अज़ीज़
नाज़रीन,
मुसन्निफ़
का आज का मौज़ूं रूहानियत, वलीयों और रूहानी शख्सियत के ऊपर मुन्नसर है. इस सहाफी ने अपने हिंदी मज़मून मुसलमानों की तालीम पे ज़ाफ़रानी और शैतानी देहशत. इल्म की एहमियत पे रौशनी डाली है. इल्म, बुज़ुर्गी और रूहानियत ये तीनों चीज़ें अल्लाह चाहे तो जिसको बे शुमार अता करे बे इख्तयार अता करे उसका कोई भी हाथ रोकने वाला नहीं है. यहाँ दो बातें वाज़े करता चलूँ की बुज़ुर्गी और रूहानियत में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ होता है. एक शख्स उम्र के आखिर पड़ाव में पहुंच गया; हो गया वो उम्र के हिसाब से बुर्जग; लेकिन रूहानियत के अपने उस मर्तबे को ना पहुंच सका क्योंकि वो अल्लाह के क़रीब ना था. तो अल्लहा तबारक ताला रूहानियत भी उसी को अता करता है जो इसके एहल होता है. दूसरी बात एक आलिम और रूहानी शख्सियत शैतन को अपने काबू में कर लेते हैं लेकिन बुज़ुर्ग नहीं कर सकता.
आज के हालाते हाजरा में और नए हिन्दुस्तान के एवान में शैतानों की फौज फ़ाइज़ हो चुकी है और वो बदगुमान और गुमराह हो गए ये सोच के की हिंदल वली अताये रसूल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, महबूबे इलाही निजामुद्दीन ओलिया तो फौत हो गए अब उनके पास कूव्वत और उसत कहाँ रही के हिंदुस्तान की तारिख बदल सकें. ख्वाजा साहब जब हयात थे तो उन्होंने मोहम्मद ग़ौरी की मदद की थी और वो दहशतगर्द और शैतानी मर्कज़ पृथ्वी राज चौहान पे फतह हासिल करने में कामयाब हुए थे. आज के दौर में इन शैतानी फ़ौजिओं ने सोचा था हम जो शैतानी फितरत करेंगे जो भी जुल्म ज्यात्ति करेंगे, जो भी ना इंसाफ़ी करेंगे कौन रोकेगा. लेकिन ये बदगुमान भूल गए थे की अल्लाह के बारगोज़िदा बन्दे जब अपने उस मर्तबे को हासिल कर लेतें हैं जिसकी उनको ख्वाहिश होती है तो वो दुनिया से किनारा हो जातें हैं और अलहदगी इख्तियार कर लेतें हैं लेकिन वो अपनी अपनी क़ब्रों में आज भी अल्लाह की इताअद और हम्दो सना करते रहतें हैं. जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने इन मज़मूनों में बा खूबी किया है. तो आज के दौर के ज़ालिम हाकिम की वजह से हिंदुस्तान की तारिख भी बदलेगी और आइन भी.
क़लम की ताक़त और कुव्वत के ऊपर भी इस सहाफी ने कई मज़मून कलमबंद किये हैं. और ये सहाफी समझता है जो इज़ा क़लम की मार से होती है वो तलवार की धार से भी नहीं होती. इस सहाफी को रूहानी क़लम हासिल करने का शर्फ हासिल हुआ है और वो क़लम उसको ख़्वाजा ऐ खाजगान ने अता की है. जो बीजेपी के तमाम रकूने शैतान(पार्लिआमान) हैं ख़ास बड़ा शैतान (मोदी), मझला शैतान (अमित) और छोटा शैतान (योगी) अगर ये समझतें हैं की रूहानी शख्सियत तो अपनी अपनी क़ब्रों में चली गई अब उनकी ताक़तें ख़तम और हम लोग अपने शैतानी फ़ैल के सबब खूब खून रेज़ी करेंगे, ना इंसाफ़ी करेंगे, दग़ाबाज़ी करेगें तब भी हमारा दामन पकड़ने वाला कोई ना होगा. अदलिया हमारी, हुकूमत हमारी, फौज हमारी, पुलिस हमारी हम सबको फ़ना कर देंगे तो ऐसा हरगिज़ ना हुआ है और ना कभी होगा. रूहानी ताक़तों का फ़ैज़ अक़ीदतमंदों पे फ़ैज़याब करने और मुजरिमों की गिरफ्त को लेकर आज भी जारी है.
