अज़ीज़
नाज़रीन,
मुस्लिम,
क्रिस्टी, सिख और दलित भाइयों और बहनों को सलाम, hellow, ससरियाकाल, और
आदाब.
आप तमाम हज़रात को ये जान के
अज़हद मुस्सरत और बे पनाह ख़ुशी होगी के गज़वा ऐ हिन्द के तमाम हालात भारत में बन चुके हैं. २०१९ पार्लिअमानी इंतेखाबात में जिस अंदाज़ से फरेब,
दग़ाबाज़ी, धोकेबाज़ी से ज़ाफ़रानी महाज़ जीत के भारतीय पार्लियामेंट पे काबिज़ हुआ था वो
उसकी कारगरदेगी हरगिज़ नहीं थी. बरक्स बीजेपी ने अपनी खुद की शमशान के सफर का खुद आगाज़
कर लिया है. फील वक़्त बीजेपी और ज़ाफ़रानी महाज़
जीत के ऊपर ख़ुशी से फूले नहीं समां रहे थे लेकिन उस जाहिल, गफलत के मारे को क्या मालूम
था की उसकी जीत के अन्दर ही उसकी तबाही और हार पोशीदा है.
दूसरी बात ज़ाफ़रानी मीडिया के
लंगूर और लँगूरनियाँ इश्तेआल अंगेज़ी कर रहे थे और मोदी बनाम मुख़ालिफ़ों के इस इंतेखाबात
को वो धर्म युद्ध का नाम दे कर कह रहे थे की दुश्मन हार गया, हिन्दू इस धरम युद्ध में
जीत गया. जबकि वो इंतेखाबात ना तो हिन्दू बनाम
मुस्लिम थे और ना ही मुसलमानों ने उस वक़्त तक मोदी और शिद्दत पसंद हिन्दू दहशतगर्दों
के खिलाफ जिहाद का एलान किया था. बल्कि वो
इंतेखाब मोदी (बीजेपी) बनाम मुख़ालेफ़ीन था और दोनों ही तंज़ीमे हिन्दू थी.
लेकिन
जिस अंदाज़ में उस इंतेखाब को धर्म युद्ध का नाम दे कर दो हिन्दू पार्टियों के इंतेखाब
को दुश्मन बनाम मोदी क़रार दे दिया गया था तो अब जो जंग होगी वो हक़ीक़ी हिन्दू बनाम मुस्लिम
होगी. और उस जंग में जो भी सब्ज़ परचम के नीचे
आ गया उसको फलाह है. नहीं तो हर वो इंसान मारा
जाएगा जो शिद्दत पसंद और दहशतगर्दों के साथ होगा.
इस जंग में अगर मुनाफ़िक़ इस्लाम दुशमन अगर देशतगर्दों का साथ देंगे तो वो भी
मारे जायेगे और एक सेक्युलर हिन्दू बालनाथ मंदिर के जोगी अगर सब्ज़ परचम के ज़ेरे साये
आ गए तो उनको भी अमान होगी.
गज़वा
ऐ हिन्द होगा और ज़रूर होगा इस बात पे मुत्तेफ़ाक़ना राये तमाम आलिमों की एक है. बोहोत मुमकिन इस जंग का आगाज़ सितम्बर के पहल अशरे
में हो सकता है, किस सन में होगा उसपे अभी भी उलेमाओं और आलिमों की राये एक नहीं है
और उसमे इख़्तेलाफ़ शक और शुकूक मौजूद है.
जिस
अंदाज़ में ३०००० हज़ार मज़ीद दहशतगर्द कश्मीर में भेजे गए हैं वो अपनी मौत के पीछे पीछे
भागे हैं. उनको कश्मीर उनकी मौत बुला के ले
गई है. तमाम फौजी मारे जायेगे. ज़मीन इन लोगों के लिए तंग कर दी जायेगी. क्योंकि वो वतन की हिफाज़त का जज़्बा ले कर नहीं गए
थे बल्कि उन सब की ज़ेहनियत गलीज़, गन्दी और खून रेज़ी करने की थी. दुख्तराने मिल्लत को बरहना कर के उनके साथ ज़बरदस्त
ज़िनकारी करने की थी. हर अमल का दारो मदार नियत
पे होता है और इंसान को उसके अमाल की सज़ा और जज़ा ऊपर वाला उसकी नियत के ऊपर देता है
ना की अमल के ऊपर. दिखाने के लिए ये संघी दहशतगर्द
वतन की हिफाज़त का जज़्बा ले कर गए थे लेकिन इन लोगों की नियत गलीज़ थी सो इनकी बर्बादी
का फैसला हो गया. ये लोग गुजरात के जैसा क़त्ले
आम और खून रेज़ी, तबाही कश्मीर में मचाने वाले थे, लेकिन उसके पहले ही एहले ज़ौक़ एहले कश्फ़ और एहले तरीक़त फकीरों
को इस बात का इल्म हो गया और उन तमाम दहशतगर्दों के लिए कश्मीर एक शमशान बन गया.
जिस
तरह से अमेरिका वियतनाम, इराक़ से निकलने के लिए परेशान हो गया था, और अफ़ग़ानिस्तान से
किसी भी क़ीमत पे भागना चाहता है उससे भी बत्तरीन हालत भारतीय फौज की कश्मीर में होगी. इंशाअल्लाह ऐसा ही होगा.
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