Thursday, 28 February 2019

अब हम भी जंग ही चाहते हैं.

नाज़रीन इस सहाफी ने जब से सहाफत की दुनियां में कदम रखा था वो हर पहलू पे मुज़ाकरात और बात चीत को तरजीह देता रहा है.  और इसका सहाफत में आने का मक़सद भी वही था जो आलूद, ज़हर, गंदगी हिन्दू शिद्दतपसंदों के ज़हन में मुस्लिम अवाम की निस्बत से लंगूर और लँगूरनिओं ने भरी है उसको हकीकत से रू बरू करवाया जाए.  बिल आखिर ये सहाफी अपने मक़सद में काफी हद तक कामयाब हुआ और जो मुस्लिम अवाम कांग्रेसी दौरे हुकूमत में एक दहशतगर्द या आतंकी बोल के बदनाम किये जाते थे और उनकी गिरफ्तारी की जाती थी वो २०१४ के आते आते बिलकुल ख़त्म हो गई थी.  

ये भारीतय अवाम की बदबख्ती और ना अक़्ली है की अपनी की हुई बदकारिओं को पोशीदा रखते हैं और जब उसका माकूल जवाब दिया जाता है तो आलमी बरादरी के सामने आंसू पूछवाने चले जातें हैं और पूरे भारत में ऐसा माहौल तैयार करते हैं जिससे ऐसा महसूस हो की सारी बादकारिया दुसरे फ़रीक़ की हैं और ज़ुल्म भारत के साथ हुआ है.  जबकि ऐसा नहीं है.  अब सिलसिलेवार बातों का तब्सिरा और जायज़ा लेते हैं. 

१९९० से कुछ अर्से क़ब्ल बाबरी मस्जिद का तनाज़ा हिन्दू दहशतगर्दों ने अपनी सियासी हिकमते अमली को पूरा करने के लिए शुरू किया, जिसको हिन्दू शिद्दतपंसदों के ज़रिये मज़ीद हवा दी गई.  मसला इतना पेचीदा हो गया की १९९२ में बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गई.  उसके बाद ना सिर्फ शहीद हुए हज़ारों बे गुनाह मुसलमान बल्कि कई हिन्दू भी इस मुतानाज़े में मारे गए.   जो मसला अब कश्मीर के बाद अगले नासूर की पेशनगोई कर रहा है.  

लेकिन उन हादसात की तपिश भोगी कई मुसलमानों ने जिनकी ना तो कोई ऑफ.आई.आर. दर्ज करने वाला था और ना ही उनको माकूल तिब्बी सहायता फ़राहम की गई.  सरमायाकारों और ताजीरों से इमदाद भी इन लुटे पीटे मुसलमानों को नहीं मिली.  फिर जब इन सब मामलों का जवाब किसी मुजाहिद ने अपने अंदाज़ में दिया.  फिर क्या था तमाम अखबारात और हुकूमते हिन्द के हाशिये पे तमाम मुसलमान आ गए.  मुसलमानों की ज़बरदस्त तरीके से गिरफ्तारियां शुरू हुई.  उस दौर के लंगूरों की तो चांदी हो गई.  अखबारात की मुसलमानों और बॉम्ब ब्लास्ट की निस्बत से जितनी इश्तेआल अंगेज़ी भरी सुर्खिया उतना बड़ा पैकेज.  इन सब वजूहात से मुस्लिम अवाम का तस्सव्वुर भारत में बे हद खारब हुआ. और हर दूसरा मुसलमान हिन्दू अवाम को दहशगर्द ही दिखने लगा.  

लेकिन इस सब गहमा गहमी में ना तो हुकूमते हिन्द को, ना ही लंगूरों को और ना ही शिद्दत पसंद और दहशतगर्द हिन्दुओं को इस बात का एहसास हुआ की जो आग उन्होंने लगाई थी इसकी तपिश और सज़ा उनका खुद का मुल्क भारत भोग रहा है.  मसले की जड़ तक जाने के बजाये और वजह जाने बिना दहशतगर्द हिन्दू अब मुसलमानों को अवामी जगहों और ज़ाराये आमद रफ़्त वाली चीज़ों पे हरासा करने लगे.

अब बारी थी हूकूमते हिन्द की अदलिया की, जिसने अज़्म किया था की मार्च १९९३ के बम ब्लास्ट करने वाले को फ़ासी तो देना है.  लेकिन इस सब गहमा गहमी में वो ये भूल गई की वो ना इन्साफ बन रही है और हद से बढ़ने वालों में उसका नाम दर्ज हो गया जब बाबरी मस्जिद के शहीद करने वाले हिन्दू दहशतगर्द आयेवाने पार्लिमेंट में बैठे हैं और जिन शिव सैनिकों, बजरंगदल, वी ही पि के दहशगर्दों ने दंगा फसाद किया था वो सब बरी हो गए.  और मुसलमान फसादी हो कर सजा के मुस्तहिक़ बन गए. एक मुसलमान को दहशतगर्दी के इलज़ाम में सूली पे लटका दिया.  ये इन्साफ का कौन सा पैमाना है.  पहल किस ने की थी बाबरी मस्जिद को किस ने शहीद किया, भारत को आतिशे नार किस ने किया.  फिर जब इन्साफ करना ही मक़सद था तो दोनों फ़रीक़ों के ऊपर कारवाही काहे को नहीं की गई.

