अज़ीज़ नाज़रीन,
आज कल मुल्के हिन्द में हालात हू बा हू म्यांमार और श्री लंका जैसे होते जा रहें हैं और मुस्तक़बिल में हिन्द का भी हाल श्री लंका और म्यांमार जैसा ही होने जैसे बेशबन्दी हो रही है। म्यांमार और श्री लंका की तबाही से क़ब्ल मुसलमानों और इस्लाम के ख़िलाफ़ हिन्दू और बोध दहशत हद से ज़्यादा बढ़ गई थी। हिन्दुस्तान के जैसे श्री लंका और म्यांमार में भी हिन्दू और बोध दहशतगर्दों को हर उस चीज़ से ईज़ा और तकलीफ होने लगी थी जिसको मुसलमान अपनी इस्लामिक रिवायत को बरक़रार करने के लिए करते थे। हलाल गोश्त बेन, हिजाब बेन, अज़ान से तकलीफ, मदरसा बेन, गाये बेल और उनकी नस्ल का जबीहा बेन, बक़रईद पर खून किसी भी ज़मीन या कपडे पर लगने से बोध और हिन्दू मज़हबी जज़बात को ठेस होने लगती थी, पार्लियामेंट में मुस्लिम नुमाइंदगी के ऊपर सवाल। आज दोनों ही दहशतगर्द मुमालिकों की क्या हालत है। अगला नंबर भारत का ही है।
खाना जंगी की अज़ीयत झेलते हुए इन दोनों मुमालिकों में वहां के शिद्दत पसंद सहाफिओं को देखते ही काट डाला गया जो अवाम के दिलों दिमाग में ज़हर की काश्त करते थे।
मोदी की ख़ासम ख़ास सुई की जेल में सड़ रही है और श्री लंका में जो इस्लाम को ख़तम करने की गलीज़ और गन्दी नियत रखते थे वही ख़तम हो गए जो बचे वोह अपनी जान बचा कर भाग गए। लेकिन इन दोनों मुमालिकों में मुस्लिम आज भी मौजूद है इस्लाम आज भी ज़िंदा है। दोनों ही मुल्कों में फौज ने चुन चुन के ऐसे हिन्दू और बोध दहशतगर्दों को हलाक किया है जो शिद्दत पसंद थे और मुल्क को तबाह और बर्बाद करने में सरे फहरिस्त थे। ऐसा ही हाल भारत में होगा।
अकेले म्यांमार में १ फ़रवरी २०२१ में फौज की तख़्ता पलट के बाद कमो बेश १० से १२ हज़ार ख़ातून सुई की के हमदर्द और मुवाफ़िक़ बोध दहशतगर्दों को क़तल किया है। जैसा इन बोध दहशतगर्दों ने मासूम रोहिंगिया के साथ किया था वैसा का वैसा मालिके कायनात ने इनको लौटा दिया। जून्टा की फौज ने एक बड़े से गड्ढे में हज़ारों बोध फ़क़ीरों और सुई की के हमदर्दों को लिटा के गोलिओं से भून डाला और ऊपर से पेट्रोल डाल के आतिशे नार कर दिया। फिर जीप में भागते हुए बोध सुई की के हमदर्दों को ज़िंदा आतिशे नार कर दिया गया। अब श्री लंका में वही सब हो रहा है। जितने भी शिद्दत पसंद बोध और हिन्दू थे मारे जा रहें हैं। आगे भारत में वही सब बीजेपी और शिद्दत पसंद काफ़िरों के साथ होगा।
शिद्दत
पसंद काफ़िरों, संघियों, बीजेपी वालों नबी की शान में बेहुरमती करो मेरे रब की शान निराली
है। अब तुम्हारी पकड़ शुरू हो गई है। जैसा हर बार बोलता था जब पकड़ होगी एक एक काफिर शिद्दतपसन्द
एक एक संघी एक एक बीजेपी वाले को काटा जाएगा।
अभी तो क्या क्या खेल होंगे भारत में कोई नहीं जानता है। रोड पर एक एक काफिर शिद्दतपसन्द काटा जाएगा। इनके खून से पूरा हिन्दुस्तान लाल हो जाएगा। इन शिद्दतपसंदों, संघियों और बीजेपी वालों की नस्ल
का कोई बच्चा बचेगा और ना ही कोई नस्ल बढ़ाने वाला बचेगा।
आखिर
में हिंदुस्तान में भी ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों को काटा जाएगा क्योंकि इन्ही लंगूर
और लँगूरनियों का ज़हर पी पी कर अवाम फ़िरक़ापरस्त हुआ था और भारत बर्बाद। अगर सही वक़्त पर बजाये मुख़ालिफ़ों से सवाल और हिन्दू