हैदराबाद के रकून पार्लियमान जनाब असदुद्दीन ओवैसी इस सहाफी के एक मज़मून जिसमे उसने लिखा था नखलिस्तान का आइन लिखा जा रहा है और उसको जल्द ही कोर कमिटी की सिफारिशों के बाद नाफ़िज़ किया जाएगा, ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों, हिन्दू दहशतगर्दों (रकूने पार्लिअमान) के दबाव में आ कर कहतें हैं की पाकिस्तान का आइन तो फ़िरक़ापरस्त ताक़तों ने लिखा है जिसमे मुजरिमाना सोच है हम ऐसे आइन का हिस्सा नहीं हैं हम तो भारत के आइन की ताईद करतें हैं जो सेकुलरिज्म के उसूलों पे मुन्नासिर है. असद भाई के इल्म में इज़ाफ़े के लिए बता दूँ की आज की तारीख में नखलिस्तान का आइन तक़रीबन मुकम्मल हो चूका है जिसको खुद ख्वाजा ऐ खाजगान ने रसूल अल्लाह की ज़ेरे क़यादत निजामुद्दीन ओलिया की सरपरस्ती में लिखा है. दूसरी बात ५०० से १००० पन्नों का आइन सिर्फ एक ही क़लम से लिखा गया है. जिसकी सियाही है की सूखती ही नहीं. और ये वही रूहानी क़लम है जो के इस सहाफी को ख़्वाजा ऐ ख़्वाजागान ने अता किया था. लेकिन ये सारी बातें एक आम शहरी और इंसान की समझ से परे है और ऐसी बातों पे कोई यकीन भी नहीं करेगा सिर्फ वो ही जो तस्सव्वुफ़ और एहले तरीक़त के उलूम से वाक़फ़ियत रखता होगा. दूसरी बात ये ऐसी चीज़ें वहाँ से शुरू होती हैं जहाँ अक़्ल गुम हो जाती है जब अल्लाह अपने बन्दों को कोई नेमत अता करना चाहता है तो शैतानी फ़ैल को उससे दूर रखता है.
असद भाई आती दुनियाँ देखेगी की आपके सेक्युलर आइन के होते हुए भी अकलियतों के हुक़ूक़ (ख़ास मुस्लिम क्रिस्टी) की कैसी धज्जियाँ उड़ाई गई. अकलियतों को कोई भी मज़हबी, क़ानूनी और समाजी इख्तियार आइन के हिसाब से नहीं दिए गए जिसके ऊपर आपको नाज़ है. वही नखलिस्तान के रूहानी आइन में तमाम अकलियतों को वो तमाम हुक़ूक़ हासिल होंगे जो मुस्लिम, सिख, क्रिस्टी अवाम को हिंदुस्तान में नहीं मिल सके. ऐवान में मुस्लिम रकूने पार्लिअमानों के हलफबरदारी पे कैसा बरहना रक्स किया था और शिद्दत पसंदी का मुज़ाहेरा किया था नारे लगाए थे. ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पे आज़म खान बोलने खड़े हुए तो उनको बोलने नहीं दिया गया उनकी आवाज़ को इलज़ाम तराशी कर के पस्त कर के घोंट दिया गया.
जिस जिस संघी दहशतगर्दों ने और शिद्दत पसंदों ने रसूल अल्लाह की शाने मुबारक में गलीज़ अदना दर्जे की गाली गलौच की थी आसमानी किताब क़ुरआन का मज़ाक बनाया था और अल्लाह के जलाल और गज़ब को अपने पैरों तले रौंदने का अज़्म किया था वो सब बरहना होंगे रूसवा होंगे. उन सब के मुँह से कीड़े निकलेंगे और आती दुनियाँ उनके इस हशर से इबरत हासिल करेगी. जिस जिस ने गुमनाम हो कर अपने झूठे और फरेबी नामों से इस्लाम और रसूल का मज़ाक बनाया था गालियाँ दी थी एक के बाद एक सब कैंसर में मुब्तेला होंगें और उनके क़रीबी रिश्तेदार मुस्लिम दोस्त एहबाब सख़्त ताज्जुब करेगें की ये इंसान तो गले लगता था उसको हमारा हमदर्द बताता था इसके दिल में रसूले अरबी के लिए इस्लाम के लिए क़ुरआन के लिए इतना ज़हर था.
