अज़ीज़ नाज़रीन
दिल्ली फिर से बंद हुई, वज़ीरे आला ने दिल्ली को फिर से क़ैद करने का हुकुम सुनाया है।बादशाह मोदी की तरह भगवा हूकूमशाही हुकुम जारी किया है। वजह वही पुराना मर्ज़ यानी करोना वबा की तीसरी क़िस्त जिसने दिल्ली में कोहराम मचा रखा है।
नाज़रीन २०१४ के बाद से हर कुछ अर्से के बाद ज़ाफ़रानी (भगवा) सज़ा या ज़ाफ़रानी (भगवा) हूकूमशाही की लम्बी फेहरिस्त है। जिस हिसाब से हर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द अपने हिसाब से सज़ा की तजवीज़ कर के एक बेगुनाह को ज़ाफ़रानी सज़ा दिया करते थे उसी हिसाब से दिल्ली के मासूम अवाम को भी ज़ाफ़रानी सज़ा और ज़ाफ़रानी हुकुम का सामना करना पड़ रहा है और असली मुजरिम तो मज़े लूट रहें हैं।
ना सिर्फ दिल्ली में बल्कि तमाम हिन्द में मौजूदा हालात के लिए ज़ाफ़रानी ज़िम्मेदार हैं, ना वोह ज़ुल्म की तमाम हदें पार करते और ना ही क़ेहरे इलाही के मुर्तक़िब होते। रहा सवाल दिल्ली का तो फ़रवरी २०२० को शायद ही कोई बविक़ार इंसानियत पर यक़ीन रखने वाला भूल सकेगा। यह बात अलहदा है की अब हिन्दुस्तान में अगर कोई इंसानियत की इन्साफ की बात करता है तो वोह सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम, सिख और क्रिस्टी ही होंगे। जहाँ तक एहले हुनूद हैं उनमे से बा मुश्किल १% के क़रीब ही बचे होंगे जो अब इन्साफ, इंसानियत और गंगा जमुना तहज़ीब की ना सिर्फ बात करतें होंगे बल्कि हक़ीक़ी उसका मुज़ाहेरा भी करते होंगे। सयासत का जहाँ तक सवाल है ९९% सयसतदाँ अक्सरियत तबक़े की नुमाइंदगी पर यक़ीन रखते हैं या अक्सरियत वाली जम्हूरियत देखना चाहतें हैं, चाहे वोह कांग्रेस हो, नेशनलिस्ट कांग्रेस हो, आप हो, या कोई और जमात।
दौरे हाजरा में जो दिल्ली की हालत है उसके लिए भी ज़िम्मेदार ज़ाफ़रानी दहशत और ज़ाफ़रानी ज़ुल्म और ज़ाफ़रानी सज़ा देने की तरीक़ेकार हिकमते अमली ही है। दिल्ली को तक़सीम कर के बाक़िया हिन्द के हिस्सों से अलहदा करने में भी ज़ाफ़रानी हुकुम (भगवा आदेश) ही ज़िम्मेदार है। फ़रवरी २०२० में जो ज़ाफ़रानी हुकुम की फरमाबरदारी करते हुए क़त्ले आम किया है जो दहशत मचाई है उससे दिल्ली टूट गई। दिल्ली दिल वालों की है और जब दिल ही टूट जाए तो वोह जगह भी टूटती है। जो ज़ाफ़रानी हुकूमत ने दरन्दाज़ों गुज्जु, यूंपी, हरयाणा (घुसपैठियों) को बुलवा कर कर दिल्ली में क़त्ले आम किया था, टूट गई दिल्ली। दिल्ली की तहज़ीब ख़तम, दिल्ली की यह तहज़ीब तो नहीं थी की किसी दुसरे की इबादतगाह को तहस नहस कर दिया जाए। निज़ामुद्दीन औलिया सूफियों के उसूलों को तोडा तो अब दिल्ली भी टूटेगी। इन नसरानी गुलामों ज़ाफ़रानीओं को शायद वलिओं की करामात नहीं मालूम थी अब पता पड़ेगी। वली की ताक़त दुनिया से पर्दा करने के बाद भी वही होती है जो हयाते ज़िन्दगी में रहती है।
इन सब बदआमालियों में ना सिर्फ ज़ाफ़रानी दहशतगर्द शामिल थे बल्कि पुलिस के आला अफसरान भी शामिल थे, पुलिस ने खुद दहशतगर्दों के साथ मिल कर मुस्लिम अवाम का क़त्ले आम किया है। रोड पर लिटा कर मुस्लिम नवजवानों को ज़र्ब मार पीट करना और उनसे दहशतगर्दों का पसंदीदा नग़मा जन गण मन……………. और वन्दे ……………… गाने लगवाना। नफरत है हिन्द के वजूद से और उसके किसी भी वतन परस्ती के नग्मों से भारत के परचम से, आग लगा दो ऐसे परचम को और ऐसे नग्मों की किताबों को जिसको दहशत मचा कर बलजबरी से अवाम को गाने लगाया जाए और गाने के लिए अवाम को अपने जान की क़ुर्बानी देनी पड़े।
