक अज़रबाइजान की फौजों ने पूरी तरह से एक एक ना जाइज़ अर्मेनियाई घुस्पेठिये से पाक नहीं कर दी और उस शहर को वापिस से अपने क़ब्ज़े में नहीं ले लिया तब तक लड़ते रहे।
अज़रबाइजान की जीत के बाद रूस ने अज़रबाइजान से गुज़ारिश की है
की वोह नागोर्ना कारबाग़ में मुक़ीम चर्चेस की हिफाज़त और तहफूज़ की ज़ामिन ले। जिसके बाद
बरोज़ पीर ०९ नवम्बर २०२० को रूस इन दोनों मुल्कों के दरमियान एक सालिस का किरदार अदा
करते हुए एक अमन मोहाइदा करवा पाने में कामयाब रहा.
जिस तरह से भारत ने तोसीह की (विस्तारवादी नीती) के तहत कई मुस्लिम इलाक़ों जम्मू कश्मीर, भोपाल, जावरा, जूनागढ़, हैदराबाद ऐसे कुछ १५ मुस्लिम रियासतों पर ना जाइज़ क़ब्ज़ा कर रखा है उसी तर्ज़े अमल पर नागोर्नो और काराबाख़ का इलाक़ा अज़रबाइजान की मिलकियत थी। उसको आलमी सतह पर भी अज़रबैजान का हिस्सा तस्लीम किया जाता है, मगर १९९४ से वो इलाक़ा वहाँ रहने वाले नस्लीय आर्मीनियाई अवाम के हाथों में है.
रूस की जानिब से करवाये गए अमन क़रार से अज़रबैजान में तो ख़ुशी की लहर देखी गई, पर आर्मीनिया में कुछ लोगों ने इसे लेकर ग़म और गुस्से का इज़हार किया है।
अमन मुहायदे की शर्तों के हिसाब से अज़रबैजान उन इलाक़ों पर अब अपना इख़्तियार कायम कर सकेगा जिन्हें उसने लड़ाई के दौरान आर्मीनिया से हासिल किया है.
'अज़रबैजान की फतह और आर्मीनिया की शाकिस्त'
इसके अलावा, आर्मीनिया की हुकूमत अगले कुछ हफ़्तों में और बोहोत से कई ग़ैर फौजी इलाक़ों से भी पीछे हटने के लिए राज़ी हो गई है.
आर्मीनिया में जो अवाम इस क़रार से नाख़ुश और ग़मगीन हैं वो एहतेजाज करने के लिए बाहर निकल आए हैं.
कुछ एहतेजाजिओं ने हुकूमत के ज़ेरे इंतिज़ाम इमारतों को नुक़सान पहुँचाया है और वो वज़ीरे अज़ाम से इस्तीफ़ा देने की माँग कर रहे हैं.
अज़रबैजान में जश्न
इस वक़्त 'बाकू में जश्न का माहौल है.' सड़कों
पर अज़री परचम लगाये गए हैं. अवाम को देखकर लगता है कि उन्हें अपनी 'जीत का एहसास' है जो उन्हें हफ़्तों चली जंग के बाद मिली है.
बाकू की सड़कों पर, कुछ जगह अवाम के घोल को वतनपरस्ती की नग़मे गाते सुना जा सकता है.
एक जगह हमने देखा कि दो युवा छात्रों ने एक बैनर पकड़ा है, जिसपर लिखा था- 'दुनिया का बता दो, हम घर लौट रहे हैं.'
