अज़ीज़ नाज़रीन,
ज़ाफ़रानी दहशत
के काले और बुरे दिन उसी वक़्त से शुरू हो गए थे जब उन लोगों ने २०१८ में इंतेखाबात घपला करके जीतने के ख्वाब देखे थे; और उसको फिर सच्चाई में तब्दील करने के लिए उन्होंने
ना सिर्फ घपला किया बल्कि ऐवान में ऐसे ऐसे
जाहिल, मुजरिम और दहशतगर्दी में मुलव्विस लोग भी पहुंच गए जिनके पहुंचने की ज़र्रा बरबार
किसी को उम्मीद नहीं थी.
फिर ज़ाफ़रानी
महाज़ और शिद्दत पसंद गुंडे ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ ज़बरदस्त रक्स करने
लगे. क्योंकि जो चीज़ उनको तक़रीबन ना मुमकिन
लग रही थी वो मुमकिन हो गई. इन शिद्दत पसंद
अनासिरों की ख़ुशी इस बात को ले कर नहीं थी की उनके काम को अवाम ने सराहा और मज़ीद ५
साल का वक़्फ़ा उनको अवाम ने खिदमत करने को फ़राहम किया. बल्कि उनकी खुशी इस बात को ले कर थी के इनकी फरेबी,
धोखेबाज़ी और जालसाज़ी की हिकमत कामयाब हुई और उसके चलते दुश्मन पस्त हो गया. जिस मुख़ालिफ़ीन को ये लोग ख़ास मीडिया के लंगूर और
लँगूरनियाँ दुश्मन तस्सुवर कर के ज़हर अंगेशी कर रहे थे असल में वो कोई बेरुन मुल्क
हमलावर नहीं थे बल्कि मुख़्तलिफ़ पार्टिओं के नुमाइंदे थे और वो पार्टिया मुस्लिम नहीं
बल्कि हिन्दू ही थी.
कुछ ख़ास ज़हरीले
अलफ़ाज़ जो दौराने शुमारी (गिनती) ये लँगूरनियाँ इस्तेमाल कर रही थी. "दुश्मन को मोदी सेना ने वही ढेर कर दिया",
"दुश्मन का एक और फौजी ढेर", "दुश्मन का एक और क़िला मोदी सैनिकों ने
किया फतह", "हिन्दू धर्म यूद्ध जीत गया", "इस धर्म यूद्ध में हिन्दुओं
की जीत हुई", "दुश्मन चारो खाने चित", "दुश्मन का आखिर क़िला ध्वस्त"
नाज़रीन आपको
याद होगा फरवरी २०१८ तक मोदी और बीजेपी की किस क़दर किरकिरी और फ़ज़ीहत हो रही थी और ज़ाफ़रानी महाज़ को अपनी हार तक़रीबन पक्की लगने लगी थी. सभी
हलक़ों में उसको ज़बरदस्त एंटी इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा था. फिर अचानक से तमाम टीवी मुज़ाकरात और अखबार की सुर्ख़ियों
के नीचे ज़ाफ़रानी तास्सुरात बिलकुल मुख़तलिफ़ हो गए. जो शिद्दत पसंद अभी दो तीन महीने पहले ख़ौफ़ज़दा रहते
थे वो खुल के रू बरू बोलने लगे कुछ भी कर लो आएगा तो मोदी ही. इस पसमंज़र में ये सहाफी कहना चाहता है की बीजेपी
ने ख़ुफ़िया मीटिंग कर के मार्च अप्रैल २०१८ में इन्तेख़ाबात को ग़ैर ज़रूरी, ग़ैर क़ानूनी
हिकमत इख़्तेयार कर के अपने हक़ में मुत्तासिर करने का पूरा प्लान बना लिया था.
फिर नवंबर
२०१८ से बीजेपी के बर्बादी के दिन शुरू हुए.
