जल्द ही हुकूमते नखलिस्तान हिन्द के मुसलमानों को कश्मीर पे उर्दू,
इंग्लिश और हिंदी में एक राय जारी करेगी. १५
दिनों की इनतेबह के दो दिन गुज़र चुके हैं.
जल्दी का काम शैतान का होता है.
जल्दबाज़ी, ज़बरदस्त गुस्से में, मसले की पेचीदगी और नफा नुकसान सोचे बग़ैर किये हुए फैसले हमेशा नाक़ाबिले तलाफ़ी और कभी ना
भरने वाले ज़ख्म देतें हैं. हाल ही में हुकूमते
हिन्द का मक़बूज़ा कश्मीर की मुस्तक़िल दफा और खुदमुख्तारी ख़त्म करने के फैसले पर अलामी
बरादरी भी खफा है. पाकिस्तान के बाद अब अमेरिका
और इंग्लॅण्ड के ऐवान में मसलाये कश्मीर पे और जिस तरीकेकार हिकमत इख्तियार कर के हुकूमते
हिन्द के वज़ीरे दाखला ने दफा ३७० और ३५ ए को ख़त्म किया है उसपे सख्त तशवीश का इज़हार
किया है. इससे क़ब्ल यूं एन पहले ही भारत की
ग़ैर ज़रूरी कारगरदेगी पर उसको खबरदार कर चूका है उसके इस अमल पे सबब सख्त नताइज होंगे
और बर्रे सग़ीर में बड़े पैमाने पे तबाही होगी.
यूं एन. ने पाकिस्तान से मुतालबा किया है की वो मसले में भारत की तरह ग़ैर ज़िम्मेदार
अमल से बचे. पाकिस्तान ने भारत के जंगी जराइम
और कश्मीर पे फौजी हमले को जंग की जानिब जाने का इशारा किया है, ये मसला भारत में एक
और खून रेज़ी की तरफ इशारा कर रहा है.
तमाम मुमालिकों को अपनी बॉर्डर और हुदूद के तहफूज़ज का पूरा इख़्तियार
है लेकिन ग़ैर ज़रूरी मसाइल में उलझना और तबाही, बड़े पैमाने पे खून रेज़ी, जंग को मदू
करना शैतानों, दिमागी मुफ़लिसों और जाहिलों का काम है. इस तरह के अनासिर जंगी सौदागर है जिनको जंग करने
की बीमारी होती है. अगर ऐसे अवाम को पड़ोसिओं
के साथ कोई और मसला जंग के लिए नहीं मिलता है तो अपने ही हम वतनों को हजूमी दहशत के
साथ हलाक़ कर डालतें हैं, क्योंकि ऐसे मुल्क़ के अवाम को जंग करने की बीमारी रहती है.
हुकूमते हिन्द का मसलये कश्मीर पे ना सिर्फ आलमी बरादरी को भरोसे में ना लेना बल्कि
अपने खुद के मुल्क के मुख़लिफ़ीनों को भरोसे में ना लेना किसी बेवकूफी भरा अमल है. हुकूमते हिन्द के इस अमल से साबित होता है की वो,
उनके कारिंदे और ज़ाफ़रानी रकूने पार्लियामेंट शैतानों के वारिस और नस्ल में से हैं ना
की संतों की नस्ल से हैं.
हुकूमते हिन्द के काम काज का तरीक़ा किसी भी तालीमी आफ़ता और ज़हीन इंसान
के समझ के बहार है. बिलकुल हम नए भारत की
जानिब गामज़न हैं जहाँ किसी भी मसले पे गुफ्तगू नहीं होती, उसको हल करने का मंसूबा नहीं
होता. क्या ये जमुहरियत है, जहाँ सिर्फ दो
तीन अफ़राद मिल के फैसला कर लेते हैं, जिसको रकूने एवान सुन के बदहवास और भौंचक्के रह
जातें हैं. यकायक ज़रकारबंदी (नोट बंदी) की
थी उसके पीछे की दलील वज़ीरे आज़म की ये थी की इस क़दम से दहशतगर्दों पे लगाम लगेगी. देशतगर्दों की जड़ों को कमज़ोर करने के लिए ये ज़रूरी
क़दम था. दूसरी वजह उन्होंने बताई की काला धन के मुजरेमीनों को वतन से भागने में मदद नहीं
मिलेगी इसलिए ये फैसला फौरी लिया गया. लेकिन
नोट बंदी के १ ही महीने के अंदर २ हज़ार के नोटों के बंडल कश्मीर से बरामद हुए थे. और जितने भी धोखेबाजी में मुलव्विस अफ़राद थे वो
बेरुन मुल्क़ भाग गए अब हुकूमत उनकी वतन वापसी के लिए कानूनी जंग लड़ रही है.