सहाफी जुबेर ने अज़रबाइजान-अर्मेनिया को मसलाये कश्मीर से दी शबाहत।
जिस तरह से अज़रबाइजान ने दरअंदाज़ (घुसपैठिये) अर्मेनिया के ना जाइज़ क़ब्ज़े से अपने इलाक़े आज़ाद करवाए हैं और आलमी बारादरी ने १९९४ के बाद उनको फिर से अज़रबाइजान का तस्लीम किया है उसी तरीक़ेकार हिकमत अब भारत जैसे दरअंदाज़ (घुस्पेठिये) और दहशतगर्दों के ज़ुल्म से पाकिस्तान के इलाक़ों जम्मू और कश्मीर पर जो ना जाइज़ क़ब्ज़ा था उसको पाकिस्तान का तस्लीम करना चाहिए। इस जंग को भी १९९० से लड़ा जा रहा है और भारत के ज़ुल्म सितम दहशत और ना जाइज़ क़ब्ज़े को बंदूक की गोलियों से जवाब दिया जा रहा है। हाल ही में अगस्त २०१९ में जब भारत ने मज़ीद हिन्दू दहशतगर्द और दरअंदाज़ जम्मू और कश्मीर में भेजे थे तब से ले कर अब तक हालात और भी सख़्त नाज़ुक हो चुके हैं।
कश्मीर की मुक़ामी क़ियादत अब यह तस्लीम कर चुकी है चाहे वोह अब्दुल्ल्हास हो या मुफ्ती के भारत की ज़ाफ़रानी ज़हर और शिद्दत पसंद अवाम भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं। वोह कब गले लग कर गदर्न क़लम कर देंगे उनका भरोसा ही नहीं। दूसरी बात इस सहाफी का मानना है दस्तूर, क़ानून, सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे मुल्क में दयानतदारी और ईमानदारी से काम करतें हैं जहाँ हुकूमत के नुमाइंदे आज़ादाना माहौल में काम कर सकें, गुलाम माहौल में सर पर हूकूमशाई की बंदूक भगवा आदेश के ख़ौफ़ में नहीं।
जब किसी भी मुल्क पर दहशत और बंदूक से कब्ज़ा होता है तब कोई
भी जमुहरियाई तंज़ीम चाहे वोह ऐवान हो, सदरे जमुहरिया हो, सुप्रीम कोर्ट हो, फौज, रिज़र्व
बैंक हो, तहक़ीक़ाती
इदारे हों, चीफ इलेक्शन
कमीशन हो या और कोई ज़ेरे हुकूमत काम करने वाली तंज़ीम हो वोह सब गुलाम हो जातें हैं। अब जैसा बंदूक रख कर दहशतगर्द हुकूम जारी करतें
हैं किसी भी इदारे में इतनी क़ुव्वत और ताक़त नहीं रहती की उस हुकूम की अदूली कर सकें
अगर किसी जज या कोई और मुलाज़िम ने की तो उसकी गर्दन क़लम हो जाती है। अब ऐसी सूरत में सुप्रीम कोर्ट का हुकूम,
ऐवान का बिल या इंतेख़ाब का मरहला यह सब एक झलवा है ढकोसला है।
जब बात चीत की टेबल के बजाये दहशत गर्दों को हुकूमत का तहफूज़ हो, और हुकूमत ख़ुद दहशत के ज़ेरे साये काम कर रही हो, जब बंदूक सर पर रख कर अदालत में जुर्म क़ुबूल किया जाने लगे और ऐवान में क़ानून बनाने वाले भी मज़हब, नुत्फे और दहशत की बुनयाद मुंतखिब हो कर आने लगें। जब इंतेख़ाब एक मज़ाक़ मात्र बन जाए और इन्तेख़ाबी मरहले को भी एक ख़ास मज़हब और मुल्क के नाम पर मुत्तसिब किया जाने लगे जब चीफ इलेक्शन कमिश्नर आज़ादाना फैसले लेने के बजाये गुलामों की तरह बर्ताव करने लगे तो फिर ऐसे मुल्क में अब जमहूरियत के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है, और ऐसे मुल्क के ऊपर अब भरोसा करना बेवकूफी है और कुछ नही।
जिस अंदाज़ में फ़ारूक़ अब्दुल्लाह पुर एतेमाद थे की उनको ३७० वापिस चाहिए और वोह जब तक कश्मीर का ख़ुसूसी दर्जा वापिस नहीं मिल जाता वोह लड़ते रहेंगे। यह सहाफी उनसे सवाल करता है चलो हूकूमते हिन्द ने बेन अक़वामी दबाव में आ कर तुमको ३७० और ३५ ए की भीक दे भी दी, तो क्या तुम भारत की उस ख़ैरात (चैरिटी) पर अब ज़िंदा रह सकोगे और अपने आपको भारतीय ज़ुल्म, दहशत, इज्तेमाई खून रेज़ी से मेहफ़ूज़ समझ सकोगे। कब तक तुम उस भारत की ख़ैरात पर ज़िंदा रहोगे, जब कभी भी ज़ाफ़रानी दहशत सर पर चढ़ा की ख़ैरात वापिस ले की जाएगी। २०१९ में क्या हुआ ७० साल पुराना मसला ७ मिनिट में सिर्फ एक दहशतगर्द अमित के हुकुम के वजह से सूली पर चढ़ा दिया गया।
अब ऐसा धोखा तुम्हारे साथ ना हो तो उसकी सिर्फ दो सूरतें हैं एक कश्मीर का पाकिस्तान के साथ ज़म होना या फिर आज़ादी तीसरा कोई और रास्ता इख़्तेयार करोगे तो तुम्हारी नस्ले उसको भोगेगी, जिस तरह से शेख अब्दुल्ल्हा की गुस्ताखी और उसका भारत पर यक़ीन उसके दस्तूर पर एतेमाद की वजह से आज तक कश्मीर की नस्ले बर्बाद और तबाह हो रही हैं।




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