नवंबर २०१८ से ले कर अगस्त २०१९ तक
महज़ ९ महीनों में ज़ाफ़रानी दहशत ने खोये कई बड़े लेफ्टिनेंट कमेंडेन्ट जिसने दहशत की
कमर तोड़ डाली. जिसमे शामिल हैं दो मौजूदा वज़ीर
और तीन साबिक़ वज़ीर. अनंत कुमार केबिनेट वज़ीर
और परिकर वज़ीरे आला फिर अटल बिहारी वाजपाई
साबिक़ वज़ीरे आज़म और तंज़ीम के अज़ीम रहनुमा जिनके बताये हुए रस्ते पे चल के भारत और आज
के दौर के नए वज़ीर कुछ तो तालीम ले सकते थे.
उसके बाद सुषमा और जेटली साबिक़ वज़ीर.
इन अज़ीम रहनुमाओं के फौत हो जाने से ज़ाफ़रानी दहशत की जैसे कमर ही टूट गई है. मोदी ने ज़रकार बंदी (नोट बंदी) की थी और फौरी लिए
हुए फैसले को बोला था ऐसे दहशत की कमर टूट जायेगी. लेकिन उस मालिके हक़ीक़ी के फ़ौरी फैसले से मोदी और
ज़ाफ़रानी दहशत की कमर टूट गई है. अनंत कुमार
और परिकार तो मौजूदा वज़ीर के ओहदे पे फ़ाइज़ थे और जवानी की हालत में फौरी फौत हुए. जैसा मोदी फौरी फैसले करता है और अपने आपको बोहोत
ही ज़हीन समझता है, जाहिल, वैसा ही मालिके हक़ीक़ी
ने मोदी के साथ किया.
अभी तो लंभी
क़तार है बीजेपी के विकेटों के डाउन होने की. सभी लोग जो मुस्लिम अवाम उनके खुदा, पेगंबर
ओर आसमानी किताब की बेइज़्ज़ती करते थे उनको केंसेर हूआ. मुम्बई पुलिस कमिश्नर रॉय
केंसेर से पीड़ित था ओर अपना खुदका एनकाउंटर कर लिया. हलक़ मे गोली डाल के चला दी.
उसको एनकाउंटर करने का बड़ा शौक था. ओर मासूम मुस्लिमों का बोहोत एनकाउंटर किया था.
हर वो इंसान केंसेर से मरेगा जो इस्लाम को गंदी गाली गलोच करता था. दूसरी बात ए तो
बड़े वज़ीर और अज़ीम शख्सियत हैं जो अभी हाल के कुछ दिनों में मारे गए. बीजेपी के छोटे
सियासतदां विधायक ओर अम.अल.सी. ओर उनके मेम्बरान एहले ख़ाना वो तो अलहदा हैं. इन सब को फौत होते देख कर लगता है अब अमित की बारी
है उसके बाद योगी की होगी, क्योंकि इन दोनों ना मुरादों ने भी मुस्लिम अवाम की कुछ
कम हक़तल्फ़ी नहीं की है. बिल आखिर शैतानी
मरकज़ का ख़ात्मा होगा. उसके बाद नंबर लगेगा लगूरों
ओर लंगूर्नियों का वो भी कुछ कम ज़ेहेर नही फैलाते थे. अगर उन्होने अपनी ज़िम्मेदारी
निभाई होती तो आज हर दूसरा हिन्दू ज़ेहरीला नही होता. ओर उनको उनकी गुस्ताखी का इतना
बड़ा जवाब मालिके हक़ीक़ी की जानिब से नहीं मिलता.
सबसे आखिर में शिद्दत पसंद हिन्दू, दहशतगर्द होंगे.
जिस फरेबी
और जालसाज़ी के ज़ोर पे २०१९ की जीत पे ज़ाफ़रानी अनासिर ख़ुशी से झूम रहे थे उन बेवकूफों
को ये तक इल्म नहीं था की उनकी अक़्ल को खपत कर दिया गया है उल्टा काम करने के लिए. उनकी इस झूटी, फरेबी जीत में ही उनके तबाही और बर्बादी
के पोशीदा अक्स नुमाया हैं.
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