मू…. तुझ से जुदा तू मा….. से जुदा, मू….. हुई बा…. या ई…… या और कुछ
अज़ीज़ नाज़रीन,
बिल आख़िर वज़ीरे ग़द्दार तारीख़ के सफ़ों में अपने ही मराठी भाई का सर क़लम करने वाला अगला नाम दर्ज हो गया। इस शख़्स ने अपने मफ़ात को आगे रख कर फिल वक़्त अपना सर बचा लिया लेकिन इसने महाराष्ट्र मराठी अस्मिता और अवाम के साथ ग़द्दारी कर दी। आज भारत की जितनी तबाही और बर्बादी हो रही है उसके लिए माफ़ी तंज़ीम और चार गुज्जू ज़िम्मेदार हैं। कूल पांच। दो वतन के असासे बेच रहें हैं और दो ख़रीददार हैं। फिर इस नए वज़ीरे ग़द्दार को क्या लगता है इसका सर सही और सलामत रहेगा। अरे यह वोह ग़द्दार हैं जो अपने खुद के वतन को आज़ादी देने वाले महात्मा तक को नहीं बख़्श सके तो तेरी क्या औक़ात क्या बिसात है। १९४७ में पाकिस्तान बना, भारत की तक़सीम का ज़िम्मेदार किस को ठराया क़ाइदे आज़म मोहम्मद अली उर्फ़ जिन्ना साहब को और क़तल किस को किया अपने ही मुहाफ़िज़ को, अपनी ही ज़ात वाले को, अपने ही हम वतन को।
बंबई पर हमला हुआ नाम पाकिस्तान का आया और शहीद करकरे को किया गया। उस पर सितम देखिये, नागिन की बद्दुआ लगी तो किस को एक भारतीय फौजी (शहीद हेमंत करकरे साहब) जो दहशत के ख़िलाफ़ लड़े और जामे शहादत नोश किया उनको लगी। बक़ौल उस ज़हरीली काली नागिन के "मेरी बद्दुआ की वजह से हेमंत करकरे और उसका एहले ख़ाना बर्बाद हो गया" वाहा क्या फ़लसफ़ा है। इतना सब होने के बावजूद वोह मोदी की चहेती बनी हुई है और रकूने पार्लिअमान है।
वज़ीरे ग़द्दार को क्या लगता है वोह मेहफ़ूज़ हाथों में है, नहीं हरगिज़ नहीं, यह गुज्जू, मारवाड़ी, बनियाँ, सिंधी और माफ़ी तंज़ीम वोह गन्दी गलीज़ और बेईमान क़ौम है जो अरबों और पाकिस्तान जैसे अमीर मुल्कों में जा कर रोज़गार और तिजारत में ऊरूज पाने के लिए अपनी कमसिन बेटियों, बहेनो यहाँ तक नई नवेली लुगाइयों को तक उनके सामने पेश करने में झिझक और शर्म नहीं करते हैं। बल्कि मुस्लिम ताजिरों आला तालीमी आफ़ता मुस्लिम नौजवानों को अपना जवाई तस्लीम करने में भी इनको शर्म और हया नहीं आती है। आज जितने भी शिद्दत पसंद हिन्दू हैं माफ़ी पार्टी को मिला कर उनमे ज़्यादातर के तो जवाई मुस्लिम हैं और बात वोह हिंदुत्व की करतें हैं। ना तो ऐसे जवाइयों से तमाम रिश्ते नाते तोड़े और ना ही उनकी नस्लों को अपना तस्लीम करने से इंकार किया। फिर किस हिंदुत्व की बात करतें हैं। जो अपनों का (महात्मा, शईद करकरे) का नहीं हुआ वोह तेरा क्या होगा। माज़ी में जितने भी मुस्लिम बादशाह थे उनकी लुगाइयाँ हिन्दू थी और हमसे मुगलों की मोहब्बत की बात करतें हैं। राजपूत और हिन्दू राजा अपनी बेटियों को मुस्लिम क़ुव्वत वाले बादशाहों से बियाह देते थे ताके हिन्दू राजाओं की कूव्वत में इज़ाफ़ा हो जाए और वोह एक ऐसी रियासत के रिश्तेदार कहलाएं जो पॉवरफुल है उसमे उनकी भी इज़्ज़त अफ़ज़ाई हो जाती थी।
