नाज़रीन
आप लोगों के लिए पेशे खिदमत है एक ऐसा मज़मून जिसकी आप लोग इस सहाफी से तवक्को कर ही
रहे होंगें. इस सहाफी का मक़सद अवाम के दिलों दिमाग में जो झूट, फरेब की कालिख जम गई
है उसको हटाना है. और वो अपने मिशन में काफी
हद तक कामयाब हुआ है. इस सहाफी ने सहाफत की
दुनियाँ में २०१० में कदम रखा था, जब भारत का अवाम सख्त गुमराही, फरेब और झूट में मुश्तमिल
बातों पे यकीन कर के जी रहा था. लंगूर सहाफी
सिर्फ फरेब और झूट फैला के अवाम के एक ख़ास तपके के लिए बदगुमानी पैदा कर उसकी बदनामी
उस हद तक करते थे की हर दूसरा शहरी उस समाज से जुड़े हुए लोगो को दहशतगर्द समझ बैठता
था.
पिछले
कुछ एक मज़मूनों में इस सहाफी ने शिवाजी के ऊपर सख्त तनक़ीद की और अपने नज़रिनों को सच्चाई
से रू बरू करवाया. लेकिन इस सच्चाई से शिव
सैनिक, मराठा अवाम और हिन्दू अवाम का वो तपका जो शिवाजी को कामिल हुकुमरान तसव्वुर
करता है खासे खफा दिखे. ये सहाफी अपने सभी
नाक़दीन नज़रीनों से गुज़ारिश करेगा की उसका मकसद सच्चाई सामने लाना था और किसी भी अवाम
की दिल आज़ारी करना नहीं था. उस कालिख को आप
लोगो के दिलों दिमाग से हटाना था जो बरसों से आपके दिल पे छाई हुई थी और आप उस ही को
सच्चाई समझ कर गुमराही के अंधेरों में भटक रहे थे.
यहाँ
ये सहाफी बताता चले की जिस तरह से आज तमाम हिन्दू दहशतगर्द शिवाजी के नाम का सहारा
ले कर मुस्लिम समाज में खौफ और देहशत पैदा करते हैं उससे तो इस सहाफी के शिवाजी के
लिए लिखे हुए गुजिस्ता तमाम मज़ामीन सही साबित होतें हैं. क्योंकि अगर शिवाजी असल में मुस्लिम दुश्मन थे जिस
तरह से आज मुसलमानों का खात्मा करने के लिए हिन्दू दहशतगर्द शिवाजी का नाम लेते हैं,
तो जो बात ये सहाफी लिखता है वो सही और दुरुस्त है. और अगर शिवाजी एक इन्साफ पसंद बगैर किसी तफरीक के
अवाम के सभी हिस्सों की नुमाइंदगी के पेकर और मुआफ़िक थे; तो शिव सैनिकों और शिव सेना
के सरबराह को ऐसे दहशतगर्दों को सख्त हिदायत देनी चाहिए के आप अपने दहशतगर्दाना अमलियात
में मुस्लिम सामाज के क़त्ल और ख़ूंरेज़ में इस्लाम को ख़त्म करने के अज़्म में शिवाजी जैसे
आला दर्जे के हाकिम का नाम काहे को लेते हो.
उनके अंदर समाज के किसी भी हिस्से के लिए आलूद और ज़हर नहीं था जो तुम्हारे अंदर
भरा हुआ है.
जिस
तरह से तिलिंगाना भाजपा का वो कानून साज़ जिसकी रगो में खून की जगह इस्लाम और मुसलमानों
के लिए नफरत का ज़हर दौड़ रहा है वो पहले शिवाजी की मिसाल देता है की जिस तरह से हिन्दू
अवाम के तहफ़्फ़ुज़ और मुसलमानो को ख़त्म करने के लिए शिवाजी महारज उठ खड़े हुए थे तो आज
हिन्दुस्तान में हिन्दू इत्मीनान और सुकून से जी सकता है, आगे वो कहता है अगर शिवाजी महाराज के जैसे हर हिन्दू जाग उठा तो हिन्दुस्तान से मुस्लिमों और इस्लाम का खात्मा
हो जाएगा. फिर वो अज़्म करता है "इस देश
का हर बच्चा सिया राम कहेगा, इस देव भूमि पे नहीं इस्लाम रहेगा".
