अज़ीज़ नाज़रीन,
एक चाय वाले ने रिक्शा वाले को ग़द्दार तंज़ीम की साजिश, गिरफ़्तारी का डर दिखा कर अपने जैसा ग़द्दार बना दिया। जब रिक्शा वाला वज़ीरे ग़द्दार चाय वाले के हमराह चला तो उसके अंदर भी हू बहू वैसी ही सिफ़त आने लगी जैसी की चाय वाले की हैं। और वोह भी वैसे ही चाले कर रहा है जैसे की किसी ज़माने में उस चाय वाले ने किये थे। हर मुद्दे पर अश्क़बार होना, अवाम के रू बरू अपने आप को सबसे बेहतर कहलाने की होड़ में रहना, कैमरे, बच्चों और मर्दों में दिलचस्पी रखने वाला। रिक्शा वाला वज़ीरे ग़द्दार अपनी हलफबरदारी के बाद चाय वाले की तरह अश्क़बार हुआ उसको भी कुछ याद आ गया। यह क्या महज़ इत्तिफ़ाक़ है या वज़ीरे ग़द्दार की सोची समझी हिकमते अमली है।
क्योंकि जिस हिसाब से वज़ीरे ग़द्दार ने अपने भाई और बाला साहब के वारिस का क़त्ले आम किया है उससे ग़द्दारी का पैमाना अपने ऊरूज पर लगता है, जो नाथूराम की ग़द्दारी और दहशत को भी मात देता हुआ दिख रहा है। दूसरी बात अगर हिन्दुतुव के मुद्दे पर उद्धव ठाकरे से मौजूदा वज़ीरे ग़द्दार ख़फ़ा था तो उसको ख़ुद शिव सेना से बरतरफ़ हो कर अपने वज़ीर के ओहदे से इस्तीफा देना था, ना की तंज़ीम में बग़ावत करनी थी और ख़ुद वज़ीरे ग़द्दार के ओहदे और लक़ब से पहचान बनाना थी। मतलब साफ़ ज़ाहिर है की मक़सद हिन्दुतुव हिफाज़त करना नहीं कुछ और था। अगर शिंदे के इस्तीफे के बाद तमाम रकूने असेंबली इस्तीफे दे देते तो अलग बात होती। लेकिन रकूने असेंबली के दिलों दिमाग में आलूद की मिक़्दार डाली गई और उनको बग़ावत के लिए उकसाया गया। तीसरी बात इस ग़द्दारी और हिंदुत्व की हिफाज़त में एक मुस्लिम साबिर शेख भी मौजूद है। तो उसको कौन से हिन्दुतुव की हिफाज़त करना है। क्या उस नामुराद को बाबरपुर की राम मंदिर या किसी और हिन्दू मंदिर में घुसने की भी इजाज़त है। कियोंके आज कल तो नए ज़ाफ़रानी हुकुम नाफ़िज़ किये जा रहें हैं। मंदिर के अतराफ़ में किसी भी मुस्लिम, क्रिस्टी, दलित को दाखिल होने की इजाज़त नहीं है। फिर अगर महाराष्ट्र की मौजूदा ग़द्दारों की टोली बाबरपुर के राम मंदिर में राम लला की ज़ियारत के लिए जाती है तो उस नामुराद मुस्लिम साबिर शेख का क्या बनेगा। क्या वोह जाएगा या उसको हिन्दू मज़हब अपनाने का दबाव डाला जायेगा। और अगर वोह नहीं गया तो किस हिंदुत्व की हिफाज़त के लिए उसने ग़द्दारी की थी। और अगर हिंदुत्व ही मुद्दा था तो ग़द्दारी में एक मुस्लिम को क्यों शामिल किया और अब उसको वज़ीर बनाने की बात हो रही है।
दरअसल आज कल जो मुल्के हिन्द में हो रहा है हर जानिब हिन्दू शिद्दत पसंद मज़हबी, संघी दहशतगर्द और बीजेपी वाले हलाक हो रहें हैं उसके पीछे ज़ाफ़रानी तंज़ीम के गुनाह और बदकारिया बदआमाल है। इस मुद्दे पर २०१४ के बाद सबसे क़ब्ल जब बिहार की हुकूमत के अंदर सेंध मारी कर के ज़ाफ़रानी तंज़ीम क़ाबिज़ हुई थी। आसाम और बिहार में जो बाढ़ और तूफ़ान आया था उस पर इस सहाफी ने कई एक मज़मून शाया किये जा चुके हैं। केरला में तड़ी पार सज़ाई आफ़्ता मुजरिम दरिंदा शैतान का पहला क़दम पड़ा था और केरला अगस्त माह में तूफ़ान के नज़र हो गया था कम से कम १५०० हिन्दू अवाम मौत की आगोश में चले गए थे। हिन्दू अवाम ने मस्जिदों में पनाह ली थी और उनके खाने का एहतेमाम मस्जिद की इन्तेज़ामियाँ ने किया था और जब क़ुदरत का क़ेहर कम हुआ तो हर अफ़राद को रूपये पैसे से इमदाद कर के उनको उनके घरों की जानिब रवाना किया था।
