Thursday, 15 March 2018

दारूल उलूम देवबंद का सरकारी भीक से इंकार


टाइम्स न्यूज नेटवर्क | Updated: Mar 15, 2018, 09:29AM IST
सहारनपुर
दारुल उलूम देवबंद ने 3000 मदरसों को सरकारी अनुदान लेने से किया मना. मदरसा मैनेजमेंट में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से बचने के लिए दारुल उलूम देवबंद ने मदरसों को सरकारी अनुदान लेने से मना कर दिया है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित मुस्लिम समुदाय के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद ने यह आदेश पूरे देश में उनसे संबद्ध 3,000 मदरसों को भेजा है।
 

दारुल उलूम का कहना है कि देश के मदरसों का अधिकांश खर्चा समुदाय के दान दिए गए रुपयों से चलता है। सरकारी अनुदान से सिर्फ शिक्षकों का वेतन दिया जाता है। अब समुदाय के दान से ही शिक्षकों का वेतन भी दिया जाएगा।

दूसरे समुदायों से रिश्ते बेहतर करने की पहल

सोमवार को राबता-ए- मदरिस की बैठक में 8 बड़े फैसले लिए गए। मदरसा + मैनेजमेंट से कहा गया है कि वे उनके संपत्ति के रेकॉर्ड्स अपडेट रखें। दारुल उलूम ने पत्र भेजकर कहा है कि मदरसों में आयोजित होने वाले समारोह और त्योहारों पर दूसरे धर्म और समुदाय के लोगों को बुलाएं और उनसे मैत्रीपूर्ण संबंध बनाएं। वर्किंग कमिटी में 51 सदस्यों को रखा गया है। इनमें से दारुल उलूम के 10 शुरा, 10 वरिष्ठ उस्ताद और 31 संबद्ध मदरसों के शिक्षकों को शामिल किया गया है।

दारुल उलूम के मोहतमीम अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा कि उन लोगों ने फैसला ले लिया है कि किसी भी तरह की सरकारी मदद मदरसों में स्वीकार नहीं की जाएगी। एक बार जब मदरसा को सरकारी अनुदान मिलने लगता है तो वह दूसरे सरकारी स्कूलों में लागू दिशा-निर्देशों को लागू करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

सरकारी हस्तक्षेप से बचने की कोशिश
उन्होंने कहा कि मदरसों का अपना अलग अनुशासन, नियम, यूनिफॉर्म और पाठ्यक्रम है और वे लोग इसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं। वे लोग नहीं चाहते हैं कि सरकार उनसे रोज शिक्षकों और छात्रों की उपस्थिति और अनुपस्थिति का रेकॉर्ड मांगे इसलिए 3000 मदरसों को साफ कहा गया है कि वे सरकारी अनुदान न लें।
 
दारुल उलूम वक्फ के मुफ्ती आरिफ कासिम ने कहा कि दारुल उलूम की पूरी दुनिया के मुसलमानों के बीच एक अलग पहचान है। दारुल उलूम जिन सिद्धांतों और प्रकृति पर चलता है उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप करना ठीक नहीं है। सरकारी अनुदान लेने पर सरकार धर्म से जुड़े मुद्दों पर भी हस्तक्षेप करने लगती है। 

हालते हाजरा पे पत्रकार की नुक़्तए नज़र
देवबंद का निर्णय कबीले तारीफ और सराहनीय है. उसकी दो वजह ये पत्रकार बताना चाहता है पहली जैसा के देवबंद वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया ऐसा करने से सरकारी अमल दखल खत्म होगा.  अब मदरसा अपने बोर्ड के हिसाब से निर्णय ले सकता है और किसी भी विषय पे वो निर्णय लेने के लिए स्वाधीन होगा. सरकारी तलवार उसके ऊपर नहीं लटकी रहेगी. बीजेपी ने अपना वर्चस्व ही तलवार के ज़ोर पे जनता को डरा के फैलाया है.  दूसरी बात जो भी आज़ाद सोच है और अपनी स्वाधीनता पे यकीन रखती है वो किसी के अधीन काम करना या उससे अनुदान लेना मुनासिब नहीं समझती. अगर अनुदान लिया मतलब अपनी सोच अपनी तहज़ीब सामने वाले के पास गिरवी रख दी. 

जब मोदी के पास कुछ सं २०१६ में आतंकवादी देश इजराइल के आतंकी नितिन याहू का पैगाम आया था उसके बाद मोदी सरकार ने नया शगूफा छोड़ा था के मस्जिद के इमामो की तन्खवा अब सरकार निर्धारित करेगी और मस्जिद के इमाम की नियुक्ति सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार होगा. तभी नव भारत के साथ पब्लिक डेबिट में इस पत्रकार ने सख्ती से सरकार की नियत पे सवाल उठाये थे के अब मस्जिदों, मदरसों, खानकाओ, वली अल्लाहो के मज़ारो पे सरकारी अनुदान के ज़रिये सरकार अपनी नीति लागू करना चाहती है. जैसा के इज़राइल में होता है के कोई भी इमाम सरकार के खिलाफ पब्लिक में बोल नहीं सकता और अगर बोला तो उसको तुरत ग्रिफ्तार किया जाता है.  फिर मस्जिदों पे सरकारी अमल दखल शुरू होगा जब चाहे  सरकार नमाज़ अदा करने को कहे और जब चाहे ख़त्म करने को.  

दूसरी बात एक आज़ाद पंछी खुली फ़िज़ा और हवाओ में उड़ने का काइल होता है वो किसी भी बॉर्डर या किसी भी देश के ज़मीन को नहीं मानता. वो तो अपनी सोच के हिसाब से कही भी आ जा सकता है. फिर सरकारी अनुदान लेना मतलब अपनी सोच अपनी तहज़ीब पे सरकारी अंकुश लगाना हुआ.  आज मीडिया के लंगूरो की टीम किस लिए बिकाऊ है वो सिर्फ सरकारी भीख ले कर ज़िंदा है. हिन्दुस्तान टाइम्स ने पद्मावती रिलीज़ होने से कुछ तीन दिन पहले एक खबर आम कर दी के इसरायली सपोला मौशो जनता को पद्मावती को रिलीज़ नहीं होने के लिए रैली कर के जागरूक करेगा.  ये पत्रकार अपने मत पे ठाम था के फिल्म रिलीज़ होगी जिसके ऊपर उसने बोहोत से ट्वीट किये और लेख भी लिखे और नतीजा हाज़िर है.

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