उत्तर प्रदेश बिहार में गंगा घाट पर लाशों का अम्बार मिलने से इन्तेज़ामियाँ के हाथ पाँव फूलने लगे हैं। बिहार अपने सर का पड़ला झाड़ कर उत्तर प्रदेश की साधू इन्तेज़ामियाँ पर लाद रहा है की यह लाशें उत्तर प्रदेश से बह कर हमारे यहाँ आ गई।नाज़रीन काशी मोदी और ज़ाफ़रानी गड में गंगा के साहिल और खुले मैदानों में जगह कम पड़ गई की लाशों की आख़िर रसूमात उनके मज़हबी एतेक़ाद के हिसाब से की जा सके। अवाम अपने करीबियों को पानी में बहाने लगे.
बिहार में करोना वबा के चलते इंसानियत को शर्मसार करने वाला अक़्स उभर कर सामने आया है। एक जानिब जहाँ बीजेपी के बुज़ुर्ग सियासतदां राजीव प्रताब रूडी के पार्लियामानी हलक़े मधेपुरा से सैकड़ों अम्बुलेन्सेस पोशीदा कर के खड़ी कर रखी थी। तमाम अम्बुलेन्सेस पर राजीव प्रताप रूडी का नाम चस्पा था और पार्लियामानी रक़म से अवाम के फलाही कामों में इतेमाल की जाए ऐसा लिखा हुआ था। छुपा कर रखी हुईं वोह तमाम अम्बुलेन्सेस को पप्पू यादव ने बरहना कर दिया और उनके ऊपर लगा रखा शर्म और हया का ज़ाफ़रानी दुशाला हटा कर उन तमाम पोशीदा कर के रखी हुई अम्बुलेन्सेस को अवाम के रू बरू पेश कर दिया।
जहाँ एक जानिब अवाम को अपनों की लाशों और बीमारों को शिफा खाने ले जाने के लिए कोई दूसरा ज़ाराये ना मिलने के सबब कोई तो ज़ाईफ शख़्स अपनी अहलिया की लाश को साइकिल पर रख कर आतिशे नार करता है तो कोई बाप अपनी एकलौती अलील दुख्तर को खाट पर लिटा कर ३५ किलोमीटर तक चलता है। और बीजेपी के सियासतदां किस इंतज़ार में इन अम्बुलेन्सेस को दुर्गा वाहिनी की दहशतगर्द खातूनों की तरह ज़ाफ़रानी दुशाले में पोशीदा कर के रख रहे थे।
खेर अभी एम्बुलेंस का तनज़िया ख़तम भी नहीं हुआ था की लाशों को लकड़ियों और काशी मथुरा में शमशान घाट पर जगह की कमी के सबब गंगा में बहा दिए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। अब बिहार चाहे लाख उत्तर प्रदेश पर इलज़ाम तराशी कर के अपना बाज़ू साफ़ कर ले, लेकिन एक बात तो ते है चाहे बिहार हो या उत्तर प्रदेश अगर कोई भी तनज़िया अवाम की निसबत से सहाफत की नज़रों में आता है तो साख़ तो बीजेपी की ही ख़राब होना है यह तो ते है। क्योंकि बिहार में भी बीजेपी की हुकूमत है और उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी की ही हुकूमत है।
करोना महामारी में इस तरह के लाशों के अम्बार ने ज़िल्हे की इन्तेज़ामियाँ के कान खड़े कर दिए हैं। ग़नीमत यह रहा की इन्तेज़ामियाँ को इस बात की भनक लगती तब तक आज़ाद सहाफियों का वीडियो सोशल मीडिया पर वाइरल हो चूका था। अपनी हुकूमत की बदनामी और ज़लालत से बचने के लिए इसीलिए साधू ने ऐसा ज़ाफ़रानी हुकुम नाफ़िज़ किया था अगर किसी ने हुकूमत की निस्बत से ऑक्सीजन और बदइंतज़ामी की खबरे या अवाम से मदद की कोई भी खबर शाया की तो उसको ज़ाफ़रानी सज़ा दी जाएगी। ज़ाफ़रानी जमात का हुकुम नाफ़िज़ करना था की ख़ाकी दहशत अमल पैरा हो गए और धड़ा धड़ सहाफियों सोशल वर्कर्स को पकड़ने लगे। यहाँ तक की मस्तूरातों को भी नहीं बख्शा, उनको भी पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। वोह ज़ाफ़रानी सज़ा का हुकुम अदलिया के मुदखेलत के बाद ख़तम हुआ।
चौसा के बीडीओ अशोक कुमार अब लाशों के अम्बार की बातों को लीपा पोती करने में लगें हुए हैं। अम्बार की बात और वीडियो की तस्दीक को भी झुटलाते हुए बीडीओ साहब ४० से ४५ लाशों की बात को तस्लीम कर रहें हैं। जो अलग अलग इलाक़ों से बह कर महादेव घाट पर आ गई थी। मज़ीद अशोक कुमार ने कहा लाशें हमारी नहीं हैं हमने एक चौकीदार रखा हुआ है, जो लाशो को आतिशे नार करने के लिए ज़िम्मेदार है। साहब यह हमारा तुम्हारा क्या है, लाशें हैं तो किसी हिन्दुस्तानी की, या नेपाल बंगलादेश से बह कर आ गई.
चलिए बीडीओ साहब आप ही की बात को सच मान लेते हैं,
लाशों का अम्बार नहीं महज़ ४० से ४५ लाशें हैं।
लेकिन अब सवाल यही उठता है ऐसे हालात कैसे पैदा हुए की अवाम अपने मरहूमीन की आखिर रसूम अपने मज़हबी अक़ीदे के हिसाब से भी नहीं कर सक रहा है। आपके चौकीदार रखने का क्या फैयदा। असल तो गड़बड़ चोकीदार की ही है अगर उसने वक़्त पर अवाम को आगाह किया होता की भारी तबाही आने वाली है आप लोग कुछ भी गलत मत करो तो आज हालात इतने पेचीदा होते ही नहीं।
अशोक कुमार साहब ज़रा अब आपके चौकीदार की तालीम और उसकी ज़हानत भी बता दीजिये। क्या वोह चौकीदार डॉक्टर फलां बिन फलां हैं या चौकीदार इंजिनीअर फलां बिन फलां है या बीटेक, मटेक चौकीदार फलां बिन फलां है या चौकीदार सियासतदां फलां बिन फलां है। २०१९ में तो आप भी चौकीदार ही बन गए होंगे। ओर फख्र से आपने नाम के आगे चौकीदार लगा लिया होगा।
असल मुद्दा वही है चोरी हुई गड़बड़ हुई डाका डाला गया चोर लूट कर ले गया मतलब चौकीदार ग़ाफ़िल था उसमे हिफाज़त का जज़्बा ही नहीं था बल्कि चोरों का, डाकूओं का साथ देने की हिकमत थी। मतलब चौकीदार ही चोर है.
Zuber
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