Sunday, 1 November 2020

अब ईदे ग़ौसिया बनाओ, ईदे ग़ौसिया की मुबारकबाद दो।

अज़ीज़ नाज़रीन, 


आपसे गुज़ारिश है मज़मून पूरा मुताला करें, तारीख के कुछ हक़ीक़त बायान की है और कुछ नसीहतें काफिर मुल्क हिंदुस्तान में रहने वाले मुस्लिम अवाम और मौलानाओं के लिए। 

ईदे मिलाद का जश्न हुआ ख़तम अब ईदे ग़ौसिया के जश्न की तैयारी कर लीजिये।  इस साल से इंशाल्लाह २ नहीं बल्कि ५ ईदैन का एहतेमाम किया जाएगा।   हम मज़हबे इस्लाम में तरमीम कर रहें हैं।   मुनाफ़िक़ शहज़ादा जदीद इस्लाम चला सकता है बादशाह अकबर आज़म  दीने इलाही चला सकतें हैं तो हम भी ५ ईद तो बना ही सकतें हैं।  

१.          रमज़ान ईद

२.         ईदे क़ुर्बान (गाये, बैल, ऊँट, भेड, बकरा) ज़िबह करने वाली ईद

३.          ईद मिलाद

४.         ईदे ग़ौसिया

५.         ईदे ख़्वाजा

ईदे ग़ौसिया, ईद मिलाद के अगले महीने यानी रबीउल आखिर की ११ तारीख को बनाई जाती है।  इस रोज़ तमाम एहले ईमान नए कपडे पहन कर बरियानी या पुलाव और ज़र्दा बना कर फातेहा का एहतेमाम करतें हैं और तमाम ग़ौसुल आज़म के चाहने वालों के लिए महफिले ग़ौसिया का एहतेमाम करतें हैं।  जो बोहोत ही सवाब का काम है।   ऐसा करने से दरजात बुलंद होतें हैं और नेकीओं का ज़ौक़ पैदा होता है।   दूसरी बात यह ज़रूरी नहीं की ११ तारीख को ईद है तो उसी रोज़ बड़े पैमाने पर देग़ वग़ैरा बना कर उसपे फातेहा दी जाए अगर उस रोज़ बड़े पैमाने पर फातेहा ना दी जा सके तो पूरे महीने में अगला चाँद दिखने तक कभी भी ग्यारवी शरीफ की फातेहा कर के ग़ौसुल आज़म के दीवानो को दावते ग़ौसुल का हक़दार बना सकतें हैं।  मतलब पूरे महीने में कभी भी बड़े पैमाने पर फातेहा का एहतेमाम किया जा सकता है। 

इस ईद की बा बरकत खाने का एहतेमाम करने और फातेहा ग़ौसुल अज़ाम की वजह से पूरे साल ख़ाना ऐ मालिक या मेज़बान के रिज़्क़ में उसत और बरकत रहती है।

ईदे ग़ौसिया को भी दीगर दूसरी ईदैन की तरह पूरे जोश खरोश और एहतेमाम के साथ बनाएंईदे गोसिया मुबारक के मेसेज भेजें और अपनी डीपी पर ग़ौसुल आज़म के रौज़ा ऐ मुबारक का फोटो लगाएं।  जुलूसे ग़ौसिया का एहतेमाम करें और उसमे शिरकत करें। 

नाज़रीन आज के दौरे मुनाफ़ेक़त और कुफ्रिया दौर में हो क्या रहा है हमारा ईमान भी कमज़ोर होता जा रहा है, और यही वजह है हर मुनाफ़िक़, काफिर, यहूद नसारा इब्लीस को ख़ुशी फ़राहम करने वाले काम कर रहें हैं।   एक अदना सा ख़बीस भी उठ कर रसूले अरबी के शान में गुस्ताख़ी कर रहा है। ईद मिलाद बनाने की निस्बत से शक और शुकूक डाल रहा है। पैग़म्बरे रिसालत की शान में कार्टून बनाये जा रहें हैं गुस्ताख़ी की जा रही है।  नाचने वालों की नाच गा कर अपना पेट भरने वाले निचोड़ों नचौड़िओं की गैंग इस्लाम  के ख़िलाफ़ बोलने लगी।