यह गुज्जू जब अपनी क़ौम के नहीं हुए तो एक ग़द्दार के क्या होंगे। इनको भारत या हिन्दुस्त्व से कुछ सरोकार नहीं है। बल्कि इनको इक़्तेदार और हाकिमियत से मतलब है। महाराष्ट्र की हुकूमत बेहतरीन चल रही थी एक अमन पसंद सूबे की हुकूमत को एक ग़द्दार की गर्दन पर तलवार रख कर उसको ईडी, ग़िरफ़्तारी या किसी और बात का ख़ौफ़ दिखा कर अपने ही भाई का क़तल करवा तो दिया है। लेकिन इसके दूरंदेश नताइज ख़ास बंदरगाह मुम्बाई और साहिल के लिए के लिए अच्छे नहीं होंगे। फिर इस बात की क्या ज़ामिन हैं की कल मौजूदा ग़द्दार से ज़्यादा फ़ायदा देने वाला कोई दूसरा ग़द्दार खड़ा हो गया तो शिंदे की गर्दन क़लम नहीं होगी। बेहतरीन मिसाल है कर्णाटक के यदिपुरप्पा। उनको वज़ीरे आला बनाया था लेकिन आज उनकी क्या हालत है। इन तमाम मुद्दों का ज़िक्र संघी खबरनामे आज तक पर आज से ३ ज़ोर क़ब्ल कर चूका हूँ।
अभी सर क़लम हुआ है मुस्तक़बिल में दाए बाए बाज़ू क़लम होंगे। फिर पैर। जो लोग बॉलिवुड की नचौड़ियों और जिस्म फ़रोश ओबाश ख़ातूनों की बात करतें हैं की उद्धव ने मेरा घर तोड़ा तो ढाई साल में उसकी हुकूमत तोड़ डाली। दूसरी ज़हरीली नागिन बोलती है लंगूर चालीसा नहीं पड़ने दिया तो चालीस दिन में उद्धव की हुकूमत की अर्थी निकल गयी। अरे नादानों यह फैसला मालिके मुतलक़ का नहीं है, और ना ही इसमें हमारी मर्ज़ी शामिल है। बल्कि यह एक साजिश, ग़द्दारी का नतीजा है। फिर एक रिक्शा वाले से गलीज़ खून से उम्मीद भी क्या की जा सकती थी। जिसके ख़ून में गंदगी भरी हो जिसका नुत्फा ही गन्दा हो वोह अपने घर की भाबियों पर गन्दी नज़रे रखता है। और यह वही गन्दा ख़ून है जो शोहर के अकाल मौत मरने या ज़न्खा होने पर भाभी के साथ उसकी मर्ज़ी के बग़ैर हमबिस्तर होना चाहता है।
इंसाफ़ वाले मालिक का तराज़ू कभी भी किसी ओबाश आवारा जिस्म फ़रोश मस्तूरातों की जिस्म की नुमाइश और हुकूमत की दीदा दिलेरी से मुत्तासिर नहीं होता है। वोह तो मज़लूम की बद्दुआ फ़ौरन सुनता है। मालिके मुतलक़ का फैसला महाराष्ट्र में नहीं हुआ बल्कि वोह तो हरयाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, सूबे शुमाल, आसाम, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश में हर रोज़ हिन्दू अक्सरियत की हादसात, बिजली गिरने और दिगर वुजूहात से आमवात के रूप में देखने को मिल रहा है।
इस सहाफ़ी का मानना है की औरत-ज़मीन ३ मुद्दों से जीते जा सकतें हैं, जबकी औरत और अवाम का दिल सिर्फ २ मुद्दों पर.
