Thursday, 9 August 2018

भावनात्मक अत्याचार


हाल ही में इस पत्रकार के एक लेख आज़ादी या खुद-शासक उससे कम नहीं है। के बाद ट्वीटर संदेश बॉक्स और फेस बुक मैसेंजर पे जैसे संदेशों की आंधी आ गई। अधिकांश संदेश संघी तत्वों या बीजेपी प्रतिनिधियों द्वारा भेजे गए थे। कुछ संदेश मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा भी भेजे गए थे, हो सकता है कि उन्होंने अपनी नकली पहचान का उपयोग किया हो या हो सकता है वो भारत के किसी राजनैतिक दल के प्रतिनिधि होंगे। 


सभी संदेशों का सारांश भारत के प्यार पर आधारित था। अधिकांश संदेशों को भावनात्मक रूप से शोषण और भावनाओं के आधार पर पेश करने की कोशिश की गई थी। "मुस्लिम भाई देशभक्त हैं, वे भारत से प्यार करते हैं, वे भारत के लिए मर जाएंगे और भारत में ही  रहेंगे, मुस्लिम भाई, भारत में पैदा हुए, और वे अपनी मातृभूमि भूमि में दफन होंगे"। एक सुमित अवस्थी का संदेश "मुस्लिम भाई वास्तव में देशभक्त हैं, यहां तक ​​कि उन्हें हिंदुओं से इस तरह के क्रूर अत्याचार का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने कभी भी उनमें से किसी को भी स्वतंत्रता या आजादी की मांग करते नहीं देखा है। वे असली देशभक्तिक हैं "। कुछ संदेशों में लोगों ने मुझे गद्दार या विद्रोही कहा लेकिन भारतीय नहीं। और मुझे नकली मुठभेड़ में गोली मार देनी चाहिए"।


इस तरह के संदेश कुछ नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की एक चाल हैं। मैं ऐसे सन्देश भेजने वालों को "भावनात्मक लिंचर्स का समूह" बोल के सम्भोदित करूंगा। वे मुसलमानों की भावनाओं का लीच कर रहे हैं और भावनात्मक आधार पर उनका शोषण कर रहे हैं। दूसरा, जो मुझे गद्दार या विद्रोही बुला रहे हैं, न कि भारतीय, तो मुझे पाखंडी भारतीय होने के बजाय एक ईमानदार विद्रोही होने पर गर्व होगा। मैं खुलेआम मुसलमानों और उनके लिए एक और मातृभूमि की आजादी की मांग कर रहा हूं, जो मेरे दिल में है वही ज़ुबान पे है, ना की मू पे राम बगल में छुरी, मैं गले लग के पीठ में खंजर नहीं खोपता हूँ। जो दिल में है वही ज़ुबान पे है. मैं आपकी सरकार और उनके विधायकों की तरह दोहरे मापदंड नहीं रखता हूं। उस नारे की तरह "सबका साथ, सबका विकास", जिसे सबका साथ गाय का विकास के रूप में बदल दिया गया है।


सही में देखा जाए तो हम मुस्लिम अभी भी गुलाम हैं और स्वतंत्रता हासिल नहीं कर पाए है, १९४७ से पहले हम ब्रिटिश लोगों के दास थे और १९४७ के बाद हम सत्तारूढ़ सरकार का दास बन गए। आजादी के ७० वर्षों के बाद भी मुसलमानों की स्थिति दलितों या जानवरों से भी बदतर है। जानवरों की सुरक्षा के लिए कानून "पशु के खिलाफ क्रूरता कानून " हैं, गाय के लिए अलग कानून हैं, लेकिन मुस्लिमों के लिए नहीं, यही वजह है जो मेरी आज़ादी  या अलग राष्ट्र की मांग को और मजबूत बनाती है।


इस कारण से मैंने इस १५ अगस्त को नहीं मनाने का संकल्प किया है, क्योंकि भारत ने १५ अगस्त को स्वतंत्रता हासिल की और स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता युद्ध के लिए मुस्लिमों के योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन मुसलमानों ने स्वतंत्रता से क्या हासिल हुआ। इसलिए भारत के सभी मुस्लिमों से भी वैसा ही करने का अनुरोध है।

English version

Emotional blackmail 

autonomousjournalist.wordpress.com/2018/08/09/emo

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