खबरदार कोई भी मुस्लिम आलिम, रूहानी ताक़त और वली हमारे फैसले को बदलने की कोशिश ना करे नहीं तो वो अज़ाबे इलाही का मुर्तकिब होगा. कोई भी संघी शिद्दत पसंद हमें गाली देता चलता था हमारे एहले खाना को दुख्तराने मिल्लत को गाली देता था चलता था लेकिन रसूल को उनकी दुख्तर को उनकी ज़ौजा को गाली हरगिज़ बर्दाश्त नहीं की जायेगी. हम तो उसी वक़्त अल्लाह से इल्तेजा करते थे की इसको इसके अंजाम तक पहुँचाना.
नखलिस्तान का परचम पूरी तरह से तैयार है तमाम परचम सब्ज़ होगा और दरमियान में चाँद तारा होगा. ये परचम पाकिस्तान का नहीं है बल्कि ये परचम आज़ादी के मतवालों का है. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ख़िलाफ़त तहरीक के वक़्त था, जिसको तमाम अवाम ने हाथों हाथ उठाया था. जब वो इस परचम को उठा के फ़िज़ाओं में आज़ादी के नक़्क़ारे बुलंद करते थे जिसमे हिन्दू मुस्लिम सिख पारसी सभी शामिल थे.
संघी दहशतगर्द अमित शाह जैसे शैतानी फितरत दुनयावी कानून का डर दिखाता है, संघी कहतें हैं इसके ऊपर किसी बड़े सियासतदां का हाथ है नहीं हरगिज़ नहीं जिसके ऊपर वालिओं का हाथ हो जिसके साथ ख़्वाजा ऐ खाजगान हों उसका कोई बाल भी बीका नहीं कर सकता. जब दौरे ग्यासी में निजामुद्दीन ओलिया को उस वक़्त का हाकिम गिरफ्तार नहीं कर पाया तो आज के कुफ्रिया दौर में शैतानी मर्कज़ का हाकिम कैसे उनके चाहने वाले और मोतक़िद को गिरफ्तार कर पायेगा. फिर भी आज से लेकर १५ दिनों की छूट दी ज़ाफ़रानी हाकिमों को हमको गिरफ्तार कर के दिखाए, बावजूद उनके पास तमाम कुव्वत और ताक़त के वो हमको छु भी नहीं पाएंगे. आँखे धोखा खा जायेगी अक़्ल काम नहीं करेगी सोचने समझने की कूव्वत छीन ली जायेगी.
संघी दहशतगर्द अमित शाह जैसे शैतानी फितरत दुनयावी कानून का डर दिखाता है, संघी कहतें हैं इसके ऊपर किसी बड़े सियासतदां का हाथ है नहीं हरगिज़ नहीं जिसके ऊपर वालिओं का हाथ हो जिसके साथ ख़्वाजा ऐ खाजगान हों उसका कोई बाल भी बीका नहीं कर सकता. जब दौरे ग्यासी में निजामुद्दीन ओलिया को उस वक़्त का हाकिम गिरफ्तार नहीं कर पाया तो आज के कुफ्रिया दौर में शैतानी मर्कज़ का हाकिम कैसे उनके चाहने वाले और मोतक़िद को गिरफ्तार कर पायेगा. फिर भी आज से लेकर १५ दिनों की छूट दी ज़ाफ़रानी हाकिमों को हमको गिरफ्तार कर के दिखाए, बावजूद उनके पास तमाम कुव्वत और ताक़त के वो हमको छु भी नहीं पाएंगे. आँखे धोखा खा जायेगी अक़्ल काम नहीं करेगी सोचने समझने की कूव्वत छीन ली जायेगी.
फिर जब तमाम ततबीर काम ना कर पाए तो समझ जाना की रूहानी फ़ैज़ शुरू हो चूका है और अब तुम्हारी शैतानी ताक़त पस्त हो गई है जिसको २०१८ में ही ग़ौसुल आज़म के दरबार में सजा हो गई है. दो ज़ालिमों को पकड़ के सजा देने का एलान ग़ौसुल आज़म ने कर दिया है और ज़िम्मेदारी डी.अस.पी. साहब को दी है और जल्द ही वो उन दोनों शैतानों को गिरफ्तार करेंगे. फिर अगर चाहो तो इक़्तेदार मुसलमानों के हाथ में दे देना जैसा की यहूद ने किया था या जंग की अज़ीयत अपने मुल्क के बाशिंदों को देना, लेकिन जंग तुम हरगिज़ हरगिज़ नहीं जीत पाओगे, शाकिस्त हर हाल में तुम्हारी ही होगी.
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