पडोसी मुल्क़ जम्मू-कश्मीर
जब से हिन्दू दहशतगर्दों की गलीज़ और नज़रे बद की ज़ेरे नज़र हुआ है, अवाम का हर तपका उस
हिन्दू दहशतगर्द के ज़ुल्म और शिद्दत से सख़्त तरीन मुत्तासिर हुआ है. हिन्दू दहशतगर्दों का सरगना जो आज कल दिल्ली में
मुक़ीम है और वहीं से अपनी तमाम दहशतगर्दाना अमल को अंजाम दे रहा है. उसके दहशतगर्द एक-४७ और तमाम आला किस्म के अस्लेह
से लेस अवाम और इंसानी हुक़ूक़ की सख़्त तरीन खिलाफ वर्ज़ी करते हुए देखे जा सकतें हैं.
ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत
सहाफत, और दहशतगर्दों की मुआफ़िक मीडिया के बक़ौल कश्मीर में अमन लौट रहा है और ज़िन्दगी
पटरी पर लौट रही है आम अवाम बन्दूक की दहशत के साये में खुश है और मिठायाँ तक़सीम कर
रह रहा है. जबकि हालात एक दम उल्टे हैं जैसा
की ज़ाफ़रानी सहाफिओं की जानिब से झूट और फरेब फैलाया जा रहा है वैसा तो हरगिज़ नहीं है. कश्मीर में हिन्दू दहशतगर्दों के काबिज़ होने २५
दिनों बाद भी कोई भी मेहफ़ूज़ नहीं है. ना ही अवाम, दानिशमंद, सियासतदान, सहाफी, हुकूमते
कश्मीर में काम करने वाले मुलाज़िम, तालिबे इल्म, उस्ताद यहाँ तक की जर्राह (डॉक्टर्स)
जो के इंसानी हुकूक की देख भाल करते हैं और एक बीमार को शिफा देने में मददगार साबित होतें हैं वो भी मेहफ़ूज़
नहीं हैं.
मुल्क़ कश्मीर की
दारुल हुकूमत श्रीनगर का 'क़ल्ब' कहे जाने वाले लाल चौक गुजिश्ता पीर को एक अलग ही नज़ारा
देखने को मिला। एक जर्राह प्ले कार्ड लेकर
वहां पर बैठे दिखाई दिए। मुक़ामी अवाम को एहसास हुआ की जर्राह (डॉक्टर) उमर शाद सलीम
शायद मुज़ाहेरा कर रहे हैं और दहशतगर्दों के सरगना को पैगाम भेजना चाहतें हैं. लेकिन जब उनकी नजर उनके प्लेकार्ड पर गई तो हकीकत
कुछ और निकली। डॉक्टर सलीम के प्लेकॉर्ड पर लिखा था, 'यह खिलाफत नहीं, एहतेजाज नहीं
है, यह गुज़ारिश है।'
भारत के पड़ोस में नेपाल की तरह बर्फीली वादिओं में बसा
एक छोटा सा पडोसी मुल्क़ कश्मीर दरअसल, आज कल हिन्दू दहशतगर्दों के क़ब्ज़े में आ गया
है. और उनका सरगना अवाम पे सख़्त ज़ुल्म, सितम
और केहर बरपा कर रहा है. अपने अना, ग़ुरूर और
गुस्से को ठंडा करने के लिए और सियासी बदला लेने के लिए वो कश्मीर को आतिशे नार कर
रहा है. ठंडी वादिओं को इंसानी लाशों के सबब
गर्म और बंदूक की गोलिओं, तोप ख़ानों की आवाज़ से ख़ौफ़ज़दा कर रहा है. पिछले ४ हफ़्तों से कश्मीर में इंटरनेट के काम नहीं
करने की वजह से मरीज़ों को मरकज़ी हुकूमत की दूर अंदेशी अवामी सेहत स्कीम का फायदा नहीं
मिल पा रहा है, जिससे उन्हें काफी परेशानी हो रही है। ऐसे मरीज़ों की आवाज को बुलंद
करने के लिए डॉक्टर सलीम ने प्लेकार्ड लेकर लालचौक पर बैठने का रिस्क उठाया। ३८
साला यूरोलॉजिस्ट सलीम शहर बंबई के नामचीन जसलोक हॉस्पिटल की मुलाज़मत छोड़कर अपने
मुल्क कश्मीर में हुकूमते कश्मीर के ज़ेरे साये बतौर जर्राह (डॉक्टर) खिदमत देने आए
हैं।
डॉक्टर उमर किसी भी किस्म के एहतेजाज का हिस्सा नहीं
थे बल्कि उन्होंने तो दिल्ली में मुक़ीम दहशतगर्द सरगना से गुज़ारिश की थी की कम अज़ कम
आप अपनी ही जारिकर्दा स्कीम का तो लेहाज़ कीजिये और मरीज़ों का एहसास कीजिये. आपके इंटरनेट बंद होने के सबब 'हम आयुष्मान भारत कार्ड को स्वाइप नहीं कर पा
रहे हैं।' उमर के वाल्दैन कैंसर के मरीजों का इलाज करते हैं। वे अपनी ज़ाती क्लिनिक
में गरीब ग़ुरबा मरीजों से पैसे नहीं लेते हैं।
दहशतगर्दों की एक आदत आम होती
है की वो ऐसे दरवेश और फरिश्ता सिफ़त इंसान को हद दर्जे के अज़ीयत और तकलीफ देतें हैं
ताके उस तकलीफ की तपिश और शिद्दत को देख कर आम अवाम ख़ौफ़ज़दा हो जाए, इबरत हासिल करे
और हमारी दहशत और शिद्दत के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने की जुर्रत ना करे. डॉक्टर उमर किसी भी किस्म के एहतेजाज में शामिल नहीं थे बरक्स वो तो गुज़ारिश कर रहे थे की
आज आपने कश्मीर में इंटरनेट, फोन और तमाम ज़राये राब्ता मुनक़ता कर रखा है जिसके सबब
मरीज़ों को तकलीफ हो रही है. जब हालात जंग जैसे
हैं और तमाम ज़राये राब्ता बंद हैं तो अपनी बात अगर मुक़ीम देश तक पहुचानी है तो कैसे
पहुंचाई जाए. तो उन्होंने लाल चौक पे तख्ती का सहारा लिया ताके
बन्दूक धारी दहशतगर्दों की नज़र उनके प्ले कार्ड पे पड़ेगी और सरगना तक बात पहुंच जायेगी. लेकिन उनको क्या मालूम था की तमाम ज़ुल्म और ज़ियात्ति हिन्दू दहशत की सिर्फ
और सिर्फ कश्मीरी और ख़ास मुसलमान अवाम के लिए है.
