अज़ीज़ नाज़रीन,
जैसा की इस सहाफी ने अपने हर मज़मून में अवाम को बताने की कोशिश की है की हाकिमे वक़्त का अवाम के अच्छे बुरे अमल में बोहोत नुमाया किरदार होता है। जैसा हाकिम का किरदार होगा वैसे ही असरात अवाम पर नुमाया होंगे। आज जो हिन्द के हालात है हर जानिब मार काट फ़िरक़ापरस्ती, लूट, मस्तूरातों के साथ ज़िना, फरेब धोख़ा, दहशतगर्दी उसकी वजह ही हाकिमे वक़्त के बदआमाल और बदकिरदार होने की दलील है।
अब जिस मुल्क में इन्साफ के लिए अदलिया का बाब खटखटाने पर लंगूर और लँगूरनियाँ बवाल मचा डालें तो उस मुल्क की नस्लों को मज़ीद तबाह और बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता। और यह किसी हाकिम का फैसला हो या ना हो बल्कि मालिके मुतलक़ का फैसला है, और अल्लाह ना इंसाफों को हरगिज़ पसंद नहीं करता है।
नाज़रीन आपको याद होगा बाबरी मस्जिद पर भगवा की सुप्रीम रंडी ने केसा तमाम वकीलों और भरी पंचायत में अपने संघी आशिक़ों के साथ ज़िना कारी की थी. इन्साफ की उस देवी की आबरू लूट ली थी. इन्साफ की उस देवी की मजमूई अस्मतदरी की खबरे और वीडियो महज़ भारत तक ही महदूत नहीं रहे बल्कि बरुन मुल्क पाकिस्तान, तुर्की, अमेरिका, बरतानिया, कुवैत, मलेशिया जैसे तमाम मुल्कों ने उस लाइव अस्मतदरी का मुताला किया और भारत में इन्साफ के मुजसमे की अदलिया ने खुद इज़्ज़त लूट ली उसके ऊपर खूब थू थू हुई। इतना ही नहीं अब इस मसले और मजमूई अस्मतदरी के मुख़ालेफ़त में बेरुन मुल्क भी बोलने लगे। अभी तक तुम्हारे यहाँ मस्तूरातें मेहफ़ूज़ नहीं थी, उनकी जब भी कोई संघी दहशतगर्द चाहे इज़्ज़त लूट सकता था लेकिन अब तो इन्साफ के मुजस्समे की इज़्ज़तरेज़ी कर रहे हो, फिर कुवैत, तुर्की और पाकिस्तान में इस मसले पर आलमी अदलिया के दरवाज़े खटखटाये गये।
फिर जब मुस्लिम अवाम ने देखा की तमाम सबूत हमारे मुवाफ़ेक़त में हैं तमाम बातें सुप्रीम तवायफ ने मानी की रात की तारीकी में मूर्तिया रखना साजिश का एक हिस्सा थे, मस्जिद तोडना गुनाहे कबीरा और जुर्म था. वहां कभी भी किसी भी वक़्त कोई मंदिर नाही था. राम मंदिर के वजूद का कोई भी सबूत नहीं मिला फिर भी उस सुप्रीम रंडी ने इन्साफ के साथ हक़ और हलाल काम निकाह नहीं किया बल्कि ज़ाफ़रानी हाकिमों के साथ बरहना हुई और ज़िना किया।
उसके बाद जब मुस्लिम अवाम ने फैसले पर नज़रे सानी की अपील की दरख्वास्त डाली तो लंगूर और लँगूरनियों का अगवाड़ा और पिछवाड़े सुलगने लगा, हर मुस्लिम नुमाइंदे को अपने अय्याशी के अड्डे पर बुला बुला कर लँगूरनियाँ उसको रिझाने की कोशिस करने लगी और आधी नंगी हो कर आधी झुक कर अपनी छाती दिखाने लगी। आप रिवीव पेटिशन क्यों डाल रहे हो, आप तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खैर मक़दम करने वाले थे तो फिर से क्यों आप अदालती पचड़े में मसले को डाल रहे हो, जब मसला हल हो गया है तो आप लोग क्यों उसको फिर से पेचीदा कर रहे हो।
