Saturday, 17 August 2019

मसला ऐ कश्मीर पे हुकूमते हिन्द की गलती, क्या होगी तलाफ़ी.

ये बात उमूमन देखने में आई है की शिद्दत पसंद, दहशतगर्द पीछे से वार करतें हैं और ज़्यादातर रात की तारीकी में हमलावर होतें हैंचाहे वो बाबरी मस्जिद में राम की मूर्तियां रखने का मामला हो या बालाकोट में झूटी और फरेबी सर्जिकल स्ट्राइक हो या तबरेज़ जैसे किसी भी मुस्लिम नौजवन को मार मार के हलाक करने की कारगरदेगी हो.
पीठ पीछे वार करने के मामले में ज़ाफ़रानी हुकूमत के नाम एक और तमग़ा जुड़ गया हैनोट बंदी, ट्रिपल तलाक़ और अब कश्मीरबग़ैर मशवरा किये सिर्फ अपने आना को कायम रखने की नियत से तमाम घाटी को आतिशे नार कर दियाज़बरदस्त जंग हो रही है जिसकी तपिश अब हिंदुस्तान के दिगर शहर और सूबे भी भोगेंगे.   
क्या ये मोदी और उसकी हुकूमत का महज़ एक इत्तिफ़ाक़ है या मोदी कस्दन ऐसे फैसले लेता है. और अपने आपको एक बोहोत ही ज़हीन, काबिल सूझ बूझ वाला वज़ीरे आज़म साबित करना चाहता हैलेकिन हर बार अचानक लिए हुए फैसले उसको अहमक़, बेवकूफ और जाहिल साबित कर देतें हैं.   
उसने अचानक से लिए हुए फेलसों की वजह से अवाम को तबाही और ज़ब्र बर्दाश करना पड़ाक्योंकि उसके नोट बंदी, ३७० जैसे अज़ीम और अहम फैसले अचानक ले लिए जो की ऐवान के एक्शन बोर्ड पे थे ही नहींऐसे अचानक बग़ैर सलाह मशवरा किये हुए फेसलों का नुकसान मोदी और उसकी इंतेज़ामिया को तो नहीं होता लेकिन आम अवाम ऐसे बेवकूफी और जाहिलाना फेसलो की ज़द और जब्र बर्दाश नहीं कर पाती हैज़रकार बंदी (नोटबंदी) नाफ़िज़ की लेकिन हिन्दुस्तान के १३० करोड़ जिस अवाम को इसकी ज़द सबसे ज़्यादा महसूस होनी थी उससे राय मशवरा ही नहीं किया.   
ट्रिपल तलाक़ बिल बनाया लेकिन मुस्लिम दानिशमंदो, तालिमीयाफ्ता और मौलानाओं की जमात से मसले पे तबादले ख़्याल ही नहीं किया, अब जो मसला फिर से सुप्रीम कोर्ट में ज़ेरे ग़ौर है.
कश्मीर की खुदमुख्तारी छीनी और दफा ३७० ख़तम की लेकिन कश्मीरी अवाम को तो छोड़ दो कश्मीर के सियसतदाओं से भी कोई गुफ्तगू नहीं कीयहाँ तक की साबिक़ वज़ीरे आला ओमर अब्दुल्लाह और मेहबूबा मुफ़्ती से तक राये मशवरा नहीं लियाये जमुहरियत का कौन सा अंदाज़ है ये सहाफी समझने से क़ासिर हैजिस मसला ऐ कश्मीर को भारत अभी तक अंदरूनी मामला बता के फूलता रहता था, अब वो मसला आलमी बरादरी की नज़र हो गया. जो मसला कभी सिर्फ हिन्दुस्तान के अयीन तक महदूत था उसको खुद मोदी इंतेज़ामिया ने अलामी पार्लियामेंट तक पहुंचा दियामतलब तुम सबसे बड़े बेवकूफ साबित हुएमोदी ने अपनी आना को क़याम रखने के लिए मसला कश्मीर को मज़ीद पेचीदा कर दिया, और उसको बेन अक़वामी सतह पे पहुंचाने का काम किसी ने अगर किया है तो वो है मोदी इंतेज़ामिया
बरोज़ जुमे को मुत्तहेदा कौमी सलामती कौंसिल ने इस बात का एतेराफ किया की कश्मीर एक मुतनाज़ा मामला है और वो भारत का अंदुरनी मामला नहीं है और ना ही भारत को ऐसे पेचीदा मामलों में एकतरफा कारवाही या कानून बनाने का हक़ हैजो बात पिछेल ५० साल में नहीं हुई मोदी ने उसको महज़ अपने सालों की मुतवातिर मेहनत के बदौलत बेनक़वामी सतह पे फरोग दिला दियाअब अगर हुकूमते हिन्द कोई करारदार या क़ानून कश्मीर की निस्बत से नाफ़िज़ करना चाहती है तो चाहा कर भी नहीं बना सकती.