अगर
इस तरह की ज़हरीली तक़रीर और मुत्तसिब प्रोग्राम के बाद भी कोई शिव सैनिक, शिवाजी के
जानिबदार और शिव सेना सरबराह की ज़ुबान पे ताला लगा रहता है और कुछ नहीं बोल पाते तो
साबित होता है की शिवाजी भी एक दहशगर्द, आलूद और ज़हरीली ज़ेहनियत वाले हाकिम थे जो मुस्लिम
अवाम की खून रेज़ी करते थे. अगर वो बात सच्ची
नहीं है और कोई भी दहशतगर्द हिन्दू नौजवानों में उनके नाम से ज़हर भरने का काम कर रहा
है तो शिव सेना के सरबराह सख्त अलफ़ाज़ में ऐसे प्रोग्राम की मज़म्मत काहे को नहीं करते
हैं. गलतबयानी और गैर जवाबदार हिकमते अमली
पे इस बात को काहे को अवाम के सामने नहीं लाते की शिवाजी एक इन्साफ पंसद हाकिम थे और
उनके हुकूमते खानी में अवाम के सभी दर्जे को बराबरी के मौके फ़राहम थे.
ये
सहाफी जब सियासी हलकों में सियसतदांओं के साथ काम करता था, कहने को जमात का आम तस्सव्वुर
मुसलमानों में सेक्युलर बना रखा था और अपने आपको मुस्लिम मुहाफ़िज़ दिखाती थी. लेकिन उस सियासी जमात के रकूनों और उस सियासत दान
के बीच आलमगीर ओरग़ज़ेब की दुख्तर की निस्बत से एक फरेब और झूट बोहोत आम था. उस फरेब को फुला देशपांडे जैसे मराठी मुसन्निफ़ भी
खूब हवा देते फिरते थे उनकी कैसेट और वीडियो शाया की जाती और पार्टी मीटिंगों में उसको
दिखाया जाता था. वो ये की औरंगज़ेब की दुख्तर
दिल ही दिल में शिवाजी के फ़रज़न्द संभाजी को चाहती थी और मोहब्बत करती थी उनसे निकाह
करना चाहती थी, लेकिन ये बात उन्होंने शर्म और हया की मानिंद किसी को नहीं बताई. आगे वो मुसन्निफ़ कहता है लेकिन संभाजी उसको नहीं
चाहता था वो एक तरफ़ा मोहब्बत सिर्फ औरंगज़ेब की दुख्तर की तरफ से ही थी. और झूट की इस दूकान में वो मुसन्निफ़ कहता है ये
बात जब संभाजी को औरंगज़ेब ने फ़ासी दी और उनकी दुख्तर के इंतेक़ाल के बाद पता चली. अब यहाँ पे भी ऐसी किसी भी फरेबी घडी हुई कहानी
की कोई तारीख़ी हकीकत इस सहाफी को नहीं मिली है.
दूसरी बात अगर औरंगज़ेब की दुख्तर शिवाजी के फ़रज़न्द संभाजी से दिल ही दिल में
मोहब्बत करती थी लेकिन वो नहीं करते थे तो मतलब बात चीत का सिलसिला दोनों में था. यहाँ दो बातें हैं या तो दिल ही दिल में मोहब्बत करने वाली बात झूटी है. या नहीं तो मोहब्बत वाली ही बात सिरे से झूटी है कोई
एक बात तो झूट पे मुश्तमिल है. तीसरी बात जब
दोनों फौत हो गए और औरग़ज़ेब की दुख्तर ने अपनी मोहब्बत का इज़हार किसी के सामने नहीं किया था तो इंतेक़ाल के बाद ये बात किस बिना पे मन्ज़रे आम हुई के औरगंजेब की दुख्तर संभाजी
से मोहब्बत करती थी. क्या दोनों के मरने के
बाद अजजिन्ना ने आके इस बात को मंज़रे आम किया.