दूसरी बात नोट बंदी के बाद भी कई दहशतगर्दाना हमले भारत में हुए. फिर
मोदी के बयान और उसके ऊपर नोट बंदी की अमल दोनों ही नाकाम साबित हुए. क्योंकि नोट बंदी के अपने मक़सद को भारत नहीं हासिल
कर सका.
उसी हिसाब से ट्रिपल तलाक़ पर मोदी ने बिल पास किया लेकिन मुस्लिम अवाम
के कानून साज़ों, दानिशवरों और तालीमी आफ़ता लोगों से गुफ्तगू तक नहीं की. अवाम का जो तपका हुकूमते हिन्द के सख्त ज़ालिमाना और मुतस्सिब
ज़ेहनियत के सबब मुतास्सिर होगा क्या उसको बिल पास करने के पहले से भरोसे में नहीं लेना चाहिए
था.
ओमुमन मोदी इन्तेज़ामियाँ मुख़ालिफ़ों और अवाम के उस तपके को कभी भरोसे
में नहीं लेती है जो उसकी ज़ालिमाना कारगरदेगी से सबसे ज़्यादा मुतास्सिर होगा. कश्मीर में दफा ३७० और ३५ ए का हटाना भी हुकूमते
हिन्द का गैरज़रूरी और ना मालूम अमल है. हुकूमते पाकिस्तान
और भारत के मुख़लिफ़ीनों को भरोसे में लिए बग़ैर किया हुआ हुकूमते हिन्द का ये कत्ले आम
है.
हुंकुमते हिन्द ने तमाम तरह की गुफ्तगू पकिस्तान से मुल्तवी कर दी थी और पाकिस्तान से मसलये कश्मीर पे किसी भी किस्म की बात चीत के लिए तैयार नहीं थी. भारत के वज़ीरे खारजा इस मसले पे तीसरे फ़रीक़ की कारगरदेगी को मना कर दिया, और साफ़ अलफ़ाज़ में कहा कश्मीर मसला दो मुल्कों का मसला है, जब मसलाए कश्मीर दो मुमालिकों के दरमियान का मसला है तो सिर्फ अकेले भारत ने कैसे उसके ऊपर फैसला कर लिया. उस हिसाब से भारत की ज़ालिमाना, फौजी कारगरदेगी को कैसे जाइज़ ठहराया जा सकता है.
भारत का कश्मीर पे हालिया हमला ना सिर्फ पाकिस्तान बल्कि आलमी बरादरी
की भी नाक भवें सिकुड़ने लगा है. मसला जंग की
तरफ जा रहा है, और हालात बर्रे सग़ीर में सख्त तबाही की और इशारा कर रहें हैं. अगर
मसलये कश्मीर पे जंग होती है तो अमेरिका, चीन,
रूस और इनलैंड जैसे मुल्क़ कश्मीरी अवाम के साथ होंगे और उनकी जाइज़ आज़ादी की मांग की
हिमायत करेगें. भारतीय हुक्काम आज़ादी की आवाज़ को बन्दूक और फौजी हिकमत से कुचल नहीं
सकती. यूं एन पहले ही इशारा कर चूका है भारत
का कश्मीर की खुदमुख्तारी और ३७० ३५ ए को छीनने का अमल क़ाबिले मज़म्मत और बाइसे लानत
है जो की किसी शहरी की हुकूक और ज़िन्दगी के ऊपर कब्ज़ा करने जैसा है.
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