नज़रिने गिरामी,
नबी की बेहुरमती करने वालों के ऊपर मौत के फ़रिश्ते हज़रते इज़राईल का क़ेहर ऐसा टूट रहा है, जैसे की दहशत की पनाह गाहा हिन्दुस्तान में पहाड़ टूट कर गिर रहें हैं। रब्बे कायनात की एलाने जंग का आग़ाज़ हो चुका है। जितना काफ़िर शिद्दत पसंदों ने मुस्लिम और बे गुनाह इंसानियत (क्रिस्टी, सिख, दलित) अवाम के ऊपर दहशत मचाई थी उतनी ही उनकी जान तकलीफ और अज़ीयत से निकलेगी।
नाज़रीन
नबी ऐ मुक्कर्रम की बेहुरमती ख़ास उस नाज़ेबा ख़ातून नूपुर शर्मा ने जब बदकलामी की थी
उसके बाद तो सर तन से जुदा करने वालों की एक होड़ सी लग गई। हर कोई बोल रहा था की में इस मुक्क़द्दस और कारे ख़ैर
में हम भी हमारी इमदाद देना चाहतें हैं। लेकिन
अल्लाह को अपना मक़सद मुकम्मल करने के लिए किस की मदद दरकार होती है यह तो वोह ख़ुद ही
फ़ैसला करता है। उसके फ़रिश्ते उसकी मर्ज़ी के
काम को सर अंजाम देंगें या वोह किसी इंसान में वोह क़ुव्वत और ताक़त फ़रहाम कर देगा की
उसकी मर्ज़ी के हिसाब से काम हो जाएँ। हालांके
अल्लाह को अपनी मर्ज़ी के हिसाब से काम करवाने में किसी की हाजत नहीं। अल्लाह अज़्ज़ा वजल के हिसाब से काम होने में एक सेकंड
नहीं लगेगा। अगर उसने कहा "कून" होजा "फयाकून" और फ़ौरन हो जाएगा। लेकिन यह दुनिया आलमे असबाब है। फिर अगर एक सेकंड में सब कुछ तब्दील हो गया तो कुर्फ,
ज़ालिम, नाइंसाफ, फ़िर्क़ापरस्त, दहशतगर्द को अपनी ग़लती ग़फ़लत का एहसास कैसे होगा।
नाज़रीन
जिस हिसाब से नबी ऐ मुक्कर्रम की हुरमत को अदना किया था उसके बाद तमाम शुमाल हरयाणा,
उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजिस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक में सर क़लम
होते ही चले जा रहें हैं। ताहम आसमानी आफ़ात
और हादसों से शिद्दत पसंद दो चार हैं।
किसी
कव्वाल के अशार याद आ गए, "भर गए लेने वालों के दामन मगर देने वाला कोई ना आया
नज़र"।ऐसे ही हर गुस्ताख़ के सर तन से
जुदा तो हो रहे हैं, लेकिन जुदा करने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा है।
यहाँ
तक की अब तो जिसने उस गटर की पैदाइश नूपुर शर्मा के मुवाफ़ेक़त में बयान दे दिए उसका
भी सर तन से जुदा हो रहा है। नाज़रीन एक लम्बी
फेहरिस्त है और मेरे मज़मूनों का मुताला करने वाले आप तमाम हज़रात के इल्म में इज़ाफ़े
के लिए इतना बता देना चाहता हूँ की हर गुस्ताख़ का नंबर लगेगा। ख़्वाहा वोह शिद्दत पसंद काफिर हो या दज्जाल एहमदिया,
क़ादयानी। नूपुर शर्मा, नवीन जिंदाल जैसे कीड़ों
को एक सेकंड में कुचला जा सकता है, सर तन से जुदा किया जा सकता है। लेकिन उनको दिखाना मक़सद है अल्लाह की जिस ताक़त और
क़ुव्वत के ऊपर इन्होने मज़ाक बनाया था और नबी की बेहुरमती की थी तो अब उनके आँखों के
सामने ऐसे वाक़ेयात होंगे की उनकी रूह कांप जाएगी।
कोई दिखाई नहीं देगा और सर क़लम, हाथ क़लम, पैर क़लम।
ऐसे तमाम गुस्ताख़ अनासिर अल्लाह के फरिश्तों के हिसार में हैं। और वोह हर वक़्त उनको देख रहें हैं, यहाँ तक की बरहना, पोशीदा, छुप कर किये हुए काम ज़ाहिरी काम हर चीज़ उनकी अब बेपर्दा हो चुकी है। कहीं भी किसी भी गली नुक्कड़ पर गुस्ताख़ का सर तन से जुदा हो जाएगा। योगी बोलता था की मुसलमान मर्द तो रज़ाई में सो रहें हैं और अपने घरों की औरतों को हर गली नुक्कड़ चौराहों पर बिठा दिया है। योगी जी आपको भी रज़ाई में सोता हुआ मेरे रब के फ़रिश्ते देख सकतें हैं। क्या पता अगला सर आपका हो और जुदा करने वाला कोई फ़रिश्ता। संभल के रहिये।
हर काफ़िर शिद्दत, दहशत और ज़ाफ़रानी बात का जवाब दिया जाएगा एक लम्बी बोहोत लम्बी फेहरिस्त है। हिसाब किताब पूरा तभी होगा जब बाक़िया कुछ भी नहीं रहेगा। बैलेंस ज़ीरो। ० बटे सन्नाटा।
नाज़रीन हाल ही के कुछ सालों में हिन्दुस्तान में पत्थरों की बारिश होने का नये सिलसिले का आग़ाज़ हुआ है। जहाँ तहाँ पहाड़ टूट कर गिर रहें हैं। दरसल आज के भारत की बर्बादी और तबाही के ज़िम्मेदार लंगूर ख़ास हर्राफ़ लँगूरनियों की झूठी फरेबी ख़बरें हैं। जिसकी वजह से कश्मीर में हर मासूम को पत्थर बाज़ बोल कर बदनाम किया जाता था फिर वही फलसफा मुसलमानों के लिए इख़्तेयार किया गया। अब इन लंगूर लँगूरनियों का झूट मालिके कायनात ने उनके ही मुल्क पर सच्चा कर दिखाया। मुझे मेरी एक नज़म एक पत्थर इधर भी याद आ गई जब लंगूर और लँगूरनियाँ कश्मीर में ख़ूब बवाल मचाते थे। यहाँ भी पत्थर चले वहां भी पत्थर चले।
सभी गुस्ताख़ों का नाम शामिल है इस फेहरिस्त की किताब में, यहाँ सिर्फ अकेले तुम ही गुस्ताख़ थोड़ी हैं। क्या बोलते थे संघी आसमानी किताब। अब आसमान से पत्थर बरस रहें हैं। बिजली का क़ेहर टूट रहा है। ७२ हूरें, है है है। उन सब बकवास करने वालों के सर तन से जुदा होंगे। आज नहीं तो कल।
जितना भौंकोगे, उतना भोगोगे। उखाड़ लो जो उखाड़ना है। सर तन से जुदा तो होगा अगला नंबर तेरा।
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