Friday, 9 March 2018

आतंकी सोच का दलितों और दीगर समाज पे असर


हर रोज़ की तरह लेखक उस रोज़ भी अपने निजी वाहन से रेलवे स्टेशन तक गया और वहां से हर रोज़ के समय वाली बॉम्बे लोकल से ऑफिस के लिए रवाना हुआ. लेकिन हर रोज़ की तरह वो दिन लेखक के जीवन का आम दिन नहीं था बल्कि लेखक के मन में एक भूचाल ले कर आया और उसको सोचने पे मजबूर कर दिया के क्या हम २०१४ के बाद वकाई आज़ाद भारत में रह रहे है या गुलाम भारत में रह रहे है.  क्योके जो धीमा ज़हर इंसानी नस्ल में पेवस्त किया जा रहा है इतनी जल्दी उसका असर होगा लेखक ने कभी सोचा भी नहीं था. मासूम बच्चो में मुस्लिम, दलित और क्रिस्टी वर्ग के लिए जो घृणा और ज़हर भरा जा रहा था उसका असर अब सार्वजनिक जगहों पे भी दिखने लगा था.  उस गन्दी, गलीज़ और ओछी सोच का असर दलित, मुस्लिम, क्रिस्टी और सिख समाज पे सबसे पहले होगा ये लेखक को मालूम था लेकिन इतनी जल्दी होगा कभी सोचा भी ना था. और दलित समाज फिर से अपने आप को हीन समझने लगेगा ये जान कर लेखक को बड़ी हैरानी और पीड़ा हुई.

लेखक को प्रवास के दौरान एक दलित बच्ची से चर्चा का सौभाग्य प्राप्त हुआ.  बच्ची व्यस्क थी और पड़ी लिखी दिख रही थी. कुर्ला निकलने की बाद लोकल की ज़्यादातर सीट खाली हो गई थी  वैसे भी वो सावर्जनिक अवकाश का दिन था इसलिए लोकल में ज़्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी.  लेखक ने देखा के एक बच्ची लेखक के पास वाली सीट खाली होने के बावजूद भी खड़ी है.  लोकल में सीट खाली होने के बावजूद भी बच्ची लेखक के पास बैठने में संकोच कर रही थी. ऐसा नहीं था के लड़की बालिग थी और एक पराये मर्द के पास बैठने में संकोच कर रही थी बल्कि लेखक का आला पहनावा और कपड़ो से आती हुई खुशबू की मेहक की वजह से बच्ची शायद संकोच कर रही थी.  फिर लेखक ने बच्ची के मन की संकोच और झिझक को भांपते हुए थोड़ा और खसक कर जगह बनाई और खाली सीट पे उसको बैठने का आग्रह किया बच्ची बैठ गई.

लेखक ने खुद हो कर कुछ बात चीत की शूरूआत की और चर्चा के दौरान उसने बताया के हम बाबा साहब के अनुयायियों में से है. और आप ऊँची जाती के दिखे इसलिए थोड़ा झिझक रही थी.  लेखक बोला बाबा साहब सविधान विधाता और कहा पाखंडी ऊँची ज़ात वाले; इंसान अपने कपड़ो से नहीं बल्कि कर्मो और विचारो से बड़ा और महान बनता है.  लेखक ने सहज बातो बातो में बच्ची से पुछा किया करती हो उसने जवाब दिया मुंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. कर रही हूँ

आज बरहना पंडित अपने कुकर्मो और गलीज़ सोच की वजह से समूचे विश्व में रूसवा हो रहे है. जिनका एक दलित के स्पर्श भर से धर्म भ्रष्ट होता है लेकिन 'नियोग' प्रथा के तहत उसको भोग विलास की वस्तु समझते समय नहीं होता.  उच्च जाती के मंदिरो में दलित समाज को प्रवेश नहीं है लेकिन उन्ही मंदिरो में उस महिला को नियोग प्रथा करते समय प्रवेश है.  देवदासी प्रथा को पालते वक्त उनको प्रवेश है.  पंडित दलित महिला से अपनी निजी सेवा करवा सकता है फिर उसका धर्म भ्रष्ट नहीं होता.

