Thursday, 19 April 2018

५६ इंच छाती का कमाल हो गया न्यायलय भी देख के बेहाल हो गया


जज लोया की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया. शीर्ष कोर्ट ने इस मामले में SIT जांच की याचिका को खारिज कर दिया. इस फैसले पर कांग्रेस पार्टी ने सवाल खड़े किए हैं. गुरुवार को संवाददाता सम्मेलन कर कांग्रेस पार्टी ने कहा कि इस मामले में कई सवाल अभी भी अनसुलझे हैं.

रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि जज लोया की मौत के बाद दो और साथियों की भी मौत हुई थी. इस मामले में कई तरह के आरोप सामने आए. मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

सुरजेवाला ने कहा कि आज का दिन काफी दुखद है, जज लोया की मौत का जांच मामला काफी गंभीर था. उन्होंने कहा कि वो सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें अमित शाह का नाम आया था. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भी कई तरह के सवाल बाकी हैं. उन्होंने कई तरह के सवाल उठाए.

1.  सोहराबुद्दीन और प्रजापति के केस को 2012 में जजों का ट्रांसफर किया गया था. जज उत्पत का भी ट्रांसफर कर दिया गया था.
2.  जज लोया को 100 करोड़ रुपए की रिश्वत, एक फ्लैट देने की पेशकश की गई थी.
3.  जज लोया की मौत का हार्ट अटैक से मौत बताया गया था. लेकिन ईसीजी की रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नज़र आया था.
4.  नागपुर में उनकी सुरक्षा को हटा दिया गया था.
5.  जज लोया मुंबई से नागपुर ट्रेन के जरिए गए थे.
6.  जज लोया के नागपुर रेलभवन में रुकने का कोई रिकॉर्ड नहीं.
7.  जिस गेस्ट हाउस में जज लोया रुके हुए थे, वहां कई कमरे थे. लेकिन तीन जज उसी कमरे में ही क्यों रुके हुए थे.
8.  परिवार को जज लोया के कपड़ों में गर्दन के पास खून मिला था.
9.  पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में उनका नाम गलत लिखा गया था.
10. जज लोया की मौत के बाद दो अन्य जजों की भी मौत हुई जिस पर भी कई तरह के सवाल हैं.

उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को जवाब चाहिए. जांच से ही सब कुछ स्पष्ट हो पाएगा. लेकिन जज लोया के मामले में अब तक जांच नहीं हुई है. कोई तय नहीं कर सकता कि मौत प्राकृतिक है या नहीं. क्या केवल जजों के बयान के आधार पर अन्य दस्तावेज और संदिग्ध परिस्थितियों को दरकिनार किया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि जजों ने 164 CRPC के तहत बयान नहीं दिया, पुलिस को दिया बयान अदालत में मान्य नहीं है. उन्होंने कहा कि जांच से ही संदेह से पर्दा हट सकता है.  जज लोया के मामले को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाया.

पत्रकार जुबेर का आज के न्यायलय और न्यायिक प्रक्रिया पे ज़ोरदार हमला

न्यायलय तो अब तावाईफ़ के कोठे पे टंगी हुई पतलून हो गया है. जब चाहा बीजेपी नामक तवायफ ने न्यायलय की पतलून उतार के उसके साथ मौज की और जब चाहा उसको पतलून पहना के उसको ढँक दिया. चाहे वो उच्चत्तम न्यायलय हो या प्रदेशो का उच्च न्यायलय. जब आतंकवादीओ को जेल से रिहाई मिल रही है और एक डॉक्टर जिसने मासूम बच्चो को अपने जेब से पैसे डाल के ऑक्सीजन का इंतज़ाम कर के बचाया उसको जेल तो सोच सकते है देश किस दिशा में जा रहा है.  ११ सालों में जांच एजेंसीज ये सुनिश्चित नहीं कर पाई के असली आतंकवादी कौन है. मुस्लिम भी छूट गए हिन्दू भी छूट गए और पुलिस ने इन दोनों को ही पकड़ा था. अब सवाल ये बड़ा है क्या मुस्लिम निर्दोष थे और छूट गए तो उसका बदला बीजीपी ने हिन्दू आतंकवादीओ को छोड़ा के लिया जो के मुजरिम थे.  और जनता के सामने एक गलत सन्देश देने की कोशिश की के हिन्दू आतंकवादी नहीं होते. फिर मक्का मस्जिद का ये अकेला केस नहीं है जिसमे आतंकवादी छूट गए बल्कि २०१४ के बाद जितने भी केसेस न्यायलय के समक्ष गए उन सभी में आतंकवादीओ को छूट मिल गई.