नाज़रीन एक इन्साफ पसंद हाकिम और हक़ बोलने वाले ख़लीफ़ा की हुकूमत का वोह जलाल और क़ुव्वत होती है की हज़रते उमर के दौरे खिलाफत में कभी भेड़िये ने बकरी पर हमला नहीं किया। और उनकी खिलाफत एक दो किलोमीटर की नहीं बल्कि ३२ हज़ार मुर्रब्बा किलोमीटर की खिलाफत के हाकिम थे। जब आपने इस रूहे फानी से पर्दा किया तो फ़ौरन एक चरवाहे की बकरी को भेड़िया उठा ले गया और मार डाला। वोह चरवाहा ज़ारो क़तार फुट फुट के रोने लगा लोगों ने कहा अरे एक बकरी के मारे जाने पर इतना ग़मज़दा क्यों हो रहे हो तुम्हारे पास तो अभी भी बकरा बकरी का झुण्ड मौजद है तो उसने कहा मुझे गम एक बकरी के जाने का नहीं है लेकिन हो सकता है की आज खलीफा ए वक़्त ना रहे होंगे। बाद में पता चला की जब बकरी पर हमला हुआ तब हज़रते उमर रदिअल्लहा दुनाये फानी से कूच कर चुके थे।
अज़ीज़ नाज़रीन बताने का मक़सद वही है की ख़लीफ़ा या हाकिम सिर्फ ज़मीन का नहीं बल्कि अपने मुल्क की अवाम, हजर, शजर, हैवान बकरा बकरी सब का होता है। और असली हाकिम वही जिसके हक़ और इन्साफ के आगे हवाएं अपना रूख बदल दें, आया हुआ तूफ़ान ठंडा हो जाए, क्योंकि उसको पता होता है की यह खिलाफत और हाकिमियत ऐसे बादशाह के हाथ में है जहाँ इन्साफ और अमन है, अगर कुछ भी बदअमनी हमारी वजह से हुई तो शिकायत सीधी मालिके कायनात तक पहुंचेगी फिर हमको सुबह क़यामत तक अपनी दहशत ना मचाने के लिए क़ैद कर दिया जाएगा।
एक और किस्सा मशहूर है दौरे कुफ्रिया में दरियाए नील में हर साल तुग़यानी (बाढ़) आती थी। फिर एक हसीन कुँवारी बच्ची की गर्दन काट कर उस की बली दे कर उस के गुस्से को ठंडा किया जाता था। जब हज़रते उमर मिस्र पहुंचे तो उस साल भी ऐसा ही हुआ और अवाम ढोल ताशो के साथ एक हसीन लड़की की बली देने दरिया के किनारे पहुंचे आप ने लोगों से पुछा तुम क्या कर रहे हो उन्होंने बोला आप नए खलीफा हो हम हर साल इस दरिया की बाढ़ को ठंडा करने के लिए एक कुँवारी हसीन लड़की की बली देंतें हैं और दरिया ठंडी हो जाती है। आपने कहा यह गलत है कुफ्रिया अक़ीदा है। और आपने एक छोटा सा रुक़्क़ा लिखा " ए नील अगर तू अल्लाह के हुकुम से बहती है तो अपनी तुग़यानी बंद कर में खलीफा उमर तेरे को हुकुम देता हूँ नहीं तो तुझको सुबह क़यामत तक के लिए सूखा दूंगा, वोह रुक़्क़ा डालना था की दरिया ठंडी हो गई और फिर कभी भी उसमे बाढ़ नहीं आई।
नाज़रीन आज जिन मुगलों के नाम से लंगूर लँगूरनियाँ, शिद्दत पसंद हिन्दू, बीजेपी वाले और संघी दहशतगर्द आग बबूला होतें हैं उसकी वजह ही यही है की मुगलों ने हाकिमियत की और कभी भी कोई बवाल ना मचा भारत को उस वक़्त सोने की चिड़िया कहा जाता था जब ना फैक्ट्रियां थी ना कमाई के दुसरे साधन बल्कि अवाम काश्त पर ही जीता था लेकिन मुगलों का खज़ाना भरा पड़ा था। दूसरी बात जिस बादशाह औरग़ज़ेब को आज तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू पानी पी पी कर कोसते हैं उन्ही बादशाह औरग़ज़ेब की वजह से आज उनको चीन में जा कर कैलाश मानसरोवर के दर्शन का ऐजाज़ हैसिल हुआ है। मुगलिया सल्तनत इन्साफ और हक़ पसंदी की वजह से बेपनाह ऊरूज पर पहुंची और औरंगज़ेब ने तो फारस से ले कर तो बर्मा तक तमाम हिन्द पर हुकूमत की थी। वजह वही इन्साफ हर इंसान के साथ हुसने सुलूक, प्यार मोहात इखलास भरा पड़ा था ख़ास औरंगज़ेब में तो हमदर्दी और इन्साफ कूट कूट कर भरा था।
अब तो लगता नहीं की किसी भी काफिर ना इन्साफ, ज़ालिम, दरिंदा, क़साई, दहशतगर्द बादशाह में इतनी क़ुव्वत बची होगी की भारत को फारस से बर्मा तक एक कर सके। वोह जिस्मानी और रूहानी क़ुव्वत की बदौलत होता है। जिस इंसान से एक लुगाई नहीं संभाली जाती है वोह क्या मुल्क की हिफाज़त करेगा। तभी तो संघी जल भून कर ४-४ कैसे रख लेते हो नहीं रखने देंगे ऐसे ऐसे क़ानून बनाने की वकालत करते हैं। अरे तुम नपुंसक हो तुम्हारे अंदर इतनी क़ुव्वत नहीं की एक को संभाल सको उसको भी अपने पडोसी और साधू संतों के पास भेजते हो और एतेराज़ हम पर करते हो।