१. मोहब्बत: मोहब्बत में बड़ी ताक़त
होती है, और सच्ची मोहब्बत से एक अकेला फ़र्द बड़ी से बड़ी सल्तनत की अवाम या सख्त से सख्त मिज़ाज औरत का दिल जीत सकता है।
२. तलवार के ज़ोर पर: किसी सल्तनत, ज़मीन या ख़ातून को तलवार के ज़ोर पर हासिल किया जा सकता है। उसमे भी अवाम और ख़ातून के दिल को हुसने सुलूक कर के जीता जा सकता है। फिल वक़्त अवाम को अज़हद सदमा होगा और गुस्से से आग बबूला हो जाएगा। लेकिन जब हुकूमत का निज़ाम इंसाफ़ पर मब्नी होगा, सभी को रोज़गार, तिजारत के मौके फ़राहम होंगे हर जानिब सुकून और अमन का माहौल होगा। भाईचारा होगा अवाम के अंदर एक दुसरे के लिए तड़प और फ़िक्र होगी तो मुल्क का अवाम अपने आप हाकिम से मोहब्बत करने लगेगा। या वोह ख़ातून उस मर्द को मोहब्बत करने लगेगी जो कभी उसको तलवार पर हासिल किया था। सिर्फ उसका हुसने सुलूक और नरम रवैया देख कर।
३. साजिश और ग़द्दारी कर के हासिल की हुई हुकूमत: नाज़रीन इंसान की एक फितरत होती है जो ग़द्दार होता है वोह सभी के साथ ग़द्दारी करता है, जो साजिशी, कपटी, दरिंदा सिफ़त, नाइंसाफ, ज़ालिम होता है वोह ग़ैरों किया अपनों के साथ भी वैसा ही होता है। फिर साजिश या कपट से हासिल की हुई दौलत, औरत या ज़मीन कभी भी उस इंसान के साथ वफ़ा नहीं करतें हैं। क्योंकि ऐसे गलीज़ और ग़द्दार इंसान का रवैया सभी के साथ वैसा ही होता है जैसा सबसे पहले के साथ था। उसकी हज़ार हांड़ी में मुँह डालने की गन्दी आदत और फितरत अवाम, औरत पर अश्कार हो जाती है, फिर यहाँ से पलती है नफरत। ऐसी हाकिमियत कभी भी सरसब्ज़ और शादाब नहीं रह सकती जो कपट, साजिश और डर दिखा कर हासिल की हुई होगी। कियोंके वोह अवाम का दिल जीतने में नाकाम साबित होती है।
आज मजलिस के सरबराहा और हमारे क़ाइद जनाब असदुद्दीन ओवेसी भारत की मोहब्बत का दम भरते नहीं थकते। हर अवामी हल्क़े और अवामी हुजूम के दरमियान कहतें हैं हमें भारत से मोहब्बत है उसके ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत है। तो उनसे कहना चाहूंगा अब मोहब्बत का फ़साना सुनाना बंद कीजिये और अब जंग की बातें कीजिये। अगर हमारा हक़ नहीं दिया, हमारे साथ इंसाफ़ नहीं किया तो हमें अलहदा मुल्क दीजिये बिलकुल ऐसा बोलना होगा। कियोंके जिस भारत से आपको अभी तक और हमको १९९२ तक मोहब्बत थी वोह तो अब ख़ून का दरिया बन चूका है। नाइंसाफ़ी, फ़िर्क़ा परस्ती, ख़ाना जंगी की भेंट चढ़ चूका है। अब मज़ीद मोहब्बत दिखाना बेवक़ूफ़ी है। अब तो बरजस्ता पाकिस्तान की तोसीह या एक और मुस्लिम रियासत की बात कीजिये।
Zuber
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