जब एक पब्लिक नौकरशाह अपने पद की गरिमा को भूल के ऐसा काम कर डालता है जिससे उसके पद की गरिमा धूमिल होती है तो हम जैसे पत्रकारों का काम है के शब्दों का चयन वैसा ही किया जाए जैसा की उस नौकरशाह ने काम किया है.  उच्चत्तम न्यायलय और उच्च न्यायालयों को लेखक ने तवायफ के खूटे पे टंगी हुई पतलून की उपमा दी है क्योके २०१४ से जिस तरह के एक तरफा और पक्षपाती फैसले आ रहे है उससे लेखक बोहोत आहात है.  चाहे वो बॉम्बे हाई कोर्ट का पूना कंप्यूटर टेक की मर्डर में हिन्दू सेना के कार्यकर्ताओ को छोड़ने का फैसला हो और उसके ऊपर जज मरुला भटकर का ऑब्जरवेशन एक ख़ास समुदाय के लिए या फिर पंजाब एंड हैरयाणा हाई कोर्ट के फैसले में जुनेद और अन्य मुस्लिमो के हत्यारो को बेल देते वक़्त और हाई कोर्ट का ऑब्जरवेशन या फिर केरला हाई कोर्ट का हदिया के केस में उनकी मैरिज रद्द करने का फैसला उसके ऊपर एन.आई.ऐ. की जांच तो ऐसे सभी विवादित मामलो में बीजेपी नामक तवायफ ने अपनी ५६ इंच छाती खोल के न्यायलय के समक्ष दिखा दी होगी और दो तीन ठुमके लगा दिए होंगे एक तरफ़ा फैसला देने के लिए.  क्योंकि न्यायलय भी एक इंसान ही हैं कोई आसमान से उतरा हुआ फरिश्ता नहीं है जिसमे कामुक इच्छा नहीं हो जिसमे पैसे कमाने की इच्छा नहीं हो जिसमे अपने धर्म के लोगो को बचाने की इच्छा नहीं हो, न्यायलय भी एक इंसान ही हैं इसीलिए उसमे सरकार के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं है.  

१९७० के दशक तक भारतीय पुलिस सर्विसेज एक आदरणीय और इज़्ज़तदार पोस्ट मानी जाती थी अगर कोई पुलिस वाला किसी मोहल्ले में चला जाता तो उसका आदर सत्कार किया जाता था.  फिर उस समय तक अपराध भी कम होते थे और पुलिस वाले भी अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करते थे. १९७० से १९९२ आते आते पुलिस भयानक साम्प्रदाइक आग में झोंक दी गई और भ्रष्ट भी हो गई जिसकी वजह से अब कोई भी पुलिस के ऊपर विशवास नहीं करता बल्कि उसको खाकी कुत्ता कह के सम्भोदित किया जाता है. और ट्रैफिक वाले को गली का कुत्ता.  फिर अब तो पुलिस ८ साल की मासूम से सामूहिक बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में भी शामिल हो रही है. और ये एक मामला नहीं है बलात्कार के तो सेकड़ो मामले पुलिस पे दर्ज है.  

जब नीचे वाला हवलदार अपराधी मानसिकता का होगा तो उसका अफसर भी वैसा ही होगा अफसर जैसा होगा तो न्यायपालिका में बैठा जज भी वैसा ही होगा जज जैसा होगा तो हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस भी वैसा ही होगा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस जैसा होगा तो सुप्रीम कोर्ट का जज या चीफ जस्टिस वैसा ही होगा.

English Version 

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हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...