Sunday, 10 February 2019

गुलामों का बन गया तसव्वुर हाकिम जैसा।


आज के दौर के राजे शिवाजी को वक़्फ़ 

अज़ीज़ नाज़रीन आप लोगों को ये सहाफी एक बोहोत कड़वी हक़ीक़त से रूबरू करवाना चाहता है. वो ये की २०१४ के बाद से तमाम इन्तहा पसंद, फ़िरक़ापरस्त हिन्दू अपने आपको हाकिम तसव्वुर करने लगे हैं.  असल में ये उनकी गलती नहीं है बल्कि ये गलती उनके रहनुमा और आक़ा मोदी की है, जिन्होंने ऐसे सब्ज़ बाग़ अपने अक़ीदतमंदों और मशायक़ीनों को दिखाए के वो हाकिम बन गए.  लेकिन उस सोच का क्या जो अभी तक गुलाम है और गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी हुई है.

गुलाम हाकिमों की नक़ल कर रहा है और अपने आपको हाकिम तसव्वुर कर रह है.  अजीब बात है, भले ही आज इन लोगो का तसव्वुर एक हाकिम जैसा हो लेकिन सोच अभी भी गुलाम ही है.  तभी तो मुग़लों की तामीरकर्दा हर इमारत को अपने आबो अजदाद का नाम दे देतें है और तस्सव्वुरे ख़याली में रखतें हैं काश ऐसी इमारत हमारे बाप दादाओं ने बनाई होती तो आज हम भी फख्र से कह सकते थे की ये हमारी है और हमें चोरी कर के डाका डाल के नकब ज़नी कर के मुग़ल बादशाहों की तामीर कर्दा इमारतों को अपनी ना कहना पड़ता.    

अब सवाल ये ही उठता है जिस वक़्त जलील क़द्र बादशाह आलमगीर औरग़ज़ेब फारस से बर्मा और कश्मीर से कन्यकुमारी तक भारत की सल्तनत पे बादशाही के फ़र्ज़ को अंजाम दे रहे थे तब तुम्हारे आबो अजदाद बागी बन के इधर उधर भटक रखे थे और मुग़ल ख़ज़ाने को लूट रहे थे.   अगर उस वक़्त मुल्क की फलाह और बहबूती के लिए कुछ काम किया होता तो आज तुम्हारे बाप दादाओं के नाम पे भी कुछ एक इमारत और किये हुए अच्छे कामों का ज़िक्र तारीख़ के पन्नो में दर्ज होता.   तब तुम्हारे बाप दादा मुगल खज़ाना एक डाकू की मानिंद लूट रहे थे और अब उनकी औलादें मुगलों की बनाई हुई इमारतें लूट रहें हैं और उनको अपने आकाओं और रहनुमाओं का नाम दे रहे हैं.  सोच वही है लूटरे डाकुओं वाली.  

ऐसा ही एक तिलिंगाना का ग़ुलाम आ गया हिन्दू फ़िर्क़ापरस्तों, तशद्दुतपसंदों के सामने और सभी ग़ुलाम नंदी बैल के जैसे मुंडी घुमाने लगे तस्सव्वुरे ख़याली में उसको राजा तस्लीम कर के इश्तेआल अंगेज़ी करने लगे राजा आया, राजा आया, राजे शिवाजी, शिवाजी महाराज अधिराज की जये हो.  देखो देखो कौन आया शेर आया शेर आया है है है है.   मसनद पे मौजूद मेज़बानी के फ़र्ज़ को अंजाम देतीं हूईं ख्वातीन ने उस ग़ुलाम का तार्रुफ़ करवाया की उसने औवेसी को अपनी ज़मीन में घुसने नहीं दिया और साबित कर दिया की वो ही असली राजा और शेर हैं.   

इससे दो बातें फिर साबित हो गई पहली ये की तवारीख़ अपने आपको दोहराती है आज के दौर में औवेसी ने जिस तरह उस लूटेरे और बागी को गोशामहल तक महदूत कर दिया उसी तरह उसके आबो अजदाद को आलमगीर औरंगज़ेब ने पहाड़ों और जंगलों की ज़ीनत बना के सिर्फ एक या दो महलों तक महदूत कर दिया था.  जो आज तशद्दुत पसंद और दहशतगर्द हिन्दुओं के तस्सव्वुर में कुल हिन्द का हकीम है उस हाकिम और राजा का इख़्तेदार सारे महाराष्ट्र पर भी नहीं था.  लेकिन उसको बाक़द्र, ताक़तवर राजा मान कर लक़ब दे दिया “राजे”.

दूसरी बात ये की पहली बार इस सहाफी ने और अवाम ने देखा है की किसी शेर की रहनुमाई कुत्तों की फौज कर रही है और वो शेर क़ियादत दहशतगर्दों की कर रहा है.  फिर वो शेर अपनी बोली छोड़ के गीदड़ों की बोली बोल रहा है, और एक गीदड़ के जैसे उम्मीद लगा बैठा है शेर के जबड़ों से जो झूठन बच जाएगा वो उसके नसीब में आ जाए तो अच्छा है.  तभी तो मुस्लिम समाज, इस्लाम के खिलाफ ज़हर अंगेशी कर रहा था और उसके मशायक़ीनों की ताली ठोंकनें में अपना सियासी नफा देख रहा था.  शेर तो अकेला और निहत्ता बे खौफ, ख़तर घूमता है फिर ऐसा शेर पहली बार देखा है जो ताली ठोँकने वालों की फौज ले कर चलता है.

पहली बार देखा की एक शेर इश्तेआल अंगेज़ी ज़हर भर के अपना सियासी उल्लू सीधा कर रहा है.  मतलब असली शेर से बचे हुए झूठन पे जिन्दा है.  जो साबित भी हो गया इस फरेबी शेर जैसे दिखने वाले गीदड़ ने हैदराबाद की फ़िज़ा को भी अपनी गलीज़ ज़ेहनियत से निकले हुए आलूद, ज़हर और गंदगी से ना पाक करने की पुर ज़ोर कोशिश की थी, और हैदराबाद की तहज़ीब और नाम बदलना चाहता था.  लेकिन शेर शेर होता है और गीदड़ गीदड़, तिलंगाना में हुए इंतेखाबात में ये बात साबित हो गई.   अब तो बस उस गोशामहल के शेर की गीदड़ भबकी ही रह गई है, और हैदराबाद के असली शेरों की सल्तनत और हुकूमत अभी तक कायम है. 

फिर वही बात साबित होती है जो इस सहाफी ने अपने मज़मून में ऊपर लिखा है, अब जिसके आबो अजदाद ने कुछ नहीं किया वो दूसरों की ज़मीन और किये हुए कामों पे डाका डाल के उसको अपनी जागीर समझता है.  वही हाल इस शेर का था इसको भी हैदराबाद का नाम तब्दील करने का भूत सवार हो गया था. फिर उसको आज के दौर के ओरंगज़ेब जैसे जलील कद्र हाकिम ने शिवाजी की तरह सिर्फ एक सिम्त तक महदूत कर दिया, अब रूसवाई और ज़लालत का वो अलाम है की सिर्फ और सिर्फ ज़न्खे और कुत्ते ही उसकी फौज के सिपेहसालार रह गए हैं मर्द तो सभी समझ गए हैं की हमारा हाकिम नपुंसक है उसमे इतनी भी कुव्वत और ताक़त नहीं की अपना किला बचा सके.

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