इस
तरह के मुतनाज़ा झूठे वीडियो और रिकॉर्डिंग सिर्फ और सिर्फ दिखाए और सुनाये ही इसलिए
जाते थे ताके मज़ीद ज़हर और आलूद हिन्दू नौवजवानों में मुस्लिम हाकिमों और आज की पीड़ी
की मुस्लिम ख्वातीनों के खिलाफ भरा जा सके.
जब औरग़ज़ेब जैसे जलील क़द्र और वली सिफ़त बादशाह और हाकिम की दुख्तर एक हिन्दू
राजा के बेटे को मोहब्बत कर सकती है तो आज के दौर में हम भी वैसा ही करेंगें.
फिर
औरग़ज़ेब की निस्बत से और बोहोत से झूट फैलाये जाते हैं की वो एक अय्याश, बदकार और ज़ालिम
बादशाह थे. उन्होंने अपने भाई का क़त्ल और वालिद
को कैद किया. वालिद की कैद और भाई का क़त्ल
ये सही है बिलकुल सही है, लेकिन मसले की नोय्यत और तशरीह गलत तरह से पेश की जाती है
जिसकी वजह से औरग़ज़ेब ज़ालिम और बदकार दिखने लगतें हैं. जबकि वो एक वतन परस्त और कौम के वफादार हाकिम थे. जबकि दारा शिको एक फहाश, शराबी और अय्याश फितरत
था. और वो हाकिमे हिन्द बनाना चाहता था उसने अपने वालिद को भी अपने जाल में फसा लिया
था. औरंगज़ेब ये हरगिज़ नहीं चाहते थे की जिस
वतन की मट्टी को उनके आबो अजदाद ने अपने खून से सींचा है उस वतन की बादशाहत पे एक ऐसा
इंसान गद्दी नशीन हो जो माले गनीमत और वतन के सरकारी ख़ज़ाने को अपने अय्याशी और शराब
खाने, जूए खाने की ज़ीनत बना दे.
दूसरी
बात एक औरंगज़ेब को फ़िर्क़ापरस्त हिन्दू शिद्दतपसंद
ज़ेहनियत मंज़रे आम करतें हैं जबकि सियासत और गद्दी ऐसी शराब है जिसके नशे में डूब के
आम तोर पे भाई भाई का कातिल बन ही जाता है.
रामायण से लेकर महाभारत फिर दिगर हिन्दू राजाओं में कपट, धोका दे कर मुल्क की
गद्दी हासिल करने की भरपूर रिवायतें मौजूद हैं.
जो १९४७ के बाद भी आज़ाद भारत में साबित हुई के किस तरह अपना वोट बैंक एक ख़ास
तपके से खसकते देख अपने ही बेटे की बलि ली गई.
लेकिन ओरंगजेब ने अपने ज़ाति नफे के लिए नहीं बल्कि मुल्क की फलाह और बहबूती
के लिए भाई का क़तल किया था.
मज़मून
का तब्सिरा करने के बाद क्या शिवाजी के वंशज, शिव सेना के सरबराह या शिव सैनिक इतनी
कूव्वत और ताक़त रखतें हैं की दहशतगर्दों की जमात को शिवाजी की निस्बत से फैलाये जाने
वाले झूट, फरेब पे उनको ललकार सकें और उनको
सख्त हिदायत दे सकें की शिवाजी एक इन्साफ पसनद, ग़ैर फ़िर्क़ापरस्त हाकिम थे. उनके फौज का सिपेहसालार, खानसामा, मौसिकी वाला और
दिगर आला ओहदेदार मुस्लिम ही थे. फिर कैसे
शिवाजी मुसलमानों के क़ातिल और मुस्लिम दुश्मन हो गए. और अगर वो मुस्लिम दुश्मन थे तो इस सहाफी के मज़मून
पे किसी भी शिव सैनिक को एतेराज़ नहीं होना चाहिए.
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