एक डॉक्टर जो की सिर्फ भारतीय आतंकिओं ओर उसके सरगना मोदी से गुज़ारिश कर रहा
था एक एप्लीकेशन के ज़रिये की आपने जो प्रधान मंत्री योजना के तहत मुफ्त मरीज़ों को सेवा
देने का प्रोग्राम शुरू किया है वो इंटरनेट बंद होने की वजह से ठप पड़ा हुआ है. मरीज़ों
की तादात बढ़ती जा रही है. उसको एक-४७ और दिगर बंदूकों की नौक पे अपहरण कर लिया जाता है.
फिर हिंदुस्तानी दहशतगर्द उस डॉक्टर
को जो के सफ़ेद एप्रन में था बन्दूक और एक-४७ से लेस अगवाह कर के एक गाडी में बिठा के
लिए जातें हैं. और गाडी के पीछे लिखा होता है लाल चौक पुलिस श्रीनगर. उन दहशतगर्दों
को इतना भी खौफ नहीं के हम एक-४७ के ज़ोर पे कैमरे के सामने एक डॉक्टर जो इंसानियत के
नाम पे मरीज़ों के लिए गुज़ारिश कर रहा है उसको अगवाह कर रहें हैं बेरुन मुल्क इस तरह
की ज़ोर ज़बरदस्ती क्या पैग़ाम देगी.
नाज़रीन आपको डॉक्टर कफील याद होंगे जिन्होंने अपने
खर्चे से सूबे उत्तर प्रदेश में हिन्दू दहशतगर्द के साये जब बच्चों की मौत वाक़े हो
रही थी तब मदद की थी और उनको भी ऐसे ही ज़लील कर के मुलाज़मत से निकाल दिया गया था. क्योंकि हिन्दू दहशतगर्द नहीं चाहता था की उसकी
हिमाक़त और ग़फ़लत का कफ़्फ़ारा उसको अपनी ओहदे से अलहदगी के रूप में चुकाना पड़े. सो
उसने अपनी नाकामयाबी का तमाम नज़ला डॉक्टर कफील के ऊपर उतार दिया और उनको नाहेल, निकम्मा,
रिश्वतखोरी का झूठा इलज़ाम लगा कर नौकरी से ही मुअत्तिल कर दिया और ६ माह उनको जेल में
रहना पड़ा. वही डॉक्टर कफील हाल ही में जून
जुलाई २०१९ को बिहार में वैसी ही बीमारी से बच्चो को अपने खर्चे से बचाते हुए नज़र आये. और अधमरे बीमार बच्चो को अपने गोद में उठा के उनका
इलाज़ करते हुए नज़र आये. इस तमाम कारे ख़ैर और
इंसानीयति इक़दाम में डॉक्टर कफील ने हुकूमते बिहार से किसी भी क़िस्म की ना ही इमदाद
ली और ना ही हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम हॉस्पिटल में गए, बल्कि घास पूस और बांस का घर बना
के शहरी आबादी से दूर उन्होंने मरीज़ों का इलाज किया.
नाज़रीन आपको
इराक़ का बगदादी याद होगा उसके कारिंदे भी कुछ इसी तरह से अमलपेश होते थे जैसे की सरज़मीने
हिन्द पे काबिज़ हिन्दू दहशतगर्द अपने सरगना की अना को कायम रखने के लिए कश्मीरी अवाम
के साथ बर्बरियत का मुज़ाहेरा कर रहे हैं.
डॉक्टर सलीम
को तो कैमरे के सामने दिन के उजाले में हिन्दू दहशतगर्दों ने अगवाह किया है. कश्मीर में १० साल से ले कर १८ साल के कमो बेश ५०००
से ७००० नौजवानों को रातों की तारीकी १ बजे के बाद उनके वाल्देन के आँखों के सामने
एक-४७ और दिगर जानलेवा अस्लेह के साथ हिन्दू दहशतगर्द अगवाह कर के ले जा चुके हैं.
इनमे से किसी का भी कोई सुराग़ अभी तक नहीं है.
ज़ाफ़रानी सहाफियों के ज़ेरे क़ौल सब कुछ सही और दुरुस्त है. कल ही डॉक्टर सलीम को अगवाह करने के बाद दो ताजिरों को हिन्दू दहशतगर्दों ने
ज़बरदस्त गोली बारी की जिसके सबब एक ताजिर जहांबाहक हो गया.
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