ताज्जुब है जो हिजड़ा अपने सियासी जलसों में अवाम ना खींच सका वोह अक्सरियत से हुकूमत बना रहा है। यही जालसाज़ी, फरेब और धोखेबाज़ी जमुहरियत के लिए मुज़िर साबित होती है। जिस मोदी, नितीश और बीजेपी के खिलाफ सख्त तरीन मुख़लिफ़ हवा थी वोह ना सिर्फ जीत जातें हैं बल्कि पहले से ज़्यादा अक्सरियत आती है। यह कैसे मुमकिन हैं वोट मांगने गए जिस बीजेपी और जनता दल के नुमाइंदों की अवाम ने महज़ १ महीना पहले पिटाई की हो वोह पार्टी इंतेखाब में पहले नंबर पर पहुंच जाती है और अकसरियत पाती है।
मोदी के झूट, फरेब, जालसाज़ी से अब तो ना सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भी वाक़िफ़ हो चुकी है, दूसरी बात गुज्जु जितने जालसाज़ धोखेबाज़ होतें शायद इस रूहे ज़मीन पर उतना जालसाज़ धोखेबाज़ तो शैतान भी नहीं होता होगा। अभी तक हर्षद मेहता से ले कर और उससे क़ब्ल जितने भी जालसाज़ धोखेबाज़ निकले उनमे से ९०% गुज्जु ही होंगे।
फिर क्या बेजीपी की बिहार की जीत उसकी मक़बूलियत का मुज़ाहेरा करती है या जालसाज़ी का। बीजेपी, मोदी की मक़बूलियत का ग्राफ पस्ती की जानिब जाता हुआ साफ़ देखा जा सकता था जब अवाम को मोदी जैसे वज़ीरे अज़ाम की बात को हवा में उड़ाने का और उसका मखौल उड़ाने का मौक़ा मिल जाता है। दूसरी बात अभी तक मोदी ने कितने अपने किये हुए वादों पर अमल किया है जो इस इंतेखाब में कोई दुसरे वादों पर अवाम यक़ीन कर के उसको फिर से ना सिर्फ मुन्तख़िब करेगा बल्कि अकसरियत के साथ मुंतखिब करेगा। २०१४ में मरकज़ी वादे क्या हुए 2 करोड़ नौकरियों का वादा था और अब सूरते हाल यह है की जो नौ जवान पहले से नौकरी कर के अपना घर बार चला रहे थे उनमे से कमो बेश ७०% बेरोज़गार हो गए हैं। पिछली बार बिहार में इंतेख़ाब होते वक़्त बिहार को १०० करोड़ रूपये की सौगात देने का वादा किया था क्या हुआ। पटना रेलवे स्टेशन को हाई टेक बनाने का वादा था और उसी मानसून में पटना स्टेशन १२ फुट पानी में ग़र्क़ाब था जिसका वीडियो और मोदी की स्पीच के साथ इसी ब्लॉग पर उस मानसून में शाया किया जा चूका है।
इस क़दर सख़्त तरीन मुख़लिफ़ लहर और हुकूमत से सख़्त ख़फ़ा हुए अवाम कैसे उस ही तंज़ीम को मुल्क और सूबे की ख़िदमत करने का वापिस से मौक़ा फ़राहम कर सकतें हैं।
उसके ऊपर कहीं बात का बतंगड़ ज़ाफ़रानी जालसाज़ी के ऊपर ना बन जाए और मुख़ालेफ़ीन तमाम इन्तेख़ाबी मरहले की हिकमत पर ही सवालिया निशान लगा कर तहक़ीक़ात की मांग ना कर बैठें तो ज़ाफ़रानी लंगूर ख़ास तिहाड़ जेल का सज़ाए अफ़्ता मुजरिम सुधीर चौधरी का ज़ी न्यूज़, रजत शर्मा का इंडिया न्यूज़ और आज तक लगे असाउद्दीन ओवेसी को बली की गाये बना कर हलाल करने की हिकमत करने।