क्या वजह है हर भाजपा ज़ेरे इंतज़ाम सूबों में हिन्दू आये दिन हादसों का शिकार हो कर मारे जा रहें हैं। कश्मीर में गढ़वाल, उत्तराखंड, चमोली हिन्दू अक्सरियत और बीजपी हुकुमरान पहाड़ी इलाक़ों के जैसी हालत जब से बीजेपी की गलीज़ और गन्दी नज़रे पड़ी हैं तब से हुई है। हर बीजेपी इक़्तेदार वाली ज़मीन कुदरती आफ़ात और वबा से मुत्तासिर हो रही है। आज का कश्मीर जहाँ कभी ऐसी कुदरती आफ़त नहीं आती थी लेकिन जब से भाजपा ने मुफ्ती के साथ हुकूमत क़ायम की और शिद्दत पसंद काफ़िरों और संघी दहशत की गलीज़ नियत के बाद आना शुरू हुई है। अब मरकज़ के इन्तेज़ामियाँ हाथ में लेने के बाद तो हालात मज़ीद बिगड़ गए। चाहे वोह नए साल पर वैष्णोदेवी अम्बरनाथ में हादसात हों या अभी हाल ही अम्बरनाथ यात्रा में बादल फटने का हादसा। यह सब इन गलीज़ ज़ेहनियत वालों के गुनाहों का नतीजा है।
अब मुद्दे पर आतें हैं कश्मीर तो तबाह बर्बाद कर दिया अब इनकी गन्दी और गलीज़ नियत महाराष्ट्र पर पड़ी हैं। वज़ीरे ग़द्दार बोलता है की रिक्शा मर्सिडीस से आगे निकल गई। तो इतना जान ले “बोल बच्चन” वज़ीरे ग़द्दार, जितना बिगाड़ा भाजपा ने अपना और अपने मुल्क का नहीं किया उतना इन बोल बचचनों ने किया है। पेट्रोल सुना है भारत में ३५० रूपये तक जाने वाला है। फिर रिक्शा किस के सहारे चलाओगे, मर्सिडीस में तो इलेक्ट्रिक सहूलियत मौजूद है लेकिन रिक्शा किस के सहारे पर बढ़ाओगे।
अपने खुद के मुल्क को बर्बाद कोई और नही बल्कि इन ज़ाफ़रानियों की नाइंसाफी दूसरों के साथ की हुई हक़तल्फ़ी करेगी। जब अपने खुद के ऊपर आये तो बवाल मचा दो और दूसरों की तकलीफ चीखबाज़ों की चीख को सुनों ही नहीं। "आवाज़ नहीं आ रही है, सुनाई नहीं दे रहा है, बोहोत शोर है"।
तुम्हारे मज़हबी जज़बात हैं और दूसरों के जज़बात की कोई एहमियत ही नहीं। तुम्हारे जज़बातों को २०१८ में आई एक फिल्म के सीन पर ठेस पहुंच जाती है टूट जातें हैं। और दूसरों के जज़बातों का क्या। तुम्हारे जज़बात महज़ एक कागज़ के टुकड़े में रखे गोश्त से टूट जातें हैं। जो किसी ग़रीब गोश्त वाले ने रद्दी में रखे पेपर्स में गोश्त दिया था। और दूसरों के पैग़म्बर की शान में अनाप शनाप बोलने वाली अभी तक खुली हवा में घूम रही है। तुम्हारे जज़बात इतने अफ़ज़ल हैं की पेशाब की जगह (लिंग-योनी) पखाने पेशाब की बेहुरमती से भी टूट जातें हैं लेकिन वहीँ दूसरों को कुछ भी बोलो और तवक़्क़ो करो की एहतेजाज नहीं होगा एक्शन पर रिएक्शन नहीं आएगा तो मुमकिन नहीं है। हाँ अगर नूपुर शर्मा की ग़िरफ़्तारी हो गई होती तो इस सहाफी को मिला कर कोई भी उसका सर क़लम करने की बात नहीं करता।
Zuber

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