मुस्लिम करने के हिटलर मोदी की ग़फ़लत और गलत नीती पर उसको हाशिये पर लिया जाता तो हालात
अलहदा होते।
आज मदरसों पर झूट बांधे जातें हैं, मदरसे दहशत की तालीम देतें हैं। मस्जिदों की अज़ान पर एतेराज़ किया जाता है मस्जिदों पर तोहमत लगाई जाती है की नमाज़ के बाद मुस्लिमों को हिन्दू क़त्ले आम का दर्स दिया जाता है।
यह
वही मदरसे हैं जिनके ऊपर तोहमत लगाई जाती है की वहां पर दहशत का दर्स दिया जाता है। और मस्जिदों की कारगरदेगी हर तूफ़ान बारिश में अवामुनास
की मदद करने के जज़्बे को अवाम देख ही चुका है।
चाहे वोह केरला की बाढ़ हो या मुम्बाई में आई तूफानी बारिश के सबब मुंबई की लाइफ
लाइन लोकल के बंद होने पर मुंबईकरों को मस्जिदों ने आसरा दिया था। उनके शाम के खाने का एहतेमाम सुबह बिस्किट और पानी
की बॉटल्स दे कर उनको लोकल शुरू होने पर रवाना करने का जज़्बा। फिर जिस अज़ान से सोनू निगम जैसे शिद्दत पसंदों को
ईज़ा होती है वही अज़ान ने मुम्बाई में आये हुए तूफ़ान का रुख मोड़ दिया था। जिसके ऊपर अगस्त २०१७ में अब
दिखेगा मुंबई में अज़ान का असर: एक मज़मून लिख चूका हुँ। जब फडणवीस महाराष्ट्र
के वज़ीरे आला थे मौसम इदारे ने पेशनगोई की थी की मुबाई में अगले २४ से ४८ घंटों तक
तूफानी बारिश होगी। सियाह अबर ऐसे की तमाम
मुम्बईकार ख़ौफ़ज़दा हो कर अपने अपने दफ्तरों से क़ब्ल अज़ वक़्त अपने घरों के लिए रवाना
हो गए थे।
फिर
बाद नमाज़े असर रज़ा एकेडेमी के सरबराह मौलाना सईद नूरी भीगती बारिश में अपने मशायक़ीनों
और मूरीदीनों के हमराह मुहम्मद अली रोड पर बाबा मक़दूम शाह माहिमी फ्लाईओवर के नीचे गए और बा आवाज़े बुलंद अज़ान दी। अज़ान का देना था की थोड़ी ही देर में सियाह अबर क़ाफूर
हो गए और मतला साफ़ हो गया यहाँ तक की सूरज निकल आया। दुसरे रोज़ तेज़ धुप खिली हुई थी। यह बात इस सहाफी ने खुद महसूस की और अपने दस्ते
क़लम से मज़मून में तहरीर की है।
आज की तारिख में ज़्यादातर सियासतदान हमारे क़ाइद जनाब असदुद्दीन ओवेसी को मिला कर क़ानून, दस्तूर और हुसने सुलूक की बातें करतें हैं। में ऐसे तमाम सियासतदानों से कहना चाहता हुँ क्या उनको यक़ीन हैं की भारत में अभी भी क़ानून की बालादस्ती बची है और हूकूमती नुमाइंदों, शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी दहशत और बीजेपी वालों का कोई भी अमल क़ानून और दस्तूर के हिसाब से है। हुसने सुलूक, वतन से मोहब्बत गंगा जमुनी तहज़ीब यह सब बातें ऐसे मुल्क में अच्छी लगाती है जहाँ हुकूमत इन्साफ पसंद हो। क़ानून अपना काम बग़ैर अक्सरियत अवाम के तस्कीन के करे। अक्सरियत अवाम जुर्म करे हत्ता के क़तल और ज़िना जैसे संगीन तो भी उसको बैल है वही अकलियतों में से किसी सहाफी ने २०१८ में एक फिल्म के सीन पर जेल। दूसरी तरफ अक्सरियत कुछ भी अनाप शनाप बोले कोई क़ैद नहीं वही दूसरी जानिब एक गोश्त वाले गरीब कम इल्म एक रद्दी के ऐसे कागज़ में गोश्त दे जिसमे किसी मूर्ती की तस्वीर है तो उसको जेल। फिर अगर जेल ही करना है तो उस अखबार के एडिटर पर होना चाहिए जिसने वोह तस्वीर अपने अखबार में शाया की थी। फिर अगर जेल ही होना थी तो उस फिल्म प्रोडूसर और डिरेक्टटर पर होना चाहिए जिसने ऐसी फिल्म बनाई जिससे हिन्दू जज़बात टूट गए।
Zuber
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