आज के हालाते हाजरा में भी वही झूटी, फरेबी और शिद्दत पसंद ज़ेहनियत नुमाया और काम कर रही है जो २०१४ से पहले कोंग्रेसी हुक्कामों के सर पर मुस्सलद रहती थी.  लेकिन २०१४ के बाद हुकूमते हिन्द की बाग़ डोर नए हाकिम के सम्भालने के बाद मुस्लिम अवाम की हक़ तलफि उनका क़त्ले आम, पोशीदा तरीके से उनकी माशियत को तबाहकुन फैसले खुल के लिए जाने लगे, जिसके पीछे ज़ेहनियत वही शिद्दतपसंदी और आलूद वाली काम कर रही थी.  इस सभी बातों में मसलाये कश्मीर को भी फरामोश नहीं किया जा सकता.  जिस तरह से २०१४ के बाद भारतीय फौज का ज़ब्र, ज़ुल्म, तशद्दुत बे पनाह बढ़ गया था जिसकी वजह से कुछ ना ज़ेबा वाक़ेयात हुए पठानकोट, उरी और अब पुलवामा.  जिसकी तपिश और इलज़ाम तराशी शिद्दत पसंद ज़ेहनियत पाकिस्तान के ऊपर आईद  कर रही है. लेकिन यहाँ पर फिर हुकूमते हिन्द और मौजूदा बादशाह शदीद गफलत का शिकार थे, और मामले को अपने सयासी नफे के लिए या गफलत की वजह से मज़ीद पेचीदा बना कर ज़िम्मेदारी पाकिस्तान के ऊपर लाद दी गई, और हालात जंग जैसे बना दिए गए.  मसला जब कश्मीर से ताल्लुक रखता है तो उसकी ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पे कैसे लादी जा सकती है. अगर पुलवामा हमला हुआ तो वो तास्सुरात है उस ज़ुल्म का जो कश्मीरी अवाम कमो बेश ३० साल से ज़ायद झेल रहा है, आपकी नाहीली का आपके जब्र का आपके तशद्दुत का आपके अना को कायम रखने का.   

अगर आपने मुजाकेरात को आगे बढ़ाया होता कश्मीरी अवाम की हक़तल्फ़ी पे तवज्जो दी होती;  राजा हरी सिंह और भारत के साथ मुहायदे की उस दफा पे अमल किया होता और अपनी फौज को वापिस भारत बुलवाया होता तो हालात इतने पेचीदा ना होते थे.    

फिर भी पकिस्तान की जंग टालने की हर मुमकिन कोशिश ना काम साबित हो गई.  पकिस्तान के वज़ीरे अज़ाम की अमन की आखिर दरख्वास्त और कोशिश को भारीतय मिडिया और अवाम डर और खौफ की वजह बता रहे थे, और तस्सवुरे ख्याली में पाक फौज को मज़ीद धमकी दे कर १९७१ की याद दिहानी करवा रहे थे.  एहमकों की तरह ललकार रहे थे क्योंकि शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम को गुमान हो गया था के उनके पास दुनिया की सबसे ताक़तवर फौज है वो किसी भी हिमाक़त का माकूल जवाब देने में एहल है.   लेकिन वो ये भूल गए थे की जंग का आगाज़ ही तशद्दुत और बे ख्याली में लिए हुए फैसलों के बाद होता है, और हार उसी की जानिब मुतव्वज्जो होती है जो जोश में होश खो देता है. 

जिस पकिस्तान को भारतीय हुक्काम, अवाम, लंगूर और फौजी सरबराह कमतर समझ के तवक़्क़ो कर रहे थे उसने रात की तारीकी में डाकूओं की तरह १३ दिन के मश्क के बाद किये हुए भारतीय हमले का जवाब महज़ एक ही दिन में वो भी दिन के उजाले में डंके की चोट पे दे दिया.   अब किसी किस्म का शक शुबा भारीतय हुक्काम, लंगूर, अवाम और फौजी सरबराहों के दिलों दिमाग में नहीं रहना चाहिए की अगर जंग हुई तो उसकी तपिश आते कई सालों तक देखने को मिलेगी. 

इस सहाफी की हालते हाजरा पे नुक़्ताये नज़र

आज के हालाते हाजरा पे इस सहाफी की नुक़्ताये नज़र एक दाम साफ़ और वाज़े है की इस बार तो जंग हो ही जाना चाहिए.  अभी तक ये सहाफी मुज़ाकरात की वकालत करता था लेकिन मुज़ाकरात, अमन की बात, दानिशमंदी, जंग बंदी की हिकमते अमली को अगर हिन्दू दहशतगर्द खौफ बोल रहे हैं और घबराहट बता रहे हैं, बुज़दिली बोल रहे हैं तो हम जंग की सिफारिश करतें हैं. जिस तरह से हर मसले को पाकिस्तान की जानिब मुतवज्जो कर दिया जाता था और अपनी और अपने दहशतगर्दों की बदकारिओं, बदआमालियों को पोशीदा रखा जाता था जिससे की मज़ीद हिन्दू शिद्दतपंद तंज़ीम को उसका सियासी नफा मिल सके, उसी हिसाब से इस जंग में भी जीत उसी की होगी जो हक़ पे होगा, और जिसने जंग शुरू करने में पहल और हद से ज़्यादा ताजाऊस नहीं की होगी.

सुबाये कश्मीर और पाकिस्तान के अवाम को किसी भी किस्म की घबराहट और बेचैनी में नहीं रहना चाहिए.  वो अल्लाह और उसके फरिश्तों की पनाह में हैं.  फ़िज़ाओं में अल्लाह के फ़रिश्ते परवाज़ कर रहे हैं.  भारतीय फौज के ऊपर एक गलबा तारी होगा और वो जल्द ही उस खौफ और पोशीदा मखलूक से रू बरू होगी जिसके सामने इनकी ताक़त और क़ुव्वत सिर्फ गर्द और गुबार साबित होगी.

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