Saturday, 9 February 2019

कश्मीर: ज़रा याद करो कुर्बानी।

अफ़ज़ाल भाई हम शर्मिंदा हैं, आपके क़ातिल ज़िंदा हैं.

आज कश्मीर का शहीद दिन है, और कश्मीर का हर अवाम गहरे सदमे और गम में डूबा है, क्योंकि उनके हीरो और शहीद अफजल गुरु को साल २०१३ में गैर अख़लाक़ी, गैर क़ानूनी तरीके से मय्यार से गिर कर तब की कांग्रेस हुकूमत ने भाजपा और संघ के दहशतगर्दों के दबाव में आ फांसी की बात को पोशीदा रख कर ख़ामोशी से फांसी दे दी थी। यहाँ तक की उनकी एहलिया और अहले खाना को तक फ़ासी जैसी बड़ी बात का इल्म उनका अदलियाई क़त्ल के बाद पता चली.  मुसन्निफ़ अपने कश्मीरी भाइयों और कश्मीर के आज़ादी के सिपाहियों के दर्द और तकलीफ को महसूस करता है और वह उनके हर दुःख, गम और तकलीफ के वक़्त शाना बा शाना उनके साथ हैं।

फ़िक्र की कोई बात नहीं है; इसका बदल हिन्दू दहशतगर्दों, तशद्दुत पसंद और बीजेपी को पहले ही मालिके हक़ीक़ी दे चूका है.  जून २०१३  में उत्तराखंड में उसी साल भयानक हादसा हो गया, जिसमें एक लाख से ज़ायेद हिंदू अफ़राद हलाक हुए और २०१४ में कांग्रेसी देहशत का इक़्तेदार ख़त्म हुआ।

इन एक लाख से ज़ाइद अफ़राद में बोहोत से संघियों और राम देव बाबा के अक़ीदतमंद और मशाएकीनों की हलाकत भी हुई होगी, क्योंकि इन सब इन्तेहापसन्द हिंदुओं की जामात में वो भी था जिन्होंने अफजल भाई के २० साल से ज़ायेद वक़्फ़ा जेल में रहने के बाद भी फांसी की सजा की हिमायत की थी।  लेकिन उस सानेहा में हलाक होने वाले ख़ास लोग की फेहरिस्त में साबिक वज़ीरे सेहत और भाजपा के बुज़ुर्ग रहनुमा अश्विनी कुमार चौबे के ७ मेम्बरान थे; उनमें से तीन करीबी रिश्तेदार थे। साली संगीता मिश्रा उनके शौहर सुबोध मिश्रा और अश्विनी कुमार के भतीजे की सानेहा में मौत हो गई थी। अश्विनी कुमार ने कैमरामैन के सवाल पर उसके करीबी और अज़ीज़ों की मौत पे ज़ारो क़तार आंसू बहाए और अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया।

मकबूल भट्ट, अफजल गुरु, बुरहान वानी जैसे  कश्मीरी नवजवानों की शहादत ज़ाया नहीं जाएगी और कश्मीर हुकूमत उन्हें आजादी के बाद हीरो की मानिंद इज़्ज़त बख्शेगी।  अपने वतन की आज़ादी के लिए उनकी कुर्बानी को तारिख की किताबों में याद किया जाएगा, और सुनहरे हर्फों में उनका नाम लिखा जाएगा.  उनकी बहादुरी की कहानियां बच्चों को सिखाई जाएंगी, कैसे उन्होंने भारतीय फ़ौज के तशद्दुत, ज़ुल्म और बंदूकों का सामना किया। मुसन्निफ़ कश्मीर के अवाम के साथ, उन सभी को सलाम करता है जिन्होंने जंगे आज़ादी में जामे शहादत नौश किया।  और अपने अज़ीम सबब हक़ के लिए २१ वीं सदी का सबसे ज़्यादा ताक़तवर तस्सव्वुर किया जाने वाला मुल्क “भारत” की ताकत, फ़ोर्स, तशद्दुत, और मिसाइलों के खिलाफ अपने मुल्क कश्मीर और अवाम का ५ सालों तक हिटलर हुकूमत से बचाव किया। 
  
उस मायने में भारत की जंग में पहले ही शिकस्त हो चुकी है जब वो कश्मीर के अवाम के जज़्बा ऐ हुर्रियत के सख्त अज़्म को ज़र्रा बराबर कमज़ोर नहीं कर सका,  जिनका आजादी के लिए जज़्बा एक लम्हे के लिए भी कम नहीं हुआ,  और वे तक़रीबन तीस सालों से दुनियां की सबसे ताक़तवर फ़ौज का मुक़ाबला कर रहे हैं। यहाँ तक के तानाशाह की हुकूमत के ५ साल बाद और फ़ौज को खुली छूट दिए जाने के बाद, ऑपरेशन ऑल आउट भी कश्मीरी अवाम के अख़लाक़ी मय्यार को कमज़ोर नहीं कर पाई. और खुद मुख्तार हुकूमत या आज़ादी के मुतालबे को कम नहीं कर सका; जो सवाल भारत के सामने अभी भी ज्यों का त्यों खड़ा है जैसा की वह २६ अक्टूबर को कश्मीर के उस सबसे ज़्यादा सियाह दिन था, जिस दिन कश्मीरी अवाम को उनके हाकिम ने गद्दारी कर के सूली पे चढ़ा दिया था और दुश्मन से मिल गया था।

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Kashmir: In remembrance of Sacrifice day (Kurbani ka Din).

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