अब कबीर महाज़ (महागठबंधन) की हार की वजह इन लंगूरों ने तलाश ली है और वोह इस हार के पीछे महज़ एक चेहरे असदुद्दीन ओवीसे को और महज़ एक तंज़ीम आल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन को मुरदे इलज़ाम ठहरा रहें हैं, इन लंगूरों का कहना है की असाउद्दीन की तंज़ीम ने कबीर महज़ के वोट काटे इसलिए ज़ाफ़रानी तंज़ीम जीत गई। हस्बे आदत जो तमाम ज़ाफ़रानी सोच और दहशतगर्दों की हिकमत होती है वही उनके स्पोक पर्सन सहाफी बोल रहें हैं। ऐसा कर के यह शिद्दत पसंद (कट्टरपंथी) सोच सिर्फ और सिर्फ एक शेर के लिए बदगुमानी पैदा कर रहें हैं। इनको ख़ौफ़ है की जो एकेला ही ऐवान में तमाम दहशतगर्दों को ढेर कर सकता है अगर उसके दो तीन नुमाइंदे मुंतख़िब हो कर आ गए तो हमारी तो लूटिया डूबेगी ही बरक्स हमारे आक़ा मुहाफ़िज़ मोदी और उसकी तंज़ीम बीजेपी की भी फजीती हो जाएगी।
ज़ाफ़रानी लंगूर कैसे बोल सकतें हैं की असाउद्दीन ने कबीर महाज़ के वोट काटे जबकि उनकी तंज़ीम के १४ में से ६ नुमाइंदे मुंतखिब हो कर आये हैं और कम से कम ५ नुमाइंदे दुसरे नम्बर पर रहे और कांग्रेस या दीगर नुमाइंदों ने ऐ.आई.ऍम.आई.ऍम. के वोट काटे। अगर कांग्रेस या राष्ट्रीय जनता दल के नुमाइंदे ५००० या ३००० वोट नहीं लाते तो वहीँ ऐ.आई.ऍम.आई.ऍम. के नुमाइंदे जो १७ हज़ार पर थे वोह २१ और २२ हज़ार पर पहुंच जाते और मुंतखिब हो कर आतें। दर असल ऐ आई ऍम आई ऍम के वोट महागठबंधन ने काटे। दूसरी बात यह ज़ाफ़रानी लंगूर हक़ बयानी से काहे को घबरा रहें हैं की दौरान इन्तेख़ाबी मोहीम या रैली में ज़बरदस्त मुख़ालिफ़ हवा थी और हुकूमत के खिलाफ अवाम का ज़बरदस्त गुस्सा था फिर कैसे ज़ाफ़रानी तंज़ीम ना सिर्फ जीत गई बल्कि पहले से ज़्यदा वोट हासिल कर ली। इस बात को मन्ज़रे आम पर लाने के बजाए इधर उधर की बातें कर के अवाम के दिलों दिमाग में शक और वसवस डाल रहें हैं। एक होता है मामूली मार्जिन पर जीतना और दूसरा होता है अकसरियत से जीतना तो ऐसी मक़बूलियत तो अवाम में हरगिज़ ना थी के नितीश और मोदी की ज़ाफ़रानी तंज़ीम को इतने बड़े मार्जिन से वापिस से जीत दे दी जाए। कुछ तो गड़बड़ है। इसकी तहक़ीक़ात होना चाहिए।
असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम ऐ आई ऍम आई ऍम के खिलाफ बदगुमानी पैदा कर के यह लंगूर भी शिद्दत पसंद और दहशतगर्दों के काम को आगे बढ़ा रहें हैं। और कोई भी शिद्दत पसंद हिन्दू, ज़ाफ़रानी तंज़ीम का नुमाइंदा और संघी दहशतगर्द नहीं चाहेगा की कोई भी ऐसा मुस्लिम एवान में मुंतख़िब हो कर जाए जो हुकूमत से लाल आखे कर के सवाल जवाब कर सके, जो अकलियतों के मसाइल हल कर सके जो हुकूमत से लड़ कर उनको रोज़गार लाइट पानी बिजली और तालीम के इदारे खोल कर उनके पिछड़े पन को दूर कर सके। कांग्रेस हो या कोई और दिगार तंज़ीम अगर उनके नुमाइंदे मुंतख़िब हो कर आतें हैं तो वोह सभी वही करेगें जो हम तंज़ीम के सरबराह की गर्दन पर तलवार रख कर बोल देंगें। लेकिन अगर मुक़ाबिल एक शेर होगा तो वोह जान दे देगा लेकिन तलवार के ख़ौफ़ और डर से कलमाये हक़ के बजाये बातिल का कलमा नहीं पड़ेगा। इलिलिये इन तमाम शिद्दतपसन्द काफिरों को, संघी दहशतगर्दों को, ज़ाफ़रानी तंज़ीम के नुमाइंदों को और शिद्दत पसंद लंगूरों को असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम पसंद नहीं हैं। और वोह बदगुमानी भी उन्ही के खिलाफ फैलातें हैं। जबकि हक़ बात कहने से ख़ौफ़ज़दा होते हैं, की ज़ाफ़रानी तंज़ीम जालसाज़ी कर के जीती और कांग्रेस या दीगर तंज़ीमों ने मजलिस के वोट काटे।
