अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियां,
हूकूमते हिन्द और ज़ाफ़रानी हुकूमत में मुस्लिम, क्रिस्टी, दलितों के लिए हुकूमत की सख़्ती बढ़ती जा रही है। हालात ऐसे हो गए हैं की अब तो नमाज़ पढ़ने पर भी गिरफ्तारी हो रही है। हालात ऐसे हो गए की जहाँ किसी भी मुस्लिम को नमाज़ पढ़ते हुए देखा फ़ौरन गिफ्तार किया जा रहा है। उसपर सितम देखिये मुनाफ़िक़े इस्लाम बाबरी मस्जिद के दुश्मन वाराणसी से ऊल जलूल बयान बाज़ी कर रहें हैं की नमाज़ पढ़ना एक साजिश है और ऐसे लोगों को फ़ौरन गिरफ्तार किया जाना चाहिए। ऐसे मुसलमान अब्दुल्लाह बिन ऊबाई, अबू लहब और ख़ोवारा जैसे मुनाफ़िक़ों की नस्लों से हैं। जो नबी के दौरे नबूवत में मौजूद थे नबवी शरीफ़ में नबी सल्लम के पीछे ५ वक़्त की नमाज़ अदा करते थे लेकिन उनका हर अमल सहाबा और एहले इस्लाम को इज़ा पहुंचाने जैसा होता था। हुकूमत की चाटुकारिता और गुलामी का पट्टा अपने गले में बांदे रखते थे।
महज़ नाम मुसलमान रखना या मस्जिदों में नमाज़ पढ़ लेना दाढ़ी बढ़ा लेना सुन्नत की बात करना ही सिर्फ मुसलमान होने के लिए काफी नहीं है। बल्कि तुम्हारे दिल में इस्लाम और मुसलमानों के लिए कितनी तड़प है वोह भी बोहोत मायने रखता है। तुम्हारे अंदर ज़ालिम, नाइंसाफ, क़ातिल की तलवार को ज़ुल्म करते वक़्त पकड़ने की क़ुव्वत है के नहीं है। अगर नहीं तो उसको ज़ुबान से ग़लत बोलने की क़ुव्वत है के नहीं और उतना भी नहीं तो उसको दिल से ग़लत समझने की हिम्मत है के नहीं है। यहाँ तो मुसलमानों को ही नमाज़ियों को ही कोसने लगे तो दिल में हुकूमत की नाइंसाफी और ज़ुल्म को बूरा तसव्वुर करने की भी लायक़ नहीं हो। तुम हुकूमत की बोली बोल रहे हो मतलब तुम्हारे अंदर तीसरे दर्जे की भी इस्लामिक जज़बा नहीं है तो तुम मुनाफ़िक़ ही हो।
एक बीजेपी का ग़ुलाम संघ का रकून जमात उलेमा हिन्द का दरिंदा दज्जाल एहमदिया सोएब क़ासमी शाने रिसालत में बेहुरमती करनी वाली तवाइफ़ की मुवाफ़ेक़त में बयानबाज़ी करता है। बोलता है असदुद्दीन ओवेसी और मेहमूद मदनी ने मुसलमानों को नूपुर शमा के खिलाफ भड़काया। मज़ीद बोलता है की नबी की शान में जो बेहुरमती की गई वोह नहीं करना चाहिए थी लेकिन जो हो गया उसके ऊपर एहतेजाज करना गिरफ्तारी की मांग करना और बड़ी ग़फ़लत है। हमारी तंज़ीम के रकून ऐसे एहतेजाजियों को देखते ही पिटाई कर रहें हैं और उनको फ़ौरन पुलिस के हवाले कर रहें हैं। ऐसी मुनाफ़िक़ों की बातों को लंगूर ब्रेकिंग न्यूज़ बता कर चलाते हैं, मुस्लिम मौलाना क़ासमी ने ऐसा बोला वैसा बोला हदीस बताई क़ुरआन का क़ौल समझाया। ऐसे मुनाफ़िक़ २ रूपये में मेसेज भेजने वाले ना तो मुसलमानों के रहनुमा है और ना ही इस्लाम की नुमाइंदगी करतें हैं। हाँ यह ज़ाफ़रानी हुकुम के ताबेदार हैं और जैसा ज़ाफ़रानी हेड कूवाटर नागपुर से इनके लिए हुकुम आता है यह वैसा ही बयान दे देतें हैं। २ रूपये के मेसेज में बिकने वाले यह लोग ग़द्दार है मौलाना नहीं।
साधू ने सूबे शुमाल में अवामी हल्क़े या आमदो रफ़्त पर हर क़िस्म के मजहबी रिवायत पर पाबन्दी लगा दी। फिर क्या वजह है कावड़ियों पर पाबन्दी नहीं लगी, सिर्फ नमाज़ पर ही पाबन्दी लगाई गई। एक नमाज़ पढ़ते हुए मुसलमान को गिरफ्तार किया जाता है वहीँ हज़ारों लाखो की तादात में कावड़िये हुजूम बना कर निकलते हैं रोड जाम करतें हैं आवामी और हूकूमती जायदात की तोड़ फोड़ करतें हैं आतिशे नार करतें हैं तब भी उनकी गिरफ्तारी नहीं होती ब्लकि इन्तेज़ामियाँ की जानिब से आसमान से फूल बरसाए जातें हैं। वोह फूलों के पैसा किधर से आया हेलीकाप्टर का खर्चा कहाँ से आया। क्या यह सूबे शुमाल के मुस्लिम टेक्स पेयर के पैसे की बर्बादी नहीं है। यहाँ तक के तमाम तालीमी इदारे कावड़ियों को देखते हुए १५ से २० दिनों के लिए बंद कर दिए गए।
