इराक के मासूल में सिख भाइयों के साथ वर्ष २०१४ में जो कुछ हुआ वो माफ़ी मांगने योग्य है ही नहीं और मात्र एक माफ़ी
से सारा मामला ख़त्म नहीं किया जा सकता है। यहां इस नरसंहार से दो चीजें हैं जो निकल के आई है, पहली जिन लोगो ने इराक़ के सामूहिक हत्याकांड में अपनी जान
गवाई अब वो वापस लौट नहीं सकते और परिवार के सदस्य कुछ समय बाद वो हादसा भी भूल जायेगे, दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण चीज जो कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। वह भारतीय विदेश मंत्रालय का रवैया और अज्ञानता है। भारतीय विदेश मंत्रालय को ये खबर बहुत पहले ही मालूम चल गई थी की ३९ भारतीय अब जीवित नहीं हैं, लेकिन फिर भी सुषमा स्वराज का कार्यालय परिवार के सदस्यों को झूठी उम्मीद देता रहा।
जब वर्ष २०१६ में मीडिया के गलियारों में
ये खबर सूर्खिओ में आई, के कर्नल वी.के. सिंह ३९ भारतीयों की तलाश में इराक जा रहे है, इस पत्रकार ने उसी समय अपने कई ट्वीट्स के जरिए सभी समाचारों का खंडन और आलोचना की थी, कि ३९ भारतीय अब जिन्दा है
ही नहीं वे पहले ही जीवन की लड़ाई हार चुके हैं और यह पैसे का दुरुपयोग है। इस पत्रकार ने एक टिप्पणी में एम.एन. सिंह का उदाहरण दिया था। सिंह तब मुंबई के पुलिस आयुक्त थे जो कथित अल-कायदा ऑपरेटिव मोहम्मद अफ्रोज के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए सेवानिवृत्ति से पहले इंग्लैंड गए थे। वास्तव में अफ्रोज पुलिस आयुक्त का प्यादा था और उन्हें तत्कालीन पुलिस आयुक्त के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया था ताकि सेवानिवृत्ति से पहले वे एम.एन. सिंह के लिए इंग्लैंड की यात्रा की व्यवस्था करें। इस पत्रकार ने नवभारत टाइम्स पर एक बहस में हर जानकारी दी।
एनसीपी-कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार
ने कर दाताओं की राशि पे पुलिस आयुक्त को इंग्लैंड में घूमने की अनुमति दी, इसी तरह
भाजपा ने वी.के. सिंह को सार्वजनिक निधि पर इराक घूमने की अनुमति दी। जब भाजपा को पता
था कि हमने ३९ भारतीयों को खो दिया है तो वी.के. सिंह को इराक भेजने का क्या कारण था।
जिस तरह से
भाजपा सरकार ने परिवार के सदस्यों से तथ्यों
को छिपाया और उन्हें झूठी उम्मीद के साथ अंधेरे में रखा, निश्चित रूप से कभी भी भूलने
योग्य नहीं है। और जो इस ढोंगी व्यवस्था और
सरकार के विरुद्ध पैदा करेगा नफरत और क्रोध। फिर वह दर्द और क्रोध भारतीय प्रणाली
के लिए गंभीर परिणामों के साथ लौट आएगा जो झूठ और नकली बाते फैला रहे है और और इस तथ्य
को छिपाता है
भाजपा गलत
अनुमानों के तहत लंबे समय तक इस तथ्य को छुपाने में असफल रही और आखिरकार सत्य जीता
और जनता के सामने आ गया, जो इस पत्रकार का एक संस्करण था कि सभी ३९ भारतीय मारे गए,
लेकिन विदेश कार्यालय ने इस पत्रकार को खंडन करने का प्रयास किया। अब उस परिवार के
अन्य सदस्यों के दर्द, पीड़ा और और क्रोध से सरकार को परेशानी होगी।
बीजेपी,
आतंकवादी और संघी झूठ फैलाने के आदि होते हैं इस तरह के वो सच्चाई की तरह दिखे, लेकिन
वे एक भी तथ्यात्मक घटनाओं को नहीं हरा सकते हैं, हालांकि हर बार कठोर प्रयास किए,
लेकिन हर बार विफल रहे। वे पूरी तरह से बकवास और झूठ पे आधारित ख्याली पुलाव और रेत
के महल बनाते है और हर बार वो रूसवा होते हैं। नाजीब के मामले में भी इस पत्रकार ने
पहले ही अपनी समापन रिपोर्ट को आज तक न्यूज़ के माध्यम से दे चूका है जो उनकी
मौत को प्रमाणित करती है. उसकी एक कॉपी फेस बुक प्रोफाइल पर सेव है कि वो अब इस दुनिया
में नहीं है, लेकिन अभी भी सरकार उसे अदालत में जीवित रख रही है। आखिरकार सरकार को
अपनी समापन रिपोर्ट सौंपनी होगी कि वह अब जीवित नहीं है और हम उन्हें बोहोत पहले ही
खो चुके है।
See the English version of the article
It’s
not easy to forget the massacre.
https://autonomousjournalist.wordpress.com/2018/03/22/its-not-easy-to-forget-the-massacre/ …
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