जब ज़ाफ़रानी तंज़ीम से चारों जानिब से उसकी जीत पर सवाल होने लगे तो अब लंगूरों से एक खबर आम कर दी के हमको तो मुस्लिम अवाम ने बड़ी तादाद में वोट दिए हैं, और मस्तूरातों ने वोट किये हैं। तो में सवाल पूछता हूँ, पूछता है भारत आज तुमसे सवाल करता है भारत की तुमने मुसलमानो के हक़ के लिए क्या इक़दाम किये उनके कौनसे मसाइल हल किये रोज़गार, दंगों में उनके रोज़गार छीन लिए उनकी जान का हिफाज़त नहीं है उनकी बेहेन बेटिओं को सरे आम हिन्दू बना कर शादी करने वालों को इनाम दिया जाएगा और ऐसे जोड़े को २ साल तक रहना और राशन फ्री दिया जाएगा ऐसे विडिओ शाया किये जातें हैं। मुस्लिम बच्चिओं के वाल्देन को चूनौती दी जाती है की हमारे यहाँ नौजावन फ्री बैठे हैं तुम्हारी बेटियां हिन्दू नौजवान के पास भेज दो सब को खपा देंगें। फिर किस ग़ैरतमन्द मुस्लिम ने इन जैसी ज़हरीली सोच को वोट किया होगा। अमित भरी सभा में मुस्लिम अवाम को घुस्पेठिया बोलता है और बोलता है एक एक गुस्पेठिये को चुन चुन के बहार निकालेगें, और शरणार्थिओं को भारत की शहरियत देंगें। क्या मुस्लिम अवाम इतना बेवक़ूफ़ है की यह अमित, बीजेपी वाले ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंद, संघी दहशतगर्द और ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर घुसपैठिया लफ्ज़ किस के लिए इस्तेमाल करतें हैं नहीं जानते। जब ज़हन और दिमाग में इतनी ख़बासत भरी हो एक ख़ास मज़हब के लोगों के लिए तो क्या यह मुमकिन है की उस मज़हब का अवाम फिर से उसी तंज़ीम को मुंतखिब करेगा की आओ और हमको मार डालो। फिर राष्ट्र वाद से जुड़े मुख़तलिफ़ सख़्त क़ानून जो सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अवाम पर इस्तेमाल हो रहें हैं। उत्तर प्रदेश में हाथरस की तहक़ीक़ात करने आये हुए ३ मुस्लिम सहाफियों को राष्ट्रिय सुरखा क़ानून के तहत जेल में डाल दिया। किस तरह का खतरा था वतन को उनकी मौजूदगी से या तहक़ीक़ात से जो उनको राष्ट्र सुरखा के तहत जेल में डाला गया है।
कुछ नहीं बीजेपी ज़बरदस्त तऱीके से हार रही थी, जिसका एहसास इन लोगों को भी दौरान इंतेख़ाब और सख्त मुख़लिफ़ लहर के चलते हो चूका था तो अब अपनी और अपने नपुंसक सेपह सालार (मोदी) की साख को बचाना था सो क्या करते तो उतर आये ज़लालत पर जालसाज़ी पर और फरेब धोख़ेबाज़ी से जीत दर्ज करवा ली। वैसे भी भारत की हुकूमत सदा ही चीटर और धोखेबाज़ है पाकिस्तान से मैच खेलते वक़्त हर बार बेईमानी से जीत दर्ज करवानी की हिकमत रहती थी। वही खून है और वही सक़ाफ़त और वही किरदार (चरित्र)।
कहीं तो अपने गलीज़ और ना जाइज़ नुत्फे का असर दिखायेगा। अवाम को पता कैसे चलेगा की जीत में और तुम्हारे पैदा होने में पड़ोसी की मेहनत है तुम्हारे वालिद (भक्तों के पापा) तो नपुंसक थे।
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