आज के हाकिम की बात करें तो जो भी बाप दादा ने कमाया था चाय का ठेला वोह तो बेच ही दिया बल्कि अब तो डाका मुल्क के असासों पर डाला जा रहा है। भारत की तारीख़ और जोग्राफिया (इतिहास भूगोल) तब्दील हो गया। बंगलादेश को भारत की १६०० किलोमीटर ज़मीन दे दी। जम्मू कश्मीर गया, लद्दाख गया, काला पानी और लिपूलेख गया। जो था वोह भी गवा दिया। रही सही भारत माता की इज़्ज़त आबरू वोह भी लूट गई, इनके दरिंदा सिफ़त अमल, ना इंसाफ़ी, खून खराबा, फ़िरक़ापरस्ती, मुस्लिम अवाम पर दहशत की वजह से पूरी दुनिया ने भारत माता की लूटती हुई इज़्ज़त को देखा और खूब थू थू हुई।
सब कुछ बर्बाद और तबाह होने के बाद अब बारी नस्लों की है। उसकी दो वजह बताता हूँ, एक तो हिन्दू अवाम में बड़े पैमाने में नपुंसकता आ रही है, मस्तूरातें बाँझ हो रही हैं। फिर जो भी मौजूद नस्लें हैं वोह आये दिन हादसात, बीमारी, खुदकशी, कुदरती आफ़ात में बड़े पैमाने में मारी जा रही हैं। तो अब नस्लें तो ख़तम होना ही हैं ते है। उसकी वजह ही तुम्हारे गुनाह, बदकारी, अय्याशी, दहशत, फ़िरक़ापरस्ती, ज़ुल्म, नाइंसाफी हैं। इस बात का एहसास तुमको आज नहीं हो रहा है लेकिन ज़रा २०-२५ साल बाद जाकर फिर से अपने मज़हब के अफ़राद की रआयेशूमारी करना। तुम्हारा मज़हब खतरे में मुस्लिम अवाम की वजह से नहीं है और ना है मुस्लिम अवाम के लड़कों से शादी करने से तुम्हारी आबादी कम होगी बल्कि तुम्हारे गुनाहों की वजह से जो इज्तेमाई अज़ाब और कुदरती आफ़ात तुम्हारे ऊपर आ रही हैं उससे तुम्हारी नस्ले ख़तम होंगी। कोई नाम लेवा ना रहेगा तुम आज मंदिर बना तो रहे हो लेकिन उसमे पूजा कौन करेगा, वोह सब वापिस से हमारे पास ही आने वाली हैं।
जिस हिसाब से बीजेपी, तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी दहशतगर्द और मुनाफ़िक़ मुस्लिम अवाम की निस्बत से एक बदगुमानी आम तोर पर फैलातें हैं की लव जिहाद और मुसलमानों की दिगर हिकमत बंद नहीं की तो हिन्दू अक़लियत में आ जाएग। तो उन तमाम साधू संत, और सियासी रहनुमाओं से कहना चाहूंगा की हिन्दू ना सिर्फ अक़लियत में आएगा बल्कि साफ़ भी हो जाएगा। हिन्दू अगर हिन्दुस्तान में मेहफ़ूज़ था तो मुगलिया सल्तनत की बदौलत और मुस्लिम इन्साफ पसंद हाकिमों की वजह से औरंगज़ेब, टीपू सुलतान की हिन्दू अवाम को मेहफ़ूज़ करने की हिकमते अमली इन्साफ पसंद क़ानून बनवाने की बदौलत. लेकिन अब हिन्दू मेहफ़ूज़ नहीं है क्योंकि इन लोगों की नाइंसाफी, हक़ तल्फ़ी, क़त्लों ग़ारत की वजह से तुम्हारे हाकिम मोदी, बीजेपी और संघी दहशत की बदौलत। फिर जिस क़ौम को मालिके कायनात खुद ही ख़त्म करने का अज़्म कर चूका हो है कोई उस क़ौम को मेहफ़ूज़ करने वाला।
मचालो जितना ग़दर मचाना है लेकिन इस बार तुम्हारी जंग मालिके मुतलक़ से है और तुम्हारी नस्ले ख़त्म हो जाएगी, जिस लूत की क़ौम का कोई नाम लेवा नहीं बचा, फ़िरोन, यज़ीद का कोई वली वारिस नहीं बचा वैसे ही तुम्हारा भी नहीं बचेगा।
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