Thursday, 7 July 2022

ज़ाफ़रानी दहशत में अमन पसंद या ग़ुलामों की ज़रुरत नहीं।

अज़ीज़ नाज़रीन,

बिल आख़िर ग़ुलाम सोच को मोदी इन्तेज़ामियाँ की ज़ाफ़रानी दहशत ने झटके दे दे कर बहार निकाल फेका।  जी नाज़रीन बात यहाँ पर उस गंदे नुत्फे की हो रही है जो मोदी, ज़ाफ़रानी दशहत, बीजेपी के आगे मुस्लिम अवाम (अमन पसंद) को कुछ तस्लीम ही नहीं करता था।  इस गंदे पानी मुख्तार अब्बास नक़वी को हर मुद्दे में मुसलमानों का मनफ़ी किरदार ही दिखता था और मोदी, हिन्दू, संघ, बीजेपी, योगी सभी आला किरदार हैं उनसे तो कोई गलती हो ही नहीं सकती तमाम तर गलतियां तो मुस्लिम अवाम की जानिब से हो रही हैं। 

मुख़्तार अब्बास नक़वी जैसे गंदे नुत्फे और ग़ुलाम सोच की ख़ारिज देख कर एक कहावत याद गयी।  "धोबी का गधा ना घर का ना घाट का" और यह बात आज से नहीं बल्कि नक़वी, शाहनवाज़, मोहसिन, ज़फर जैसे गुलामों के बारे में बोलता आ रहा था।  जब हक़ और बातिल; इन्साफ और नाइंसाफ के दरमियान जंग का आग़ाज़ होगा सबसे क़ब्ल इन जैसे मुनाफ़िक़ हलाक किये जायेगें।  फिर इनको ना तो ज़ाफ़रानी तंज़ीम अपना तस्लीम करेगी और ना ही मुस्लिम अवाम अपना कहेगें। 

नक़वी मोदी अक़ीदत मंदी में इतना मशग़ूल हो गया था की इसको यह होश ही नहीं रहा की उसकी गुफ़्तारे अलफ़ाज़ से मोमिनीन की दिल आज़ारी होगी।  बड़े जानवर गाये, बैल और उसकी नस्ल के ज़ाबीहे पर एक सहाफी इजलास में आली जनाब असदुद्दीन के रू बरू बोलता है की "अगर मुसलमान बड़े का गोश्त खाने को मरे जा रहें हैं तो वोह सऊदी चले जाएँ यह हिन्दुस्तान में नहीं मिलेगा"।   मज़ीद हर मुद्दे पर इसको अक्सरियत अवाम के जज़्बात का एहसास और ख्याल होता था लेकिन मोमिनीन के जज़्बात इसके नज़दीक सिफर बटे सन्नाटा होते थे।  

एक मुनाफ़िक़ मोहसिन की पहले ही हकाल पट्टी हो चुकी है अब इस ज़हरीले कीड़े नक़वी की हुई।  मज़ीद शाहनवाज़ और ज़फर बाक़ी हैं।  अब तमाम मोमिनीन से गुज़ारिश है, इन जैसी काली भेड़ों को हरगिज़ हरगिज़ माफ़ ना किया जाए।  जब क़त्ले आम हो तो सबसे क़ब्ल इनको घरों से निकाल कर रोड पर ही ज़िबह कर दिया जाए।  ताके नस्लों में इनकी गंदगी पेवस्त ना होने पाए।  और जब हिन्दुस्तान की तारीख लिखी जाए तो अवाम इस बात से पुर एतेमाद रहे की अब हमारे दरमियान कोई गद्दार नाथूराम की नस्ल का कोई नहीं है। 

नूपुर शर्मा के क़त्ल का एलाने आम होने और मुजाहिदों ने कन्नैया का सर क़लम करने के बाद एक और मुनाफ़िक़ आरिफ बोल बैठा की मदरसे आतंकवाद की जड़ होतें हैं वहां से आतंकवाद की तालीम दी जाती है।  उस ख़बीस को ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के ख़बरनामे आज तक पर ही अच्छे से धो डाला था। 

उसको फिर से जवाब देना चाहता हूँ।  जो झूट फैलाते हो उसका ख़मयाज़ा खुद तुमको और तुम्हारे मुल्क को भारी पडेगा।  बयान वीर की तरह तुम तो भोंक के चले जाओगे लेकिन तुम्हारी आती नस्ले उस डंस को भोगेगी।  अभी तक तो मदरसों में ऐसा कुछ नहीं हुआ लेकिन तुम लोगों की बढ़ बोल के बाद अब में ऐसे मदरसे क़ायम करूँगा जो जिहाद पर तालीम और दर्स देंगें।  दरअसल जिहाद क्या है और किस क़ाफिर, मुनाफ़िक़ या ग़द्दार के खिलाफ जिहाद करने का हुकुम है और उसका सर धड़ से जुदा करने के हुकुम है उसकी पूरी तालीम लूंगा।  उखाड़ लो जो उखाड़ना है।  

ऐसे ही बयान वीर बन कर कितने ही ज़ाफ़रानी तंज़ीम के वज़ीर, मेंबर पार्लिअमान, मेंबर असेंबली, मेंबर बल्दिया और उनके एहले ख़ाना जहन्नुम रसीद हो गए।  ऐसा ही बयान वीर भारतीय फौज का सिपह सालार और सलाहकार बिपिन रावत था, जिन्दा ही जल गया।   जो मुस्लिम और कश्मीरी अवाम से सख्त बुग्ज़ और कीना रखता था।  वोह कश्मीरी मासूमों अंडर १६ को गैस चेम्बर में भरने की बात करता था।  कियोंके वोह सब संग बाज़ हैं।  महज़ दो साल में ही ज़िंदा जल गया।  साथ अपनी लुगाई और १४ फौज के आराकीनों को ले गया।

कूल मिला कर इस बात को मन्ज़रे आम करने में इस सहाफ़ी को ज़र्रा बराबर शक और शुबह नहीं है जिस तरह लंगूर और लँगूरनियों ने २०१९ में जंग का आग़ाज़ किया था और मोदी इन्तेज़ामियाँ ने मुस्लिम अवाम के खिलाफ एलाने जंग कर दिया है।  हम भी हमारे तरबियती इदारों में थोड़ी मज़ीद तरबियत और मश्क के बाद मोदी को फिर एक ललकार देंगें।  फिर होगी हतमी जंग।  और होगा हिंदुस्तान के मुस्तक़बिल का फैसला। 

Zuber

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