Tuesday, 26 February 2019

झूठे हुक्मरान (तानाशाह) के रहते मीडिया की झूठन.


आज के नए दौर के भारत में जब सभी चीज़े झूट, फरेब बोल के फैलाई जाती है तो ऐसी ज़ेहनियत से मीडिया का एक ख़ास तपका कैसे अछूता रह सकता है.  ख़ास लांगुरनिओं का वो तपका जो मीडिया मानिंद मंदिर के अंदर देवदासिओं की हैसियत से काम करती हैं.  और महंत के इशारे पे संघ, बीजेपी और दिगर आला ओहदेदारों को ये देवदासियां माकूल खिदमात अंजाम देने को तैयार रहतीं हैं. 

झूट और फरेब का चश्मा पहना के ये आला ओहदेदार और हुकमते हिन्द के मुलाज़िम किस तरह से इन देवदासिओं को झूठा करते हैं, और इनके मान सम्मान को बरहना करते हैं. 

अभी कुछ १५ या २० दिन पहले एक ऐसी ही खबर मीडिया की सुर्खिया बानी थी.  जिसमे एक दहशतगर्द को भारतीय सिक्योरिटी फ़ोर्स ने एक एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था.  ये खबर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में खूब वह वही लूट रही थी. तभी ये खबर मकतूल के पास भी पहुंच गई और वो आ पंहुचा खुदमुख्तार सहाफियों के पास और ना सिर्फ अपने आपको ज़िंदा बताया बल्कि कैमरे के सामने इंटरव्यू भी दिया.  और कहा जिस तरह से मुझको एक दहशतगर्द बोल के मारे जाने की खबर आम कर दी गई है, उससे मुझे अज़हद सदमा और तशवीश हुई है.  मज़ीद उसने कहा ना तो में मरा हूँ और ना ही दहशतगर्दी से मेरा दूर दूर तक ताल्लुक है.  लिंक देखिये.


ये वीडियो पुलवामा हादसे के कुछ ४ रोज़ बाद मिला है.  अब ये तो भारतीय फौज के अराकीन बताये जिसको मारा वो कौन था या फिर वो सहाफी बताये जिन्होंने इस मासूम बन्दे की तस्वीर के साथ खबरनामा शाया किया था.    फिर इस तरह की बेईमानी से ना तो हुकूमत के अला ओहदेदारों पे यकीन रह गया है और ना है फौज पे.

मीडिया तो अपना एतेमाद २०१३ से ही खो चुकी है जब मोदी को वज़ीरे अज़ाम बनाने की खवाहिश लिए मीडिया की लँगूरनियाँ अपने आगे से मोदी का नाम जोड़ने में फख्र महसूस करती थी.

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