उत्तर
प्रदेश सदा से योद्धाओं क्रांतिकारिओं की कर्ण भूमि रहा है. चाहे वो काकोरी हो या मेरठ, कानपूर हो या लखनऊ या हो झांसी सभी जगह से एक से
बड़े एक क्रांतिकारिओं ने जन्म लिया है. उत्तर
प्रदेश के खून में अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने की तासीर है. और यही सभ्यता
अब आगे की जानिब बढ़ के आतंकिस्तान, लचिस्तान और रेपिस्तान से जनता को मुक्ति दिलवाएगी.
ब्रिटिश
राज के ज़ुल्म और अन्याय के खिलाफ १८५७ का ग़दर भी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से शुरू
हुआ था और अब लचिस्तान, आतंकिस्तान के ज़ुल्म, अन्याय, जातिवाद, आतंक, धार्मिक भेद भाव,
असहिष्णुता के खिलाफ जनता को आज़ादी दिलवाने के लिए भी ग़दर उत्तर प्रदेश के किसी शहर
से ही शुरू होगा, हो सकता है वो शहर मेरठ ही हो.
अब
जो नया देश बनेगा जिसका नाम होगा "नखलिस्तान", आइये इस शब्दावली नखलिस्तान की भी पूरी जानकारी
दे देतें है. रेगिस्तान जहां ज़रूरी साज सामान
का आभाव होता है, ज़मीन बंजर होती है कोई सब्ज़ा नहीं दिखाई पड़ता मीलों पानी का अभाव
होता है. ऐसे में जो मुसाफिर और तज़िर अपनी तिजारत के लिए हफ़्तों रेगिस्तान में तकलीफ
परेशानी चिलचिलाती धुप में चलते हैं ऐसे में उनको कोई ऐसी जगह मिल जाती है जो ज़रखेज़
होती है जहाँ हरी फसल लहलहाती है जहाँ पानी के चश्मे जारी रहते है, जहाँ रेगिस्तान
की गर्म और ज़हरीली हवाओं के बदले ठंडी और ख़ुशनमा हवा बह रही होती है. तो मुसाफिर और ताजिर अपना बेडा कुछ दिनों के लिए
ऐसी पुर सुकून जगह पे डाल देते है. और ज़रुरत की हर वस्तु पानी, अपने चौपायों के लिए
चारा ले कर आगे के सफर पे निकल जाते है. जहाँ पक्षी फ़िज़ाओं में गीत गाते है ऐसी जगह को कहा
जाता है "नखलिस्तान"
अब
भारत तो बन गया है आतंकिस्तान, लचिस्तान जहाँ मुस्लिम समाज को अपने धार्मिक अनुष्ठान
करने की भी पूरी इजाज़त नहीं है. हर मुस्लिम
पर्व पे कोई ना कोई बखेड़ा खड़ा किया जाता है.
इतना ही नहीं अब तो उनको नमाज़ पड़ने से रोका जा रहा है. २०१४ में मोदी की हुकूमत
आने के बाद सबसे पहले मुस्लिम समाज को दिल्ली में जुमे की नामज पड़ने से रोका गया Muslims can’t offer Namaz in Modi Rule.
उसके बाद तो ये सिलसिला आम होता चला गया दिल्ली के बाद हरयाणा में जुमे की नमाज़ से मुसलमानो को रोका गया
उत्तर प्रदेश में २०१७ में रमज़ान के महीने में तरावीह (विशेष नमाज़) और पांच टाइम की नमाज़ से मुसलमानो
को रोका गया और अब तो ईद की नमाज़ से भी नमाज़िओं को रोका जाने लगा है.
पहले ईदुल अज़हा के मौके पे गाय तथा गौ वंश की कुर्बानी
पे बवाल होता था परन्तु २०१४ से बकरों की कुर्बानी
पे भी बवाल होने लगा है. क्या ये मुसलमानो के धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप करने की साजिश नहीं है.
इस्लाम में ना तो गौ वध या गौ वंश वध पे और ना ही गौ मॉस के सेवन पे किसी भी प्रकार से बंदिश है फिर सरकार अगर मुसलमानो
की दिल आज़ारी सिर्फ हिन्दू वोट बैंक की राजनीति के लिए अगर करती है तो ये चिंता का विषय होगा.
अगर गौ हिन्दू धार्मिक आस्था का विषय है फिर भारत कैसे गौ मॉस के निर्यात में २०१४ के बाद पहला नंबर बन गया. दूसरी बात क्या गौ वंश हत्या बंदी सिर्फ चयनात्मक
है क्योंकि गोवा और नार्थ ईस्ट में तो अभी भी गौ वंश हत्या चालू है. फिर छत्तिसगड में तो बीजेपी के मंत्री और उनकी धर्म पत्नी गौ हत्या के जुर्म में जेल में है.
फिर कर्नाटक में जुलाई २०१८ में और पहले भी देश के कई हिस्सों से बजरंगदल और वि ही पि के कार्यकर्त्ता
गौ तस्करी करते पकडे
गए. दिल्ली में जुलाई २०१८ को गौ रक्षक गौ के नाम पे उगाही करते पकडे गए. इस पत्रकार को कोई गुरेज़ नहीं अगर वो अपने हाथों से गौ वध या गौ वंश वध करता है, जैसा पहले करता
आया था, और उसको गौ मॉस खाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है.
जब इस्लाम में किसी भी प्रकार से ऐसी कोई मनाई नहीं है तो सरकार को ऐसी ऊल जलूल बातों में उलझने का कोई ठोसऔचित्य
इस पत्रकार को समझमे नहीं आता हाँ अलबत्ता हिन्दू वोट बैंक की राजनीति के चलते ये सब काम किये जाते है.
इस वीडियो से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है के सब कुछ एक सोची समझी साजिश के तहत सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम समाज को पडताडित करने की नियत से हो रहा है. जिस देश में प्रोफेसरों की इतनी ज़हरीली मानसिकता होगी, उस देश की विद्यापीठों से आतंकी ही नकलेगे और हाल ही जिस तरह से यूनिवर्सिटीज पे ए.बी.वी.पी. के आतंकिओं ने हमले किये चाहे वो जवाहर लाला हो या बनारस हिन्दू या अलीगढ़ मुस्लिम या जामिया मिलिया इस्लामिआ हो सब जगह इन ए.बी.वी.पी. के आतंकिओं ने यूनिवर्सिटीज में आतंक का माहौल पैदा कर के ज़हरीली फ़िज़ा की थी उससे साफ़ ज़ाहिर
होता है के इन आतंकिओं को प्रशासनिक मदद थी या इनको आश्वासन था के तुम आतंक मचाओ हम
चुप रहेंगे. सरकारें काम करती है अपने वोट बैंक को बनाने के लिए लेकिन उसमे शामिल हो जाती है साम्प्रदाइक, आतंक और भेदभाव वाली मानसिकता.
आतंकिस्तान, लचिस्तान की गर्म और ज़हरीली हवाओं से मुसाफिर अब ऊब चुके है और वो अब तलाश कर रहे है एक "नखलिस्तान". जहाँ भारतीय ज़हर, साम्प्रदाइक मानिसकता, अन्याय, भेद भाव, जाती वाद, असहिष्णुता, आतंकवाद, पाखंडी विचारों और कार्यप्रणाली के लिए कोई जगह नहीं होगी. एक था हिंदुस्तान अब बनेगा "नखलिस्तान"
बन चूका है पाकिस्तान अब बनेगा "नखलिस्तान"
बन चूका है पाकिस्तान अब बनेगा "नखलिस्तान"
No comments:
Post a Comment