अज़ीज़ नाज़रीन
जैसा की सालार ऐ मिल्लत और आल इंडिया मजलिस ऐ इत्तेहादुल मुस्लेमीन AIMIM के सदर जनाब बेरिस्टर असदुद्दीन ओवेसी का आप तमाम अक़लियतों, दबे कुचले, दलितों, बेहद दलित अवाम से वादा था की ऐवान में कोई भी काम खिलाफ ऐ दस्तूर नहीं होने दिया जाएगा और कोई भी काम वोह ख़िलाफ़ दस्तूर बर्दाश्त नहीं करेगें मजलिस के नुमाइंदे दस्तूर के मुहाफ़िज़ और एक ज़िम्मेदार मुख्लिफ का किरदार अदा करेगें। जिसका आग़ाज़ सूबे शुमाल में देखने को मिला और साधू की ज़ाफ़रानी दहशत को थोड़ा अंकुश लगा है।
दरअसल सूबे शुमाल के मेरठ में हाल में हुए बल्दिया इंतेखाब में मुन्तख़िब हुए रकूनों की हलफबरदारी के दौरान वही ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों का हर मुद्दे पर खिलाफ ऐ दस्तूर काम पर जमकर हंगामा हुआ. वंदे..... गाने को लेकर हुए तनज़िये में ज़ाफ़रानी दहशत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी क़ौमी AIMIM के रकून बल्दिया के बीच मारपीट भी हुई. इसके बाद हूकूमती इन्तेज़ामियाँ के आला -अराकीन मौक़े पर पहुंच गए और AIMIM के रकून बल्दिया को समझा बूझा कर खामोश किया।
मेरठ के सीसीएस यूनिवर्सिटी के सुभाष चन्द्र बोस ऑडिटोरियम में मुंतखिब मेयर और रकून बल्दिया का हलफ़ बरदारी चल रहा था. इसी दौरान शातिर शरारती बीजेपी के रकूनों ने वंदे ..... का गान शुरू कर दिया. AIMIM के पार्षदों ने इसका विरोध किया और बैठे रहे. इस दौरान बीजेपी और AIMIM के पार्षदों के बीच तू-तू मैं-मैं भी हुई और नौबत मारपीट तक आ गई.
नाज़रीन इतना जान लीजिये की मजलिस के नुमाइंदे हर वक़्त इन्साफ के अलम्बरदार और दस्तूर के मुहाफ़िज़ साबित होंगें। साधू, ज़ाफ़रानी और ख़ाकी दहशत को जल्द ही ताला लगने वाला है। नाज़रीन शुमाल में अगले इंतेखाब में AIMIM को खुल कर वोट करें और अपने मजलिस के नुमाइंदों को कामयाब करें। आज की सियासत में हुकूमत, अदलिया और इन्तेज़ामियाँ अवाम की सियासी क़ुव्वत देखती है, उसके ऊपर फ़ैसले होंतें हैं।
नाज़रीन
आज मजलिस के महज़ ८३ पार्षद, ३३ रकून बलिदया, २१ कौंसलर, २२ नगर पंचायत के कौंसलर कामयाब
हुए। ५ चेयरमैन मुन्तख़िब हो कर आये और सर आज़म ख़ान को बरोज़ मंगल अदालत ने इश्तेआल अंगेज़ी
तक़रीर के जुर्म से बरी कर दिया। इसी तक़रीर में उनका जुर्म साबित हो चूका था उनको जेल
हुई और ऐवान से उनको बरतरफ़ किया गया था।
क्या अखिलेश यादव उनके हक़ में कभी खड़े हुए थे। नहीं। लकिन
जब मजलिस के नुमाइंदे मुन्तख़िब हो कर आये तो साधू को भी एहसास हुआ की अब उसका बचना
नामुमकिन है तो उसने ऐसे हस्सास मामलों को रफ़ा दफ़ा करना शुरू कर दिया।