नाज़रीन यहाँ दो बातें आपको जेहेनशीन करनी होंगी, एक इंसान अपनी क़ुव्वते जिस्मानी और अंदुरनी रूह के साथ किसी परचम को उठा कर ग़द्दारों को (ज़ाफ़रानी, नसरानी) आज़ादी के नग़मे गाता है और ललकारता है चल चला गोली नासरानी, ज़ाफ़रानी फिर ऐसे में गोली चलती है तो वहो वतन परास्त कहलाता है। लेकिन दिल्ली में ज़ाफ़रानी दहशत ने पहले अवाम के दिलों दिमाग में तरंगे परचम के खिलाफ दहशत डाली वतन परस्ती के नगमे डर और ख़ौफ़ के माहौल में पढ़ने लगाए फिर गोली मार दी।
में नहीं पड़ता कोई सा भी वतन परस्ती का नग़मा और ना ही तिरंगा परचम हाथ में उठाता हूँ। मेरे दिल में तरंगे की कोई औक़ात और हैसियत नहीं रही मेरे दिल के किसी भी हिस्से में कोई उस परचम को उठाने वाला ना रहा। में नहीं पड़ता जन गण मन क्या करते भगवत साहब मेरा, मेरे गर्दन के ऊपर छुरी भी रख दो तो भी नहीं पढ़ूगा यह तराना जो की दहशत मचाता है और मुस्लिम अवाम की नस्लकुशी के लिए ज़िम्मेदार है।
आज ज़ाफ़रानी हुकूमतें दो इश्क़ करने वालों के दरमियान विलन का काम कर रहीं हैं दो इश्क़ करने वालों को जुदा करने के क़ानून बनाये जा रहें हैं। अगर प्यार किया तो ५ साल की सज़ा। फिर वही फलसफा इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों का मुल्क के ऊपर काहे को नहीं लागू होता है। जब दो मोहब्बत करने वालों को ५ साल की सज़ा तो हिन्दुस्तान से मोहब्बत करने वालों को भी सज़ा होना चाहिए। यह केसा फलसफा है एक मोहब्बत करने वालों (लड़का-लड़की) को सज़ा और दूसरी मोहब्बत (हिन्द) करने वाले को मज़ा।
एक बात एक दम वाज़े अलफ़ाज़ में यह सहाफी हर मुस्लिम नौजवान और दुख्तराने मिल्लत से कहना चाहता है। चाहे कुछ भी हो जाए हर हाल में अगर बिल फ़र्ज़ किसी ग़ैर मुस्लिम से इश्क़ में पड़ जाओ तो पहले उसे मुस्लिम करो, पूरी क़ानूनी हिकमते अमली के साथ पहले उसे इस्लाम में लाव फिर निकाह करो। बनाने दो इनको कोई भी क़ानून लेकिन जो अल्लाह का क़ानून है उससे डरोगे तो दुनिया तुमसे डरेगी। बोलने दो ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों को लव जिहाद साबित करो कोर्ट में की हमने लव जिहाद किया है। बगैर इस्लाम में लाये लड़का और लड़की मुख्तलिफ मज़हब के होने पर दोनों ज़िनाकारी करतें हैं और उस घर के आस पास के ४० घरों का रिज़्क़ तंग हो जाता है और अल्लाह की लानत उसके फरिश्तों की लानत उस तमाम बस्ती और ख़ास उस घर पर पड़ती है, जहाँ ज़िना होता है। दूसरी बात पैदा होने वाला बच्चा हरामी होता है, भले ही उसको दुनिया के हिसाब से नाम मिल जाए लेकिन अल्लाह की लानत और फिटकार उसके पीछे पीछे रहती है,
तो इस चीज़ का सख़्ती से ख़्याल रखें अगर किसी ग़ैर मज़हबी से शादी करना है तो पहले उसको मज़हबे इस्लाम में दाख़िल करें फिर तरतीब के साथ निकाह करें। होने दो दुनिया को खफा तुम्हारा रब ना खफा होने पाए इस बात का ख़्याल रखें। आज हिन्द में जो अज़ाब आ रहें हैं उसकी वजह ही बदकारी, अय्याशी, ज़िना, हराम (ना जाइज़) औलादें हैं।
२६ जनवरी को वतन की मोहब्बत में आ कर कोई ऐसा काम ना कर बैठना जो इस्लाम की रूह से गुनाहो हो। जैसे अपने गालों, कपड़ों, डीपी वग़ैरा पर तिरंगा परचम लगाना, गला फाड़ फाड़ कर वन्दे………… चिल्लाना, वतन की मोहब्बत में हुजूम और जुलूस निकालना, २६ जनवरी के मुबारकबाद के पैग़ाम भेजना। यह सब चीज़ें क़ुरान, हदीस से साबित नहीं हैं, रसूलअल्लाह ने नहीं बनाया, सहाबा ने नहीं बनाया किसी भी इस्लामिक स्कूल ऑफ़ थॉट्स से साबित नहीं तो तुम क्यों बनाते हो। बल्कि १५ अगस्त तो ग़म का दिन है उस रोज़ भारत की वफ़ात हुई थी उस रोज़ भारत मर गया था और उसके टुकड़े हुए थे। तमाम भारत में ग़म का माहौल था, तमाम सियासी लीडरान ग़म में डूबे हुए थे।किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी की एलान कर सके की भारत की आज वफ़ात हुई और भारत टुकड़े हो गया।
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