अज़ीज़ नाज़रीन और मेरे हम ख्याल दोस्तों,
जब से हुकूमते हिन्द पे दहशतगर्दों का सियाह अक्स नुमाया
हुआ है और सुबा ए उत्तर प्रदेश पे ज़ाफ़रानी साधू नियोगी दहशतगर्द का कब्ज़ा हुआ है, तब से मुल्क के हालात तशवीशनाक होते चले जा रहे हैं.
मुल्क के अवाम के लिए ज़रकारिवाज़बंदी (नोट बंदी), मेह्गाई, जी.अस.टी., फ़िरक़ापरस्ती, हिन्दू दहशतगर्दी,
तास्सुरात व ख्यालात का इज़हार करने की आज़ादी जैसे मामलों में दहशतगर्दों और तानाशाही हुकुमरान की हिकमते अमली तबाहकुन साबित हुई मज़ीद अकलियतों के लिए (ख़ास मुसलमानों) से उनके जीने का हक़, इन्साफ का हक़ जैसे हुकूक की ज़बरदस्त हक़तल्फ़ी हुई है. और एवानों में जमुहरीयत का क़त्ल देखने को मिला.
यहाँ तक की सहाफत की तक़दीर भी २०१४ के बाद आहिस्ता आहिस्ता अंधकार की जानिब गामज़न हो कर असली सहाफिओं की हक़ बयानी और सच्ची ख़बरें रूह पोश गई.
अब जो भी ख़बरें मन्ज़रे आम पे आती हैं वो या तो पेड न्यूज़ होती हैं जिनमे मोदी हुकूमत, ज़ाफ़रानी इन्तेज़ामियाँ, बीजेपी या भारतीय फ़ौज के लिए कसीदे लिखे हुए होते हैं या झूट, फरेब गलतबयानी पे मुश्तमिल एक रस्म अल ख़त या महज़ कहानी. जुलाई २०१८ से लेकर हाल ही में २६ जनवरी २०१९ के रोज़ तक कश्मीर में सहाफिओं पे ३ – ४ बार हुए फौजी हमले इस बात की दलील हैं की मोदी हुकूमत हक़ बयानी को अपनी फौज की बन्दूक, बम, मिसाइल के ज़रिये या कानून साज़ों के ज़रिये कुचलना चाहती है.
जिसने मोदी रुपी तानाशाह के बदला लेने की तपिश को ना सिर्फ अवाम तक महदूत रखा बल्कि सहाफियों और कानून साज़ों को भी अपनी आगोश में ले लिया. और यहीं से शुरू होता है जमुहरियत का क़त्ल और शुरू होती है तानाशाही हुकुमरानी जमुहरियत.
इस तानाशाही जमुहरियत में अवाम को महदूत हुकूक हासिल होते हैं.
ख़ास कर के तानाशाह के खिलाफ उठने वाली किसी भी सच्ची और हक़ बयानी को कुचलना खुवाहा उसके लिए तशदुददत बिल जब्र का ही सहारा क्यों ना लेना पड़े.
कल इंतेज़ामिया अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
ने पार्लियामेंट में मुस्लिम अवाम की नुमाइंदगी करने वाले, हक़गोई की बात करने वाले, इन्साफ के लिए जद्दो जेहद करने वाले, वतन की आवाज़ हर दिल अज़ीज़ वाहिद मुस्लिम रकूने पार्लियामेंट सालारे मिल्लत जनाब असदुद्दीन ओवेसी
को तुलबा से खिताब करने के लिए बुलाया था.
असाउद्दीन ओवेसी जैसे मुस्लिम मुवाफ़ेक़त, इंसानी हुकूक, इन्साफ पसंदी की बात
करने वाले सियासतदान का अलीगढ़ में मौजूद होना हिन्दू दहशतगर्दों संघ, बीजेपी, बजरंगदल
यूनिवर्सिटी में हिन्दू दहशतगर्दों का ज़हर और आलूद भरने वाली दहशतगर्द तंज़ीम ए.बी.वी.पी.
