अज़ीज़ नाज़रीन,
बीजेपी ने अपना असली रंग फिर से दिखा दिया है। महाराष्ट्र के वज़ीरे आला उद्धव ठाकरे जब तक बीजेपी के साथ थे मरकज़ की बीजेपी हुकूमत हर मुद्दे पर उनके साथ शाना बा शाना खड़ी दिखती थी। लेकिन जब से शिव सेना और बीजेपी में इख़्तेलाफ़ बड़े हैं और दोनों में अलहदगी (Breakup) हुआ है तब से बीजेपी हर मुमकिन कोशिश कर रही है की महाराष्ट्र को किसी भी तरह से इज़ा पहुंचा कर तकलीफ दी जाए। वैसे इस ब्रेकअप की वजह भी खुद बीजेपी ही है। उसका दोग़ला, ग़द्दारी और गले लग कर पीठ में खंजर उतारने की हिकमते अमली से ही शिव सेना ज़ख़्मी हुई। जो वादे महाराष्ट्र में इन्तेख़ाब से क़ब्ल बीजेपी की जानिब से किये गए थे उनको पूरा करना उसका फ़र्ज़ था।
शिव सेना और बीजेपी के ब्रेकअप में ग़फ़लत, और ग़लती बीजेपी की ही है। अपना मक़सद रहेगा तो मीठी मीठी बातें करना, जज़बाती मुद्दों पर शिव सेना के ऊपर दबाव डालना। लेकिन जब अपना इक़्तेदार अपने मुस्तक़बिल का मामला आएगा तो ग़द्दारी कर देना। इस सहाफी के पास शिव सेना और बीजेपी की तवील गुफ्तगू की पूरी कॉपी मेहफ़ूज़ है। उध्दव ठाकरे ने ज़ुबानी और लिखित मुहायदे के तोर पर हर बार बीजेपी से दरयाफ्त किया, क्या आप मेरे साथ हैं और हर बार बीजेपी की जानिब से जवाब हाँ में था। Are you with me, Yes
महाराष्ट्र ही वजह बना की बीजेपी मज़ीद बिहार में नितीश के साथ ग़द्दारी और गले लग कर खंजर घोपने में नाकाम रही। कियोंकी जो वादे बीजेपी ने महाराष्ट्र के साथ किये थे, लेकिन जब इन्तेख़ाब में नतीजे बरक्स आये तो उसकी नियत में गंदगी आ गई। और अपने वादों को भूल कर अब खुद हाकिम बनना चाहती थी। लेकिन मालिके कायनात को तो कुछ और ही मंज़ूर था। फिर वही हालात बिहार में पैदा हुए, अब बीजेपी के पास दूसरा कोई और रास्ता नहीं बचा था, यहाँ पर नितीश के साथ अदना दर्जे पर काम करने पर मजबूर होना पड़ा। क्योंकि जो वादे और मुहायदे महाराष्ट्र में हुए थे वही बिहार में हुए। अब अगर बिहार में फिर से ग़द्दारी करती, एतेमाद का खून करती, भरोसे को तार तार करती तो उसकी साख अवाम की नज़रों में बेहद खराब हो जाती। फिर मजबूरी में समझौता करना पड़ा और अब बीजेपी की नाव एक समझौते की लाश को ढोने तक महदूत रह गई है, और उसके रकून दुसरे और तीसरे दर्जे के नुमाइंदे बन नितीश के आने और जाने के बाद दरी चादरे लगाने कुर्सियां उठाने के काम के रह गए हैं।
चलिए अब बात महाराष्ट्र की कर लेते हैं, वैसे तो बीजेपी को शिव सेना और उद्धव के बग़ैर चलता ही नहीं था, क्योंकि दोनों के नज़रिये काफी हद तक एक थे। हर सहाफी इजलास में और टीवी तब्सिरों में उद्धव सर, उद्धव साहब, बाला साहब बोल बोल के बीजेपी के नुमाइंदों का मुँह सूखा जाता था। लेकिन जब शैतान सर पर हावी हुआ तो कर दी ग़द्दारी कर दिया एतेबार का ख़ून और कर ली अपनी खुद की फज़ीहत। जहाँ तक उद्धव ठाकरे का सवाल है उन्होंने कोई ग़लती नहीं की उन्होंने बीजेपी के वादों और भरोसों पर