लेखक ने बच्ची के मन की दुविधा और उसके अंदर आत्मविशास की कमी को जान लिया ये स्थिति किसी समय उस भारत में बनी रहती थी जो प्रमाण है दलितों के ऊपर हिन्दू राजाओ के ज़ुल्म और बर्बरता का जिसका इतिहास साक्षी है. दलित समाज निजी कूवे से पानी नहीं पी सकता था, निजी रास्तो पे चल नहीं सकता था यहाँ तक के अपने घर में किसी खुशी को ज़ाहिर तक करना उसके लिए पाप हो जाता था.  फिर मुगलो और मुस्लिम बादशाहो ने दलितों के साथ हो रहे अत्याचार और उनका उत्पीड़न बंद करवाया था. १९४७ से लेकर २०१४ के दौरान तो तकरीबन दलित उत्पीड़न ख़त्म हो गया था. फिर वही सोच अगर आज़ाद भारत में पनप रही है वो भी सिर्फ ४ सालो के आतंकी कब्ज़े के बाद तो ये बोहोत ही गंभीर समस्या होगी.  गुजरात में २०१७ में नवरात्री उत्सव देखने गए तीन दलितों पे उच्च जाती के हिन्दुओ ने हमला कर दिया और एक १९ साला दलित बच्चे को मौत के घाट उतार दिया.  उच्च जाती के हिन्दुओ का कहना था के तुम दलित हो और हमारे किसी भी उत्सव में नहीं आ सकते.  ये भी देखिये


लेखक ने बच्ची के अंदर आत्मविश्वास भरने की कोशिश की और उसको बताया अगर पंडितो में ज़रा भी सलाहियत होती तो वो सविधान के रचयता होते न की बाबा साहब.  आज बाबा साहब के लिखा हुए सविधान को पंडित ब्राह्मण सभी मानते है और उसके ऊपर अमल भी करते है तो इस हिसाब से पंडितो को दलित समाज का आभारी होना चाहिए के उनके पूर्वज की वजह से भारत सूचारू रूप से काम कर रहा है. इसीलिए ये आतंकवादी और पंडित सविधान को बदलने की बात करते है क्योके वो वही हालत फिर से लाना चाहते है जो हिन्दू क्रूर शासको के दौर में दलित समाज के साथ थे.

एक बात तो पक्की है कांग्रेस के ६० सालो के शासन में जो नहीं हुआ वो ४ सालो के आतंकी ज़हर ने कर दिखाया और उसका असर अभी से दलित, मुस्लिम, क्रिस्टी समाज के ऊपर दिखने लगा है. अगर सोच बदल रही और वही हिन्दू क्रूर शासको के दौर वाली सोच दलित समाज में आ रही है तो ये बोहोत गंभीर बात है और बम्बई जैसे महानगर में अगर एक दलित बच्ची अपने आप को हीन समझ रही है सिर्फ उसके मज़हब की वजह से तो ये चिंतन करने का विषय है.  जिस सोच को कांग्रेस और दीगर राजनैतिक पार्टिओ ने तकरीबन ख़त्म कर दिया था वो सोच समाज में फिर से आ रही है. मतलब भारत पीछे की तरफ जा रहा है ना के आगे की तरफ, और हिन्दू आतंकी सरगना और उसकी पार्टी 'सोच बदलो भारत बदलेगा' नारा इसी लिए दिया था. क्योके आतंकवादीओ के काबिज़ होने के बाद भारत आगे तो नहीं गया बल्कि जो कुछ था वो भी ख़त्म हो गया.

भारत से तो अच्छा पाक है जिसको आतंकी देश बोल के बदनाम किया जाता है और महिलाओ, अल्पसंख्यक और दलित समाज के लिए असुरक्षित बोला जाता था फिर आज उसी पाक ने एक हिन्दू दलित महिला को अपने सीनेट में जगह दी और भारत में एक भी मुस्लिम महिला संसद नहीं है. दूसरी बात जो पडोसी देश कभी तो भारत के विशवास के पात्र होते थे बढ़ते आतंकवाद के चलते वो भारत से खिसक कर पाक और चीन के खेमे में जा पहुंचे.  फिर भी अगर हिन्दू स्टेट के आतंकी लंगूरो की टीम के द्वारा ढिंढोरा पीटेंगे के पाक में आतंकवाद है और हमारे यहाँ नहीं तो गलत बात होगी. 

२०१४ के हिन्दू आतंकिओ के भारत में न सिर्फ दलित अपने आप को गुलाम समझने लगे है बल्कि हर वो इंसान जो हिन्दू आतंकवाद और उनकी हामी सरकार को नंगा करता है उसकी आवाज़ को दबा दिया जाता है और वो अपने आप को गुलाम समझने लगा है. गुलाम सोच, गुलाम मीडिया, गुलाम सेना, गुलाम पुलिस, गुलाम प्रशासन.  फिर अगर किसी Autonomous Journalist ने हिन्दू आतंकवाद उनके सैन्य प्रशिक्षण केंद्र, तथा उनकी हामी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई तो उसको मौत का मज़ा चखना पड़ता है जिस तरह गौरी लंकेश को हिन्दू आतंकवादीओ ने मौत की नींद सूला दिया.

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