लेखक २०१०
में लेखन के छेत्र में आया था. इस छेत्र में
आने के पीछे लेखक की सोच दौलत, इज़्ज़त या शोहरत
कमाना नहीं था बल्कि पाखंड और फरेब को बे नक़ाब करना था. जिस तरह से लंगूर मीडिया और
लंगूर पत्रकार बे सर पैर की झूटी ख़बरों का संचालन कर मुस्लिम समाज को बदनाम करते थे
उस झूट का पर्दा फाश करना ही लेखक का मकसद था.
जुलाई २००६
को जब बॉम्बे लोकल में ब्लास्ट् हुए तो लंगूरों ने खूब झूटी और फरेबी खबरों का प्रसारण
कर के अपनी टी.आर.पि. को बे हद बढ़ाया. उन सभी खबरों में हिन्दू समाज का गुणगान किया
जाता और मुस्लिम समाज को बदनाम. ज़ी न्यूज़ के किशोर अजवानी उस समय के जाने माने पत्रकार
होते थे. जिनके कंधो पे सच को सांझा करने के ज़िम्मेदारी होती थी लेकिन खबरों का प्रसारण
दूषित मानसिकता के साथ कर रहे थे. एक खबर में
दो हिन्दू दोस्तों की कहानी बयान की गई एक गलती से फर्स्ट क्लास में चढ़ जाता है और
दूसरा सेकंड क्लास में. फिर कहानी को इस तरह से पेश किया के शक की कोई गुंजाइश ही नज़र
ना आये और जब फर्स्ट क्लास का दोस्त अपने सेकंड क्लास के दोस्त से ब्लास्ट होने के
महज़ तीन मिनट पहले ही मिलता है तो ‘उसको जाको
रखे साईया मार सके न कोई” वाली कहावत से जोड़ा गया और दोनों की दोस्ती को मौत भी
जुदा नहीं कर पाई और ३ मिनट पहले ही फर्स्ट क्लास वाला उतर गया, इस तरीके से तोड़ मरोड़
के पेश किया और ज़ी न्यूज़ पे दोनों की दोस्ती की मिसालें दी गई और वही दूसरी तरफ एक
कॉलर के काल को ब्रेकिंग न्यूज़ दी गई जिसमे कॉलर का नाम ना बताते हुए खबर प्रसारित
की जा रही थी के दो संदिग्ध व्यक्ति मेरे पास खड़े थे और वो काले कलर का पठानी पहने
थे. फिर अजवानी अपने दर्शको से कहते है देखिये
यहाँ पे भी एक विशेष समुदाय के ऊपर शक की सूई जा रही है और हमारे दर्शक (नाम नहीं बताया)
कह रहे है के पठानी पहने थे. अब यहाँ पे सवाल
ये उठता है जिसने कॉल किया उसकी बात कितनी सच्ची थी उसके क्या प्रमाण है. फिर ऐसी खबरों को ब्रेकिंग न्यूज़ का हैडिंग लगा
के क्या एक विशेष समुदाय के चरित्र, मान सम्मान का लंगूर बलात्कार नहीं कर रहे थे. फिर जो दो हिन्दू दोस्त थे उनकी कहानी को इस तरह
से काहे को पेश किया गया जिससे उनके ऊपर ज़र्रा बराबर शंका ना हो.
ऐसी ही झूटी
खबरों को आधार बना के राजनेता संसद और विधान सभा में मुसलमानो को बर्बाद करने के कानून
बनाते है. और पुलिस मुसलमानो के खिलाफ एक तरफ़ा कारवाही करती है. इन जैसे सभी पाखण्डिओ को नंगा करने के मकसद से ही
ये लेखक पत्रकारिता में आया है और उसको अभी तक तो काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही
है और आगे काफी कुछ सुचारू होने की उम्मीद है.
लेखक के २१
अप्रैल २०१८ की एक खबर कठुआ केस: क्रूरता
के साथ दुष्कर्म दिल्ली की फॉरेंस... पे
हमारे परम मित्र और उत्तर प्रदेश के हिंदी
अखबार के संपादक की प्रतिक्रिया आई और उन्होंने कुछ सवाल लेखक से किये पेश है उसके
कुछ अंश.