दर असल जब मुनाफ़िक़त ने सर बुलंद किया था और सऊदी के नज़्द से जो अब्दुल वहाब नजदी मुनाफ़िक़ का दौर शुरू हुआ था उसी वक़्त अगर कोई मुजाहिद उस मुनाफ़िक़ यहूदी एजेंट का सर क़लम कर डालता तो गुस्ताख़ी करने वालों की हिम्मत आज नबी की शान तक ना पहुंच पाती। 

नज़्द का वोह फितना तमाम आलम में फैला, पहले उस यहूदी एजेंट ने सहाबा के मज़ारात को मिस्मार किया उसके बाद खातून जन्नत के मज़ार को साफ़ कर दिया.  झूठे सच्चे फतवे और फलसफो पर वही सिलसिला तमाम आलम में फेल गया।  उस फ़ितने से हिन्द पाक भी मेहफ़ूज़ ना रह सके।   होता क्या है अगर हम हमारे बच्चो को आले रसूल की हज़ारवीं धुल की अज़मत और बुज़ुर्गाने दिनों की इज़्ज़त करना सिखाते फिर अगर कोई मुनाफ़िक़ बुज़ुर्गाने दीनों के लिए बदकलामी करता तो हमारे बच्चो के ऊपर एक कैफियत तारी हो जाती और उस मुनाफ़िक़ यहूदी काफिर को माक़ूल जवाब दिया जाता, जब बुज़ुर्गों की इज़्ज़त और अज़मत का यह हाल होता तो नबी तक पहुंचने की जुर्रत ही आज कोई मुनाफ़िक़, काफिर, यहूद और नासारा हरगिज़ ना कर पाते।  

मुनाफ़िक़ अब्दुल वहाब नजदी ने सहाबा किराम खातून जन्नत के मज़ारात को मिस्मार किया मौजूदा दौर के मुनाफ़िक़ शहज़ादे की नियत नबी पर खराब हो गई थी।  जदीद इस्लाम का ऐलान करने के बाद उसका अगला क़दम नबी के रौज़े मुबारक को मुन्तक़िल करने का था।   नबी सल्लम के पाकीज़ा जिस्मे अतहर को निकाल कर किसी ख़ुफ़िया और पोशीदा जगह पर रखने की हिकमते अमली थी।  जहां किसी आशिक़े रसूल को कोई खबर ना हो सके और कोई नबी से मिलने ना जा सकें. 

आज हो क्या रहा है कोई भी काफिर लंगूर उठ के गरीब नवाज़ की शान में बदकलामी कर देता है। कोई भी काफिर ज़ाफ़रानी, इस्लाम को कोसने लगता है और जो कोई भी मौलाना डिबेट में जातें हैं वोह सब कुछ सुन कर आ जातें हैं।  खैर देर आये दुरुस्त आये अब से सभी मौलाना जो भी इस्लाम से मुत्तालिक डिबेट में जातें हैं अपने पास एक तेज़ कटार या गाये, बैल को ज़िबह करने का चाकू रखे।  जो कोई भी इस्लाम, क़ुरान, नबी या बुज़ुर्गाने दीन की खिलाफ एक भी ख़िलाफ़े इज़्ज़त अलफ़ाज़ बोले फ़ौरन उसका गला रेत दिया जाए।   एक दो ऐसे केसेस हो गए तो सब ठीक हो जाएगा।   मज़हबे इस्लाम की बक़ा के लिए गिरफ्तारी भी देनी होगी और जान भी लेनी होगी।  