सूबे शुमाल की असेंबली में कमो बेश ७५ से ८० और पार्लियामेंट में ३० से ३५ हल्क़े ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम आबादी ६० से ७० फीसद है। और कम से कम ७५ हल्क़े ऐसे हैं जहाँ २५ से ३० फीसद मुस्लिम आबादी है। उस हिसाब से अगर सीटों का तनासुब निकाला जाए तो असेंबली में ६० से ७० और पार्लियामेंट में २० से २५ सीटों पर मुस्लिम अपनी तंज़ीम और अपने पसंदीदा नुमाइंदों को मुन्तख़िब कर कामयाब कर सकतें हैं।
नाज़रीन इन्तेख़ाब के वक़्त जुम्मन अमजद अली ख़ान जैसे क़ौम और मजलिस के ग़द्दार आपके ज़हन को पुर आलूद करने की कोशिश करेगें। ऐसे क़ौम के ग़द्दार सिर्फ ज़ाफ़रानी गुलाम होतें हैं। जो मोदी, बीजेपी और संघी दहशत के पैसों पर पलते हैं और क़ौम का क़त्ले आम भी पसंद करतें हैं। वैसे भी अहले तशियो हज़रात में ८० फीसद ज़ाफ़रानी ग़ुलाम और मोदी की बोली बोलतें है। सिर्फ २० फीसद ही हक़ की बोली बोलतें हैं।
नाज़रीन
याद रखिये एक बार मजलिस के नुमाइंदे ऐवांन में पहुंच गए तो साधू, पुलिस और अदलिया में
बैठे नाइंसाफ जज जिन्होंने क़ानून और दस्तूर की ख़िलाफ़वर्ज़ी के फ़ैसले दिये थे वोह सब
जेल में होंगे। उनके गले में क़ानून और दस्तूर
का फंदा होगा। सब नाइंसाफों, दहशतगर्दों का
क़ानून के दायरे में रह कर हिसाब किताब पूरा होगा।
नाज़रीन यह जान लीजिये की अभी तो आग़ाज़ है अगर मजलिस के माक़ूल नुमाइंदे ऐवांन पार्लियामेंट और शुमाल की असेम्ली में पहुंच गए तो इन ज़ाफ़रानी दहशत का जीना दुशवार हो जाएगा। याद रखो योगी, यह अखिलेश मायावती या राहुल की तंज़ीम नहीं है जो महज़ दिखावे का उधम करते हैं और दस्तूर के हिफ़ाज़त की बात आये तो मुँह में दही जमा लेते हैं। यह ओवेसी की तंज़ीम हैं नाक में दम कर देगी। असली मुख़ालिफ़ और दस्तूर मुहाफ़िज़ का किरदार अदा करेगी। तैयार रहो अगली टक्कर के लिए।
सहाफ़ी ज़ुबेर की मजलिस से दरख़्वास्त
सबसे
क़ब्ल मुस्लिम हल्क़ों से शराब की दुकाने जुव्वे के अड्डे फौरी बंद करवाएं और मुस्लिम हल्क़ों
में स्कूल, तालीमी इदारे खोलने का आग़ाज़ करें।
बक़रा ईद पर बैल के ज़बीहे और उसके बाद दुकानों पर उसके गोश्त की फ़रोख़्त के लिए जद्दो जेहद करना। कियोंके दस्तूर में सिर्फ गाये के ज़बीहे पर पाबन्दी की बात कही गई है बैल को ज़िबह भी कर सकतें हैं और दूकान पर फ़रोख़्त भी कर सकतें हैं। बेगुनाहों को जेल से रिहा करवाने के लिए असेम्ली
में मजलिस की नुमाइंदगी बोहोत ज़रूरी है। उसके
लिए मुस्लिम, क्रिस्टी, सिख और दलित अवाम बढ़ चढ़ कर मजलिस को कामयाब करें।
सहाफ़ी
जुबेर
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