Thursday, 7 February 2019

मुसलमान हिन्दू दहशतगर्दों की इमदाद के मोहताज नहीं.

अज़ीज़ नाज़रीन ज़ाफ़रानी महाज़, बीजेपी और हिन्दू दहशतगर्दों के पास इन इंतेखाबात में कोई भी ऐसा बड़ा मुद्दा मुसलमानों की निस्बस्त से नहीं बचा है जसकी बुनयाद पे वो कट्टरपंथी और फ़िर्क़ापरस्थ हिन्दू अवाम के दिलों दिमाग में गुबार भर सकें और अपनी सियासी जीत दर्ज करवा सके.
 
१.           हज सब्सिडी
२.          गाये
३.           ट्रिपल तलाक़  
४.          बाबरी मस्जिद  
५.          लव जिहाद  
६.          इस्लामिक दहशतगर्दी  
७.          अफ़ज़ल गुरू फांसी.  
८.          पाकिस्तान / कश्मीर

इन ज़ाफ़रानी हाकिमों और कट्टरपंथी हिन्दुओं को इंतेखाबात के लिए कोई भी माकूल सुरते हाल और हिकमते अमली नहीं नज़र आ रही है जिसकी वजह से राये शुमारी को मुत्तासिर किया जा सके और हिन्दू राये शुमारी एकजेहदी हासिल कर सकें.

जब सभी तरफ से मोदी हुकूमत को ज़लील और रूसवा होना पड़ा है और खुद हिन्दू इन्तेशार और कश्मकश में हैं की २०१९ के इंतेखाबात में किस सियासी जामत के लिए राये शुमारी की जाये, तो आ गए वापिस लौट के घर और मुस्लिम अवाम को झूठा इत्मीनान और मज़हब के नाम पे गाजर दिखाना शुरू कर दिया.  लेकिन हुकूमत ए मोदी शायद ये भूल गई मुस्लिम अवाम कभी भी अपने मज़हबी कामों को अंजाम या पाए तकमील तक पहुंचाने के लिए किसी भी हुकूमत से कोई भी इमदाद लेने का क़ाइल नहीं हैं.  ख़ास कर के अगर हुकूमत हिन्दू शिद्दत पसंद और दहशतगर्दों की हाकिम बिल ज़ब्र के फलसफे पे काबिज़ की गई हो.

वैसे भी मुसलमान अपने कूव्वते बाज़ू और अल्लाह पे यकीन रखता है और दीन का काम बगैर किसी रूकावट के हर मौके पे पूरा होता है.  ये तो हिन्दू हैं जो इमदाद (भीक या भिक्षा) पे यकीन रख के अपना हर मज़हबी काम करते हैं.  उनके लिए ना सिर्फ बेरुन मुल्क चीन, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार बल्कि पूरे मुल्के हिन्द में वैष्णो देवी से ले कर कन्याकुमार और गुजरात से लेकर तो वेस्ट बंगाल तक अपने मज़हबी अक़ाइद के हिसाब से किराए में हुकूमत की तरफ से रियायत मिलती है.

हुकूमत आज अपने आकाओं और रहनुमाओं के मुज्जासमों पे करोड़ों रूपये खर्च करती है.  इस सहाफी की बोहोत से शिद्दत पसंद हिन्दुओं से गुफ्तुगू और बहस मुबाहिसा होता है.  सब औरग़ज़ेब की दारा शिको की कारगरदेगी पे तनक़ीद करतें हैं.  हालांकि उन सभी को माकूल जवाब दे दिया जाता है और उनके पास मज़ीद सवाल का कोई भी पहलू नहीं बचता है फिर भी अपने नाज़रीनों को बताना चाहता हूँ अगर दारा शिको मुल्क के हाकिम की गद्दी पे बैठता तो शायद आज चाय पीना भी नसीब नहीं होती, क्योंकि मुल्क की सभी चीज़े बिक चुकी होती.   क्योंकि आज मुल्क की धरोहर जिस तरह से एक ताजिर के पास गिरवी रख दी गई तो उस ज़माने में फाहशी की वजह से सभी चीज़े पहले ही गिरवी हो गई होती. 

आज मुल्के हिन्द में आलमी इज्तेमा हुए कभी औरंगाबाद कभी बुलुनादशहर कभी कानपुर तो कभी मालेगाव लेकिन सभी जगह मुसलमानों ने हुकूमत से एक रुपए की इमदाद तलब नहीं की और ना ही हुकूमत की कोई मदद ली. जो भी काम हुआ वो रज़ाकारों ने अपने क़ुव्वते बाज़ू पे किया.  वही दूसरी तरफ कुंभ की मिसाल मौजूद है जहाँ खित्ते के वजीरे आला ने ज़ायरीनों और उनकी सहूलियत के लिए सरकारी ख़ज़ाने का मू खोल दिया और  भरपूर इमदाद की.
लखनऊ का मुनाफिक मदरसों पे तम्बीह लगाना चाहता था उसने मोदी से दरख्वास्त की थी के मदरसों को दी जाने वाली हुकूमत की तरफ से इमदाद रोक दी जाए क्योंकि वहां पे दहशतगर्द की तालीम दी जाती है. अब उस मुनाफ़िक़ को इस्लामिक फलसफा क्या मालूम जिसे अल्लाह नवाज़ने पे आये तो इब्लीस, ख्वारा और यज़ीद जैसे हज़ारों आये और मरदूत हुए ज़लील हुए और उस मुनाफिक के साथ भी ऐसा ही हुआ. इधर उसने मोदी से दरख्वास्त की उधर देवबंद ने अपने सालाना इजलास में अज़्म किया की हुकूमत की जानिब से दी जाने वाली कोई भी इमदाद हम नहीं मंज़ूर करेगें और जितने भी इदारे, मदरसे और तालीमी बोर्ड देवबंद के ज़ेरे कयादत काम कर रहें हैं वो अब मुस्लिम इमदाद पे चलेगें.   इस मुद्दे पे इस सहाफी के मार्च २०१८ के खबरनामे दारूल उलूम देवबंद का सरकारी भीक से इंकार का मज़ीद मुताला कीजिये.
कुल मिला के मुसलमानों को ज़ाफ़रानी हुकूमत पे ज़र्रा बराबर यकीन नहीं है की वो किसी भी मुस्लिम मफ़ात के लिए कुछ भी अच्छा काम करेगी.  हाँ अलबत्ता मुस्लिम माशी हालात मज़ीद खराब करने की कोई भी पोशीदा स्कीम होगी तो वो पहले इख्तयार की जायेगी.  मुस्लिम नौजवानों को जेलों में डालने की किसी भी हिकमते अमली को फरामोश नहीं करेगी.  मुस्लिम ख्वातीनों से फरेबी, झूटी मोहब्बत का दम भरेगी और उनको अपने मज़हबी एतेक़ाद से दोगले, झूठे, मक्कार मुनाफ़िक़ों के फतवों की बुनयाद पे अलेहदा करेगी और उनके ज़हन में इन्तेशार भरेगी.  

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