ऐसा ही इस्लामिक शरीयत से जुड़े हुए मसलो जैसे जायदाद की तक़सीम, तलाक़, और पर्सनल लॉ से ताल्लुक़ रखने वाले मसलों पर जब अदालत में केस जाए तो फ़रीक़ों को अपने पास पिस्तौल वगेरा रख कर जाना चाहिए।  अगर अदालत का फैसला इस्लामिक शरीयत की खिलाफवर्जी वाला हो और हिन्दुस्तान के क़ानून की पैरवी करता हो तो फ़ौरन उस जज को गोली मार देना चाहिए। जैसे किसी मुस्लिम लड़की ने हिन्दू लड़के से शादी कर ली या किसी हिन्दू लड़की ने मुस्लिम लड़के से शादी कर ली और दोनों ही मामलों में मिया बीबी अपने अपने मज़हब पर चलें और अदालत ऐसी शादी को दुरुस्त क़रार दे तो ऐसे हालात में जज का क़तल बाइसे मुसर्रत होगा ना की बाइसे मज़्ज़मत।  अब ऐसी ग़ैर मज़हबी वोह शादी नहीं बल्कि ज़िना होगा हराम होगा और पैदा होने वाली औलाद हरामी क्योंकि मर्द और औरत का निकाह और दोनों एक दुसरे पर जाइज़ ही इसी सूरत में होंगे की दोनों ही मज़हबे इस्लाम को मानते होंगे।   या तो शादी से पहले हिन्दू लड़का मुस्लिम बने फिर मुस्लिम लड़की से निकाह जाइज़ और यही सूरत हिन्दू लड़की के लिए है वोह पहले मुस्लिम बने फिर मुस्लिम लड़के से निकाह जाइज़।   

फिर जब रियासते मदीना क़ायम हो जाए तो हाकिम और अदलिया को भी वैसा ही किरदार पेश करना चाहिए जैसा की नबी सल्लम के बाद इस्लामिक बादशाहों का पाक किरदार तारीख के सफों में मिलता है।   यमन के वली सिफ़त बादशाह के ऊपर एक गरीब औरत ने इलज़ाम लगाया  की उन्होंने उसकी अमानत में ख़यानत की है।  मामला क़ाज़ी के पास पंहुचा और क़ाज़ी ने बादशाह को उसके हुज़ूर हाज़िर हो कर अपना जवाब देने को कहाबादशाह अपना शाही लिबास उतार कर सादे कपडे पहन एक कटार पोशीदा रख कर क़ाज़ी के दरबार में पंहुचा।  मामला चला और बादशाह इस्लामिक शरीयत के हिसाब अमानत में ख़यानत का मुजरिम पाया गया।  उसको दुर्रे लगाने का हुकुम क़ाज़ी ने सुनाया।   फैसला सुन कर बादशाह अश्क़बार हुआ और क़ाज़ी के पैरों पर गिर पड़ा और बोसा दिया हाथों को चूमने लगा।   फिर उसने कटार निकाली और क़ाज़ी साहब के सामने रख दी और बोला में मुजरिम था मुझको पता था लेकिन में यह कटार अपने साथ लाया था की अगर आप बादशाह के ओहदे से मुत्तासिर हो कर इस गरीब के खिलाफ फैसला देते और इन्साफ का क़त्ल करते तो में आपकी गर्दन क़लम कर देता।   यह सुन कर क़ाज़ी ने भी अपनी कटार निकाल कर रख दी और बोले में भी यह फैसला कर के आया था की कही आपने बादशाह के ओहदे से अदालत को मुत्तासिर करने की कोशिश की और इन्साफ का क़त्ल हुआ तो में आपकी गर्दन क़लम कर देता।       

और आज हो यही रहा है हम अपनी तारिख भूल चुके हैं, बुज़ुर्गाने दिनों की करामात और किस्से झुटलाते रहते हैंतो आज हमारा ईमान भी इतना कमज़ोर हो चूका है की कोई भी सड़क छाप बुज़ुर्गों की शान में गुस्ताख़ी कर देता है क़ुरान जला देता है, मस्जिदों की बेहुरमती कर देता है नबी की शान में बकवास गलत बयानी कर देता है होना क्या चाहिए था जब सांप ने फन उठाया था तभी गर्दन क़लम होना थी।   पहली गलती पर ही मौत की सज़ा बुज़ुर्ग तो बोहोत बड़ी चीज़ हैं अगर किसी काफिर ने मुग़ल बादशाहत औरंगज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे, एहमद शाह अब्दाली, मेहमूद ग़ज़नवी के खिलाफ भी एक लफ्ज़ बोला तो गर्दन काट डालनी थी तो आज नौबत इतनी आगे तक बढ़ती ही नहीं।  

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