एतेबार कर के एक हिकमते अमली तैयार की थी। लेकिन इंतेखाब का नतीजा आने के बाद बीजेपी की नियत में तबदीली आ गई। फिर जिस बीजेपी को २०१८-१९ में फरिश्ता बनाया था वोह एक ही झटके में फरिश्ता से गद्दार बन गई। इस सहाफी का नजरिया बीजेपी के लिए क़ायम है और वोह अभी तक नहीं बदला है। बीजेपी महज़ मीठी मीठी बातें कर के हिन्दू मुस्लिम का जज़बात उभार कर अपना मक़सद हल करना चाहती है। और ऐसे दोग़ले को सिर्फ एक ही नाम दिया जा सकता है "गद्दार"
उस ग़द्दारी के चलते ही बीजेपी और शिव सेना में हो गया ब्रेकअप, अब बीजेपी उसका बदला महाराष्ट्र के तमाम मराठा अवाम से ले रही है। महाराष्ट्र में जब बीजेपी और शिव सेना एक साथ काम करते थे तब मराठा मेहफ़ूज़ बिल पर बीजेपी भी शिव सेना के साथ शाना बा शाना खड़ी थी और उसने शिव सेना की हिमायत की थी। लेकिन जब अलहदगी हो गई तो अब बीजेपी चुन चुन कर बदले ले रही है। हालांकि इस अलहदगी में ना तो उद्धव ज़िम्मेदार हैं और ना है मराठा अवाम अगर कोई ज़िम्मेदार है तो खुद बीजेपी और उसकी गन्दी गलीज़ नियत, धोका देने की हिकमते अमली। जब दोनों के नज़रियात एक थे, दोनों एक ही मक़सद के लिए जंग लड़ रहे थे तो महज़ अपने बेहतर मुस्तक़बिल के लिए अपने मुहाफ़िज़ अपने इत्तेहादी के साथ ग़द्दारी करना, बीच मझदार में आ कर इत्तेहाद और मोहायदा तोड़ देना बीजेपी की पुरानी आदत है। आज शिव सेना के बाद तक़रीबन ज़्यादातर इत्तेहादी बीजेपी से अलहदा हो गए। अकाली बीजेपी के दोहरे रवैये के चलते आज कोसते नहीं थकते हैं।
मराठा मेहफ़ूज़ बिल को अलहदा रखते हैं बीजेपी की बदला लेने की हिकमत उस हद तक बढ़ गई की उसने कोविद-१९ की दूसरी लहर में उध्दव ठाकरे की मदद की गुज़ारिश को भी दर किनार कर दिया। उध्दव ठाकरे को छोड़ महाराष्ट्र की अवाम से बदला लेना शुरू कर दिया।
कुल मिला कर यह सहाफी यह नतीजा अखज़ कर रहा है की अगर महाराष्ट्र में बीजेपी की हुकूमत होती या शिव सेना और बीजेपी में इत्तेहाद होता तो मराठा मेहफ़ूज़ बिल हरगिज़ आला अदालत से नामंज़ूर नहीं होता। दूसरी बात इस इत्तेहाद को तोड़ने में भी बीजेपी खुद ज़िम्मेदार है उसने ही इत्तेहाद तोडा है। उद्धव ठाकरे तो आखिर तक इत्तेहाद को क़याम रखने पर ज़ोर दे रहे थे और बीजेपी को बोल रहे थे की जो मुहायदे आपने किये है उनको पूरा कीजिये। अगर उस दिन उध्दव ठाकरे को बीजेपी की जानिब से एक फोन कर दिया जाता या पैग़ाम (मेसेज) भेज दिया जाता तो हालात आज इतने पेचीदा नहीं होते। व्हाट्सअप पर पैगाम भेज देना था उद्धव ठाकरे खुद व्हाट्सअप मर मौजूद होतें हैं।
अब जब सब कुछ ख़तम हो गया है और बीजेपी को अपना मुस्तक़बिल सियाह
अँधेरे में घिरा दिख रहा है तो बवाल मचा रही है।
बदला ले रही है। लेकिन होगा वही जो
मालिके कायनात को मंज़ूर होगा। चाहे बीजेपी
कितना भी उछल कूद कर ले, कितना भी ताक़तवर हो जाए नतीजा वही निकलेगा जो मेरा रब चाहेगा।
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