दूसरी बात जिस अंदाज़ में कश्मीर जैसे अदना और कमज़ोर मुल्क़ पे भारत ने अपनी फौजी कुव्वत इस्तेमाल कर के कब्ज़ा करने की कोशिश की है उसपे भी सलामती कौंसिल ने सख्त तशवीश ज़ाहिर की हैनाज़रीन आपको याद होगा १९९२ में इराक़ ने कुवैत पे फौजी हमला कर के क़ब्ज़ा कर लिया था. वो मसला सलामती कौंसिल तक पंहुचा था, जैसे आज पाकिस्तान ने चीन की मदद से सलामती कौंसिल का हगामी इजलास बुलाया है, ठीक उसी तरह सऊदी अरब ने अमेरिका की मदद से सलामती कौंसिल का हगामी इजलास बुलाया थाजबकी बेन अक़वामी सतह पे उस मसले को इतनी शिद्दत और फरोग भी नहीं मिली थी जितनी की कश्मीर पे भारत के फौजी हमले से मिली है, फिर भी सलामती कौंसिल में क़रार पास किया गया और सद्दाम हुसैन को फ़ौरन अपनी फौजे वापिस कर के एक खुदमुख्तार मुल्क़ पे से अपना दावा ख़ारिज करने को कहा था और उनको १५ दिनों की मोहलत और मुद्दत दी गई थीठीक उसी तरह आज सलामती कौंसिल में जिस तरह से तमाम १५ मुमालिक इराक़ के खिलाफ खड़े दिखे थे भारत की फौजी कारगरदेगी के खिलाफ खड़े हैंजिस रूस पे ज़ाफ़रानी मीडिया कसीदे कस रहा है वो भी मासूम अवाम पे फौजी कारवाही की मज़म्मत कर रहा है और भारत की कारवाही के खिलाफ हैअलबत्ता जंग के बजाये वो इस बात की हियमायात करता हुआ दिखा की दोनों फ़रीक़ (पाकिस्तान और हिन्दुस्तान) मसले को आपस में बैठ कर सुलझा लें और खित्ते को जंग की अज़ीयत से दस्तबरदार करें
  
भारत को बोहोत ही यकीन था की रूस उसका हिमायती बनेगा बरक्स हुआ उसके ठीक उल्टा रूस ने कश्मीरी अवाम पे भारत की फौजी तशद्दुत और दहशत को हरगिज़ जाइज़ नहीं ठराया.   दोयम अलामी जंग के बाद सलामती कौंसिल को तैयार किया गया था. आलमी बरादरी का सलामती कौंसिल को तैयार करने के पीछे मक़सद भी ये ही था के कमज़ोर पे ताक़तवर या छोटे मुल्क़ पे बड़ा मुल्क़ हमला कर के क़ब्ज़ा कर लेअगर सलामती कौंसिल को नहीं बनाया जाता तो आज तमाम छोटे मुमालिक अपने आपको भारत जैसे मुल्को की दहशत से ख़ौफ़ ज़दा दिखते.   आज भारत के आस पड़ोस में सिर्फ पाकिस्तान और चीन भारत की दहशत का जवाब बा खूबी दे सकतें हैं.  अगर सलामती कौंसिल अमल में नहीं आया होता तो नेपाल, भूटान, कश्मीर, बंगलादेश, म्यामांर, श्रीलंका, मालदीव जैसे सभी छोटे देश भारत की फौजी दहशत के सामने अपने आपको पस्त और कमज़ोर तस्सवुर करतेलेकिन सलामती कौंसिल ने कमज़ोर और छोटे मुल्कों को ये कुव्वत और ताक़त फ़राहम की है की अगर कोई ताक़तवर बड़ा मुल्क उनपे हमलावर हो तो तमाम आलम की फौजें (अलाइड फोर्सेज) उस कमज़ोर मुल्क की दिफ़ा और बाज़याबी आज़ादी के लिए ताक़तवर मुल्क़ से जंग का आगाज़ करें. लेकिन ऐसा करने के पहले उस ख़बीस, ज़ालिम, शैतान दहशतगर्द को कुछ वक़्त की मोहलत दी जाती है की अपनी शैतानी फितरत बंद करो नहीं तो इतने दिन पे बाद तुम पे हमला.  
इराक़ ने सलामती कौंसिल के फैसले को नहीं माना था और वक़्ते मुक़्क़र्रा तक अपनी फौजें कुवैत से नहीं निकाली थी सो अंजाम भोगाअब बारी भारत की है२१ अगस्त को १५ दिनों को मोहलत ख़त्म हो रही है उसके बाद जंग या अमनदोनों ही फैसले भारत की तारिख और नक़्शा बदल देने वाले हैंलेकिन जंग में गया तो ज़बरदस्त नुकसान उठाना पड़ेगा और अमन में गया तो नुकसान नहीं होगा, हाँ सिर्फ नक़्शा और तारीख बदल जायेगी.  
कश्मीर में फौजी हमला कर भारत के नाजाइज़ कब्ज़े का आज १३वा दिन है. अब ये देखना दिलचस्प होगा की सलामती कौंसिल के सख़्त रवय्ये के बाद उस हमले की तलाफ़ी भारत कैसे करता है और एक कमज़ोर मुल्क़ पे फौजी हमले का कफ़्फ़ारा किस अंदाज़ में देता है.

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