और दीगर शिद्दत पसंद ज़ेहनियत के लिए मसला ए आबरू और विकार का मामला बन गया, फिर क्या था इन दहशतगर्दों ने बवाल
मचाना शुरू कर दिया. मुस्लिम यूनिवर्सिटी के
असद मुवाफिक तुलबा पे जब्र और मार पीट की गई.
फिर
ज़ाफ़रानी हुकूमत के नियोगी सिपाह सालार ने मुस्लिम तुलबा पे कठोर कानून राष्ट्री सुरक्षा
एक्ट लगाया और जो हिन्दू तुलबा दहशतगर्द तंज़ीम ए.बी.वी.पी. से ताल्लुक रखते थे उनको
इज़्ज़त अफ़ज़ाई से नवाज़ा. मुस्लिम तुलबाओं पे
इलज़ाम रखा गया की उन्होंने मुवाफिके पाकिस्तान और मुख़ालिफे वतन नारे लगाए. इस पसे मंज़र में ये सहाफी को इस बात को आम करने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं अगरचे मुस्लिम
तुलबा ने मुख़ालिफे वतन नारे लगाए तो काहे को लगाए, उसकी क्या ज़मीनी हक़ीक़त है, नारों
की क्या नौइय्यत है क्या वजह है. जहाँ तक इस
सहाफी की सोच और अकलमंदी कहती है भारत मुर्दाबाद और पाकिस्तान ज़िंदाबाद २०१४ के बाद
कहना कोई भी गलती नहीं है. अब अगर मोदी हुकूमत
काम मुर्दों वाले करेगी तो उसको ज़िंदा कैसे तसव्वुर किया जा सकता है. ये तो वही किस्सा हुआ २०१४ के बाद आम शेहरिओं की
हलाकत पे मुर्दे को मुर्दा बोलने पे बवाल मचा दो.
अब जो मर गया हो गया मुर्दा. मोदी हुकूमत
में ज़र्रा बरबाद हिस मौजूद होती तो वो मुरदार हुकूमत जैसे क़वानीन ना ले कर आती. अब भारत मुर्दाबाद उस नारे पे बवाल मचाना ओछा और
दिमागी दिवालिये पन को ज़ाहिर करता है.
हिन्दू
दहशतगर्दों की तंज़ीम ए.बी.वी.पी. पढ़ाई लिखाई तो करते नहीं, हिन्दू दहशतगर्दी, गुंडागर्दी का ज़हर और आलूद भरने
वाली तंज़ीम के ये दहशतगर्द आते ही यूनिवर्सिटीज को विधापीठ में तब्दील करने जहाँ दहशगर्दी,
गुंडागर्दी का अड्डा मौजूद होता है. जहाँ से
हर साल आला दर्जे के बैहतरीन गुंडे, मवाली
और दहशतगर्द पैदा हो कर निकलते हैं जो वतन का नाम बेरुन मुल्क खूब रौशन करतें हैं. हाल ही में अमेरिका में ऐसे ही भारत के कुछ १३०
धोखेबाज़ तुलबा पकडे गए. और पिछले साल एक हिन्दू
को हवाई जहाज़ में अपने पड़ोस में बैठी क्रिस्टी नाबालिग बच्ची के साथ अस्मतदरी के जुर्म
में २० साल जेल हुई.
बरोज़
बुध की शाम १३ फरवरी “इज़हारे मोहब्बत का दिन” से एक रोज़ क़ब्ल मद्रास IIT campus में भारत की नामचीन
डिग्री कोर्स एमटेक सेकंड ईयर के दो तुलबा मनोज २४ और प्रमोद कौशिक २४ एक लड़की की चाहत
को ले कर छुरे बाज़ी करते हुए आपस में भिड़ गए जिसमे मुजरिम तालिबे इल्म मनोज ने मज़लूम प्रमोद को पेट में चाकू घौंप के कई वार किये.
जिसमे प्रमोद शदीद ज़ख़्मी हो गया. दोनों हरियाणा के रहने वाले हैं। IIT हुकूमते
हिन्द की जानिब से शुरू की हुई आला दर्जे का डिग्री कोर्स है जिसको पास किये हुए तुलबा
हुकूमत के अहम् ओहदों पे सरफ़रोज़ होते हैं.
