अज़ीज़ नाज़रीन
आज का मज़मून ख़ाकसार के मुर्शिद को वक़्फ़ है जो उनके कश्फ़ और करामात को ज़ाहिर करता है। हालाँकि किसी भी वली की करामात अल्लाह की जानिब से जब किसी बन्दे पर ज़ाहिर होती है तो उसकी हयाते तय्यबा में उसको कभी भी ज़ाहिर नहीं करना चाहिए। तसव्वुफ़ में वोह राज़ फ़ाश करने जैसा होता है। हाँ अलबत्ता उनके विसाल के बाद उनकी करामात ज़ाहिर करने में कोई हर्ज नहीं। यह एक नसीहत है चिड़ियाघर के खूंखार जानवर लंगूर-लँगूरनियों को जो मोदी जैसे ज़ालिम दरिंदे जल्लाद को पीर और उसके ऊपर जान नौछावर करने वाले को मुरीद बना देतें हैं। ऐसे तमाम कमज़र्फ या तो हाथों से माज़ूर हो जायेगें या ज़ुबान में उनके लुक़नत आ जाएगी जो पीरी मुरीदी का मज़ाक़ बनातें हैं।
नाज़रीन, ख़ाकसार के पीरो मुर्शिद हज़रत जलाल उद्दीन अब्दुल मतीन रेहमतुल्लाह अलैहे फिरंगी मेहली एक वली कामिल शख़्सियत थे। जो इंसान के दिलों के अहवाल और मुस्तक़बिल से आशना रहते थे। यह करामात उनकी हयाते तय्यबा में ही अवाम पर आशकार हो चुकी थी जो कोई भी उनके पास आता मासूम बच्चों से ले कर बुज़ुर्ग दुनयावी इंसान से ले कर हूकूमती ओहदेदार वोह उसको ना जानते हुए भी उस ही मुद्दे पर गुफ्तगू करते जो उस शख्स को मुत्तासिर करती थी या उससे ताल्लुक़ रखती थी। यहाँ तक की अगर कोई रिसर्च करने वाला तालिब ऐ इल्म आता तो जिस मुद्दे पर वोह रिसर्च कर रहा है और कोई सबूत उसको नहीं मिल रहे तो वोह गुफ्तगू में बात को ज़ाहिर कर देते थे की तुमको तुम्हारी मंज़िल फलां जगह मिलेगी। दूसरी बात अगर महफ़िल में १०० अफ़राद बैठे हैं और हर अफ़राद की अलग अलग हाजत है तो बयान एक ही करते लेकिन हर अफ़राद को उसकी हाजत के हिसाब से मालूमात फ़राहम होती थी। और जो फ़रेबी, झूठे, जालसाज़ ज़ाफ़रानी दरिंदें लंगूर लँगूरनियों जैसे टोही बैठे होते थे उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता था की हज़रत का किस और इशारा है, क्या मक़सद है। ऐसे टोही ख़ाली बर्तन के जैसे आते थे और ख़ाली ही लौट जाते थे कियोंके उनके दिलों में गंदगी बसी रहती थी वोह हज़रत को बदनाम करने की नियत ले कर आते थे। जो फ़ैज़याब होने की नियत ले कर अक़ीदत ले कर आता था उसको फ़ैज़ भी मिलता था और इशारा भी समझ जाता था की हज़रत की गुफ्तगू का क्या मक़सद है और आगे अब क्या करना चाहिए।
नाज़रीन ख़ाकसार को जो कुछ भी मिला है वोह हज़रत की बाबरकत नज़रों से ही मिला है। जैसा की अल्लामा इक़बाल ने पीर की शान में क़सीदे लिखे हैं
की जो वफ़ा तूने मुहम्मद से तो हम तेरे हैं
यह जहाँ चीज़ है क्या लोह क़लम तेरे हैं
नाज़रीन २०१० में हज़रत के साथ लखनऊ शरीफ़ से बॉम्बे आने का शर्फ़ हासिल हुआ था। उस वक़्त तक हज़रत काफ़ी रूहानियत को पहुंच चुके थे और हर वक़्त अलग ही कैफ़ियत में रहते थे। फिर हर ख़ास और आम से मिलना बंद कर चुके थे लेकिन अपने मुरीदों के लिए हर वक़्त कैफ़ियत से बहार निकल कर उनकी किफ़ालत को हाज़िर रहते थे। यूं तो वालिद के इसरार पर कई बार बॉम्बे तशरीफ़ ला चुके थे। लेकिन २०१० में जब उनके नायब से हज़रत को बॉम्बे बुलाने की आरज़ू बड़े भाई साहब ने ज़ाहिर की तो वोह कहने लगे आज कल नाना जान किसी से नहीं मिलते हैं और कहीं बाहर नहीं जा रहे हैं। वोह हर वक़्त हमको ले कर कहीं भी जातें हैं लेकिन हम भी उस वक़्त में थोड़े मसरूफ हैं। भाई साहब ने फ़ौरन बात को लपकते हुए बोला और ख़ाकसार का नाम तज़वीज़ कर दिया।