प्रश्न: जुबेर जी आप कुलभूषण जाधव को आतंकवादी कैसे करार
कर सकते हैं. फिर तो आपकी नज़र में पाकिस्तान की जेल में वर्षो बंद रहा सरबजीत सिंह
भी आतंकवादी ही था. कम से कम हमें पत्रकारिता धर्म का पालन करना चाहिए. फैसला अदालत
में बैठा जज सुनाएगा न की हम और आप.
जुबेर: बिलकुल
शायद आप मेरे आर्टिकल्स नहीं देखते हैं. मेरे पास पूरी रिपोर्ट है. कुवैत में मस्जिद
में हमला पाक में चर्च पे हमला लंदन अटैक ये सब इंडियन टेरर ग्रुप के किये हुए है.
प्रश्न: जी,
आप सही कह रहे हैं थोड़ी व्यावतता के चलते सारे लेख पड़ना मुमकिन नहीं है लेकिन कुछ एक
देख लेता हूँ. आज तक आपकी किसी लेख पर मेने टिप्पड़ी नहीं की है. खैर अपना अपना दुर्ष्टिकोण
है.
जुबेर: संतोष
जी सिर्फ दुर्ष्टिकोण नहीं बल्कि सबूत हैं जो मेने इंटरनेशनल कम्युनिटी को साँजा किये
है. क्योंकि इंडिया जुडिशरी की हालत तो आप देख ही रहे हो नहीं तो कोर्ट में मूव करता
लेकिन यकीन ही नहीं रहा जुडिशरी पे.
प्रश्न: अच्छा
लिखते है आप बधाई ऐसे हर एक मुद्दे को उठाते रहिये लेकिन देशहित सर्वोपरि होता है.
सरबजीत सिंह पर कुछ ख़ास हो तो शेयर कीजियेगा उसे समाचार पत्र और पोर्टल में प्रकाशित
करूंगा.
जुबेर: थैंक्स
बिलकुल देशहित सर्वपरि है लेकिन जब पाखंड देश
हित पे हावी हो जाए तो पत्रकार की सोच बागी हो जाती है. आप भी तो उसी नाव पे सवार हो
आप भी पत्रकार हो एक पत्रकार की कैफियत अच्छे से जानते होंगे.
तो जिस तरह का पाखंड फैलाया जाता है राजनेताओं दूआरा, मीडिया दूआरा, आर्मी के दूआरा तो इस पत्रकार का काम है उन जैसे सभी पाखण्डिओ को बे नक़क़ाब करना. जो बात आपको अपने समाज के लिए अच्छी नहीं लगती तो दुसरे समाज के लिए कैसे अच्छी हो सकती है. कठुआ में बलत्कारिओ के समर्थन में बीजेपी, वकील, हिन्दू समाज और कुछ मिडिया कर्मी आये तो क्या ऐसी किसी घटना पे वही लोग दुसरे समाज के लोगो के समर्थन में भी आते अगर लड़की हिन्दू होती.
देश के लिए मर मिटने की कस्मे खाने वाले और अपने आपको देश का सबसे बड़ा हितेषी कहने वाले जब सेना की खुफिया जानकारी पडोसी के साथ सांझा करते हो तो किसको सबसे बड़ा देश भक्त माना जाएगा. इन लोगो का देशभक्ति का पैमाना एक विवादित गाना और विवादित स्लोगन तक ही सिमित है. फिर चाहे उस गाने के पीछे आप आतंक में ही क्यों नहीं शामिल हो आप देश भक्त हो. दूसरी बात इन जैसे पाखंडी देशभक्तो के लिए तिरंगे को हाथ में ले कर हत्या बलात्कार, लूट, मार पीट जैसे किये हुए सभी गुनाह माफ़ हो जाते है.
तो ऐसी पाखंडी सोच और झूटी देश भक्ति से तो हम जैसे पत्रकारों की बागी सोच अच्छी है जो सत्य को निर्भयता के साथ अवलोकित करते है फिर देश हित की बात आये तो जान पे भी खेल जाते है.
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तो ऐसी पाखंडी सोच और झूटी देश भक्ति से तो हम जैसे पत्रकारों की बागी सोच अच्छी है जो सत्य को निर्भयता के साथ अवलोकित करते है फिर देश हित की बात आये तो जान पे भी खेल जाते है.
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