Monday, 29 May 2023

हम जन्नत डंडे के ज़ोर पर ले लेंगें।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज की कहानी मिल्लत के नौवजवान बच्चों को वक़्फ़ है और ख़ाकसार का सवाल है मुफ़्तियाने इकराम और फतवा देने वाले हज़रात से है की क्या ऐसा हो सकता है।   

अरब से कोसों दूर एक तीन साहीली मुल्क था।  इस्लाम का इब्तेदाई मरहले का आग़ाज़ हो चूका था।  और इस्लाम अरब की हुदूद से बहार निकल कर अब बेरुन मुल्क मुमालिकों में भी पहुंच चूका था।  वोह तीन साहिली मुल्क भी इस्लाम की ख़ुश्बू से बेअसर ना रह सका और अवाम के अंदर इस्लाम दाख़िल होना शुरू हो गया। 

उस मुल्क के एक क़स्बे में अभी उस हद तक इस्लाम नहीं पहुंचा था।  मुसलमानों की बस्ती काफ़ी कम थी।  लेकिन जितने भी थे सब पुख़्ता ईमान वाले थे।  हालांके नवजवान तबक़े में नमाज़ की उस तक तक तड़प नहीं देखी जाती थी।  कभी पढ़ ली कभी छोड़ दी।  नवजवान पस्त इबादत करते थे लेकिन किरदार उनका आला था।  ऐसा ही मामला चलता था।  उस क़स्बे के चारों जानिब कुफ्र की बादशाहत थी।  उस क़स्बे में सिर्फ एक मस्जिद थी। 

नवजवान तबक़ा बजाये नमाज़ और मज़हब पर ज़्यादा तवज्जो देने के वर्ज़िश और लाठी डंडे की मश्क करने में ज़्यादा तवज्जो देता था।  सुबह के वक़्त लठ से करतब करना और वर्ज़िश में मशग़ूल रहना।  वक़्त मिलता तो नमाज़ भी पढ़ लेते थे।  जब भी इमाम साहब मस्जिद में नमाज़ पढ़ाने जाते नवजवानों को नमाज़ की दावत देते। 

इमाम साहब कहते नमाज़ नहीं पढोगे तो जन्नत कैसे मिलेगी।  उस पर एक नवजवान कहता में जन्नत डंडे के ज़ोर पर ले लूंगा।  इमाम साहब “ला होल वला क़ुव्वत” बोलते और आगे चल देतें। 

एक रोज़ रात के आख़िर पहर फज्र से क़ब्ल शिद्दत पसंद काफ़िरों ने मस्जिद पर हमला बोल दिया, जैसे की हज पर जाते हुए ज़ायरीन मक्का पर हाल ही में हमला कर काफ़ी को सख़्त ज़ख़्मी कर दिया और बस को भी तोड़ फोड़ दिया।  एक शोर उठा मस्जिद पर हमला हो गया है।  वोह तमाम नवजवान कुछ वर्जिश में मशग़ूल थे कुछ अभी तक उठे ही नहीं थे सो रहे थे।  मस्जिद पर हमले की बात सुनते ही जो सो रहे थे वोह उठ खड़े हुए और जो वर्ज़िश में मशग़ूल थे उन्होंने सभी ने अपने अपने डंडे उठाये और मस्जिद की जानिब भागे। 

अब कुफ्र और मोमीनों के दरमियान ज़बरदस्त तसादुम हुआ।  जिसमे कई शिद्दत पसंद दहशतगर्द हलाक हुए कई ज़ख़्मी और बचे कूचे फ़रार हो गए।  लेकिन हक़ और बातिल की इस जंग में कई नौवजवान शदीद ज़ख़्मी हो गए। 

इमाम साहब नमाज़ के लिए मस्जिद की जानिब आ रहे थे ज़ख़्मियों की तीमारदारी की और शदीद ज़ख़्मी का सर अपनी ज़ानों पर रख उसके सर को सहलाने लगे।  उस नौजवान ने इमाम साहब से पूछा मस्जिद के क्या हाल हैं उन्होंने ने जवाब दिया अल्लाह का शुक्र है बिलकुल मेहफ़ूज़ है।  फिर उसने इमाम साहब से कहा इमाम साहब में मर रहा हूँ क्या मुझे शहीद का दर्जा मिलेगा।  मेरे डंडे की वजह से मस्जिद मेहफ़ूज़ रही तो क्या अब मुझे जन्नत मिलेगी।  और अगर मिलेगी तो क्या मेने जन्नत डंडे के दम पर हासिल नहीं कर ली।  और वोह नौजवान फ़ौत हो गया। 

इमाम साहब उसकी शहादत पर बेसाख़्ता चीख़ पड़े हक़ हक़ हक़ और अपने दोनों हाथों को बारगाहे ख़ुदावन्दी में उठा कर शहीद के खून से भीगे अपने दामन को फ़ैला कर दुआ की ऐ बारी ताला मेरी जितने भी नेकी है इस बन्दे के नाम लिख दे और इसके गुनाहों को बक्श दे इसको जन्नतुल फ़िरदौस में हज़रते इमाम हुसैन के शाना बा शाना महल आता फ़रमा। 

नौजवान की शहादत पर तमाम क़स्बे के अवाम ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर तबक़े के अवाम उन दहशतगर्दों को कौस रहे थे और सबकी आँखे उस नौजवान की शाहदत पर आंसू बहा रही थी। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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