अब हज़रत को ले कर आने की हमारी बारी थी। दौरान सफ़र उस रात ना जाने क्या हुआ हज़रत ने ना जाने किस नज़रों से हमको देखा की ज़िन्दगी ही तब्दील हो गई। जब बॉम्बे पहुंचे तो थकान का वोह आलम था की दो दिन तक सोते रहे। आँखे सूझ गई और आँखों से इस क़दर सफ़ेद सफ़ेद आलूद और गंदगी निकल रही थी, जिस की कोई हद नहीं।
फिर २०१० में ही ख़ाकसार को एक जूनून तारी हुआ और ख़िताबत की रूहानी दुनियां में आया। फिर २०१५ में Journalism & Mass Communication में Masters की डिग्री हासिल की और बिंदास्त सहाफ़ी या Journalist लक़ब अपने नाम के आगे लगाने लगा। दूसरी एक और बात आप हज़रात को बताता चलूँ। मौलाना हसरत मोहानी रेहमतुल्लाह अलैहे इस नाम से वाक़फ़ियत तो थी लेकिन उनका क्या पेशा था वोह किस इदारे से जुड़े हुए थे वोह सब मालूमात नहीं थी। उन सब बातों का इल्म २०२१ से होना शुरू हुआ की मौलाना हसरत मोहानी भी एक सहाफ़ी थे और शायर भी थे और फिरंगी महल से वाबस्ता थे।
नाज़रीन यह हमारे मुर्शिद का ही कुछ करम रहा होगा की हालात ऐसे पैदा हुए। २०१२-१४ के दरमियान बॉम्बे के सेंट्रल सबर्ब मुम्बरा में क़ादर पैलेस हसरत मोहनी रोड पर एक हॉस्पिटल में काम करने का शर्फ़ हासिल हुआ। जिसका ज़िक्र २०१५ में दिल्ली सानेहा के वक़्त हुकूमत ऐ हिन्द की तहक़ीक़ाती इदारों को भी किया जा चूका है। तब तक मौलाना हसरत मोहनी साहब की रूहानियत और किरदार के बारे में कुछ भी वाक़फ़ियत नहीं थी। बस नाम से जानते थे।
२०१८ में ज़ाफ़रानी हुकूमत की ग़ुलाम मस्जिद के मुतव्वलियों ने एहतेक़ाफ़ पर नहीं बैठने दिया उसका सदमा हुआ एक ख़्वाब देखा था जिसको ज़ाहिर करने की आरज़ू हुई और ख़ाकसार शेरो शायरी करने लगा। हालांकि इससे क़ब्ल कभी भी शेरो शायरी नहीं की थी और अलफ़ाज़ भी उतने जारिहाना नहीं होते थे। लेकिन यह करम मुर्शिद ही का था की शमशीर से तेज़ अलफ़ाज़ की धार हो गई।
मौलाना हसरत मोहानी का एक शेर हमारे खानदान में आम था लेकिन उसकी एहमियत लड़कपन में कुछ पल्ले नहीं पड़ती थी।
क्या चीज़ थी मुर्शिदे वहाब की एक नज़र
जिसने हसरत को आरिफ़ ऐ कामिल बना दिया
नाज़रीन तस्सव्वुफ़ में कहतें हैं पीर बोहोत ही क़ुव्वत वाला होना चाहिए अगर पीर क़ुव्वत और ताक़त वाला है तो शैतान और दुनियां की कोई भी बदकारी मुरीद को राहे हक़ से ग़ाफ़िल नहीं कर सकती। जब शैतान की बात आती है तो अल्लाह भी कोई मदद नहीं करता है कियोंके शैतान को खुद अल्लाह ने सुबह क़यामत तक तमाम क़ुव्वत फ़राहम की है। जब उसके गले में लानत का तोग टांग कर उसको धक्के मार कर जन्नत से निकाला था तब उसने अल्लाह से ताक़त माँगी थी की जिस आदम के लिए तूने मुझे ज़लील किया जन्नत से निकाला में उस आदम की नसल को हर मौक़े बर्बाद करूंगा तबाह करूँगा गुमराह करूँगा। तब अल्लाह ने उसको पूरी ताक़त दी और अपने जलाल की क़सम खाई जितनी बार मेरा बन्दा पशेमान हो कर अपने गुनाहों से माफ़ी मागेगा में उसको माफ़ करूंगा।
नाज़रीन जहाँ शैतान है वहां अल्लाहा ने अपने बारगुज़ीदा बन्दों को पैदा किया जो नस्ले आदम में से ही हैं। अल्लाह का वादा शैतान से है लेकिन बुज़ुर्गाने दीन का कोई वादा शैतान से नहीं है तो वोह बुज़ुर्ग अल्लाह के सच्चे वली शैतान को गिरफ्त में कर लेते हैं और उसको सज़ा भी देतें हैं।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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