अब तो हर जगह नमाज़ पढ़ी जाएगी। आज नहीं तो कल। में २१ मार्च २०२२ से १ अप्रैल २०२२ तक उत्तर प्रदेश में था। सफर में पुष्पक एक्सप्रेस में बिंदास्त नमाज़ पढ़ी। इटारसी से एक औरत मेरी ही बोगी में चढ़ी थी मेरे को नमाज़ पढता हुआ देख कर आग बबूला हो गई। लगी मुगलों औरग़ज़ेब को गाली गलोच करने। में तो बिंदास्त नमाज़ पढता रहा। उसको उसके लग्गे भग्गे भगवाधारी ठाकुर दीदी ठाकुर दीदी कह कर बुला रहे थे। अपने एक अक़ीदत मंद से बोली इसका वीडियो बनाओ। फिर होशंगादाब आते आते चिकन करी खा कर सो गया। जब गाडी भोपाल के हबीबगंज पहुंची तो चीख पुकार हो रही थी तब अंदाज़ा हुआ वोह कोई नेता वेता होगी। तो क्या उसने ट्रैन से या भोपाल पहुंच कर शिकायत दर्ज नहीं की होगी। लेकिन मेरे साथ क्या हुआ कुछ नहीं।
इतना ही नहीं लखनऊ पहुंच कर हर अवामी हलके में नमाज़ अदा की थी। यहाँ तक की वापसी में चार बाग़ रेलवे स्टेशन पर ईशा की नमाज़ अदा की थी। तमाम पुलिस वाले ३ सितारा २ सितारा टोपी वाले हेट वाले सी आर पी ऑफ के जवान घूम रहे थे लेकिन कुछ भी नहीं हुआ और ना ही किसी ने टोंका। या तो वोह लोग मुझे देख नहीं पाए या देख कर अनदेखा कर दिया। तो बताने का मक़सद यही है आप किसी को नमाज़ पढ़ने से नहीं रोक सकते। अवामी हल्क़े में नमाज़ पढ़ी तो वोह जगह उस नमाज़ी की थोड़ी हो जाती है। नमाज़ के लिए जगह का पाक होना शर्त है, दूसरी कोई शर्त नहीं है।
आज के दौर में नहीं बल्कि नबी ये मुक्कर्रम के दौर से बल्कि हर दौर से ज़र ख़रीद मुसलमान ही इस्लाम के दुश्मन रहें हैं। आज उन मुजाहिदों की शान में बद कलामी वाले अलफ़ाज़ के मज़मून सांझा किये जा रहें हैं, जो कश्मीर में अपनी फलाह और तहज़ीब को मेहफ़ूज़ करने की जद्दो जेहद में मुजरिम क़रार कर दिए गए। जुर्म साबित नहीं हुआ और हूकूमते हिन्द के नावाक़िफ़ इलज़ाम की वजह से जेल में हैं। आज कल नमाज़ पढ़ने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है। फिर इस्लाम और मुसलमानों से बुग्ज़ और कीना रखे वाले मुनाफ़िक़ उनको साजिशी बोल रहें हैं नमाज़ बंद करने की वकालत कर रहें हैं। कल तुमको तुम्हारा मुस्लिम नाम और शिनाख़्त ज़ाहिर करने पर गिरफ्तार किया जाएगा। तुम दुसरे दर्जे के अवाम हो जाओगे ना कोई हुक़ूक़ ना कोई एहमियत। नाग फन उठाये उससे पहले ही उसके फन को कुचल देना चाहिए इससे क़ब्ल की वोह तुमको डस ले। इनकी तरफदारी करो हिमायत करो नहीं तो कल तुम्हारा नंबर होगा। और अगर वोह सब नहीं कर सकते इतनी ताक़त क़ुव्वत नहीं है तुम ज़नखे हो तो ऐसे ना ज़ेबा अलफ़ाज़ वाले मज़मून तो सांझा मत करो।
साफ़ बात है मेरे नज़दीक सबसे पहले मेरा मज़हब है मज़हबे इस्लाम फिर नबी की अज़मत क़ुरान की मोहब्बत उसके बाद मेरे एहले खाना की मोहब्बत फिर मुस्लिमानों की मोहब्बत। वतन की मोहब्बत का मेरे नज़दीक कोई फलसफा नहीं है और ना ही में हूबूल वतनी की कोई भी हदीस या क़ुरान का क़ौल देखता हूँ। फिर अगर हूबूल वतनी का दर्स इस्लाम के अव्वलीन फ़राइज़ होता तो जितने भी पैग़म्बरे इस्लाम आये हज़रत इब्राहीम से ले कर मूसा अलैहे सलाम ईसा मसीह पैगम्बर सल्लम सभी ने अपने ही वतन में कुफ्र, ज़ुल्म और नइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी। बल्कि हज़रते मूसा ने तो फ़िरोंन के यहाँ ही परवरिश पाई शीर ख्वारी से जवानी तक फ़िरोन के यहाँ ही रहे। लेकिन इस्लाम और वहदहू ला शरीक पर उसके ख़िलाफ़ एलाने जंग किया और फतहयाब हुए।
Zuber
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