अब जिस आला दर्जे की डिग्री के तालिबों का ये आलम है की सोच और ज़ेहनियत एक मुजरिमाना
हो तो आम शहरी का तनज़ीम बीजेपी, संघ, बजरंगदल, वी.ही.पि. की वजह से और विद्यापीठ के
तालिबों का तस्सव्वुर तंज़ीम ए.बी.वी.पी. की वजह से तो सिर्फ और सिर्फ दहशतगर्दी ही
हो सकता है.
जब
अंग्रेज़ हुकरानों से आज़ादी की बात आयी तो सबसे पहले मुस्लिम और सिख अवाम आगे आया था. मुल्क के दिगर तपके में से किसी में इतनी बाजुए
कूव्वत नहीं थी के अपने हक़ के लिए ज़ालिम से लड़ाई कर सकें. उसी हिसाब से जब आज के दौर में एक तानाशाही हुकूमत
भारत के अमन पसंद अवाम, अकलियतों (ख़ास मुस्लिम, क्रिस्टी) दलितों के ऊपर ज़ुल्म और जब्र
कर रही है तो ये मुल्क के हर अमन पसंद और खुली सोच रखने वाले शहरी का अख़लाक़ी फ़र्ज़ है
की अपने हम वतनों को उस ज़ुल्म और तशद्दुत से निजात दिलवाएं.
संघ
और हिन्दू शिद्दत पसंदों की तो तवारीख रही है वो कभी भी अंग्रेज़ों के खिलाफ तहरीके
आज़ादी का हिस्सा नहीं बने और ना ही उन्होंने अज़्मे हुर्रियत के परचम को अलम्बरदार किया. बरक्स उसके जो भी आज़ादी के सिपाही थे उनके खिलाफ
अंग्रेज़ों को मुखबरी करते थे जिससे तहरीके हुर्रियत कमज़ोर हो जाए, तो आज के दौर में
संघ से जुडी हुई कोई भी तंज़ीम, बीजेपी या कोई और शिद्दत पसंद हिन्दू ज़ेहनियत एक तानाशाह
हाकिम की हुकूमत के खिलाफ कैसे आज़ादी जैसे नारों को फ़िज़ाओं में बुलंद करना पसंद कर
सकता है.
इन
संघ से जुड़े हुए अवाम को वतन की मोहब्बत नहीं है बल्कि ये लोग हाकिमों के तलवे चाटने
में यकीन रखते हैं. अगरचे वो हाकिम कल एक मुस्लिम
नुमाइंदगी के सरपरस्ती में भारत में इक़्तेदार में आया तब भी इन लोगो की चापलूसी ज़ेहनियत
रहेगी.
कुल मिला के मसले पे इस सहाफी की राये एक दम वाज़े और साफ़ है अगर तानाशाही हुकुमरान अपनी फौज और तशद्दुत के ज़ोर पे मुस्लिम अवाम की हक़तलफी करेगी उनके नौजवानों को जेलों में डालेगी तो बटवारे की आवाज़ उतनी ही शिद्दत से बुलंद होगी.
मोदी हुकूमत किसी ग़लतफहमी में ना रहे की उनके पास दुनियाँ की सबसे ताक़तवर फौज है और वो किसी भी बगावत का माकूल जवाब देने के लिए एहल है तो कश्मीर उसका सबसे बड़ा जवाब है. जिस फौज के ऊपर नाज़ है उससे आज ३० साल से ज़ाइद अर्से से मुक़ाबला जारी है.
फिर मोदी हुकूमत के ५ साल और बावजूद फौज को खुली छूट देने, ऑपरेशन आल आउट के बाद भी कश्मीरी अपना और अपने हम वतन कश्मीरी भाई और बहनों का फौजी ज़ुल्म, दहशतगर्द से दिफ़ा कर रहे हैं.
ये भारत के लिए जंग में सबसे बड़ी हार है.
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