Tuesday, 24 January 2023

एक थी क़लम वाली बाई, एक है टॉनिक वाली।

अज़ीज़ नाज़रीन

एक सिनिमा थिएटर आया था "क्रांति वीर" उसमे डिम्पल कपाड़िया को सहाफ़ी बताया था।  नाना उनको क़लम वाली बाई बोल कर मुख़ातिब करते थे।  कियोंके वोह नाइन्साफ़ी के ख़िलाफ़ जंग करती थी।  अख़बार में अवाम के मसलों और तकलीफों के लिए हुकूमत और दरिंदों के ख़िलाफ़ लिखती थी।  हुकूमत उनसे घबराती थी ख़ौफ़ज़दा थी।  चौह जानिब उनकी धूम थी सब घबराते थे।  

एक हैं टॉनिक वाली बाई।  इससे हुकूमत क्या हूकूमती नुमाइंदे सब बेहयाई के सवाल कर सकतें हैं रुपए पैसों में इसको इसके ज़मीर को ख़रीद सकतें हैं।  कियोंके यह औरत बेशर्म, बेहया अपने फ़र्ज़ से ग़द्दारी करने वाली ऐसी ज़लील किरदार की हामी है, जिसको पैसे दे कर कुछ भी करवा सकतें हो।  कुछ भी मतलब समझ गए ना, हाँ कुछ भी मतलब कुछ भी ही। 

नाज़रीन जहाँ क़लम वाली बाई रातों की तारीकी में अपने पोशीदा कैमरे से हूकूमती नुमाइंदों की ग़द्दारे वतन ड्रग्स स्मगलर्स के साथ साठ गाँठ के फोटों खींच कर उनको अपने अखबार में ऐसे लोगों का परदा फाश करती थी।  वहीँ टॉनिक वाली बाई बेशर्मी की तमाम हदें पार करते हुए एक ६५-७० साल के ज़ईफ़ को टॉनिक पिला कर नौजावन बना कर वोह सब करने की आरज़ू करती है जो अपने शोहर को कभी कभी थकान की वजह से मना कर देती है।   इतना ही नहीं उस टॉनिक वाली बाई की बेशर्मी की हद तो तब हो गई जब वोह खुद ही इस बात का इंकेशाफ करती है।  में कभी कभी अपने शोहर को मना कर देती हूँ, नहीं, आज नहीं बोहोत थक गई।  लेकिन आप हैं की थकते ही नहीं हैं क्या आपको मज़ा आता है। 

बेशर्म रंग शायद ऐसी ही ओबाश  लँगूरनियों के लिए होगा।

अगोछा भी भगवा लँगूरनी भी भगवा।  मतलब वोह भी भगवा यह भी भगवा। 

नाज़रीन एक बात बताना चाहूंगा इंसान को अपने ओहदे के साथ कभी गद्दारी नहीं करनी चाहिए नहीं तो जैसा की फिल्मों और हक़ीक़ी ज़िन्दगी में रेड लाइट एरिया में पुलिस वालों को दलाली खाते हुए देखा जा सकता है और उनकी वर्दी रातों में  तवाइफ़ों की खूटियों पर टंगी देखी जा सकती हैं वैसा ही हाल होता है।  फिर ऐसे हूकूमती ओहदे पर काम करने वाले या अपने फ़र्ज़ से गद्दारी करने वालों की कोई अस्मत कोई इज़्ज़त नहीं रह जाती है।  और तभी जुर्म बढ़ता है।  कियोंके मुजरिमों को पता चल जाता है की अदलिया का फलां बिन फलां जज बिकाऊ है फलां बिन फलां इस तंज़ीम को सपोर्ट करता है।  फलां पुलिस वाला पैसे खाता है और जब सभी एक हम्माम में नंगे हैं तो बची कूची कसर लंगूर लँगूरनियाँ पूरी कर देती हैं बजाये हक़ बयानी के बजाये किसी जुर्म पर खबर चलाने के हुकूमत की चाटुकारिता शुरू कर देतें हैं।  बजाये चुभते हुए सवाल करने के उस मुद्दे को ही ग़लत रंग दे कर ऐसा पेश करते हैं जिससे मुजरिम कोई अज़ीम शख्सियत लगे और जिसके साथ जुर्म हुआ वहीँ मुजरिम दिखने लगे। 

नाथूराम गोडसे- महात्मा गाँधी

अब यह बताने की कोई ज़रुरत नहीं की तमाम लंगूर लँगूरनियाँ नाथूराम को अज़ीम आज़ादी का सिपाही तसव्वुर करती हैं और महात्मा गांधी को एक गद्दार जो भारत को तोड़ने की साजिश में शामिल थे।  उनकी हक़ बयानी और दंगों हिन्दू मुस्लिम क़त्ले आम को रोकने के लिए जो उन्होंने रोज़े रखे थे उस अमल के खिलाफ भी ग़लत बयानी की जाती है। 

आज़ाद भारत के पहले ग़द्दार, दहशतगर्द, क़ातिल, क़साई, दरिंदे नाथूराम और महात्मा गाँधी के दरमियान जंग की जाए तो इन लंगूर लँगूरनियों का झुकाव ग़द्दारी, आतंकवादी सपोर्ट में रहेगा।  तब इनके दहशतगर्दी, शिद्दतपसंदी के तमाम फ़लसफ़े बदल जायेगें।  लेकिन जहाँ बात  बुरहान वानी या अफ़ज़ल गुरू की आ जाएगी तो इनके अंदर का सोया हुआ भारत प्रेम फ़ौरन जाग उठेगा।  कियोंके अब मुक़ाबिल एक मुस्लिम हैं हिन्दू आतंकवादी नहीं।    

इनसे अफ़ज़ल गुरू, याक़ूब मेमोंन, कसाब पर अदना दर्जे की ज़हरीली ख़बरें शाया करवा लो।  आतंकवाद पर बड़ी बड़ी बातें करवा लो,  लेकिन जब शहीद हेमंत करकरे बनाम भगवा नागिन प्रज्ञा ठाकुर के दरमियान मुवाज़ना होगा तो इनका झुकाव भगवा ज़हर की जानिब ही होगा।  अगर लंगूर लँगूरनियाँ हक़ पसंदी से काम करते तो आज वोह ज़हर की किश्त सदन तक ना पहुंच पाती और यहीं से महात्मा गांधी और हेमंत करकरे साहब की शाहदत की रूह और उस अज़ीम जज़्बे का भी क़तल करने की हिकमत का आग़ाज़ होता है।    

आज बोगस और झूटी मीडिया ट्रायल की वजह से आफताब और ज़ीशान क़तल के इलज़ाम में जेल में बंद हैं।  जब की अभी तक अदालत में दोनों के ख़िलाफ़ कुछ भी साबित नहीं हुआ।  आफताब का ब्रेन मेपिंग और पॉलिग्रापघ्य टेस्ट में कुछ भी पुलिस को हाथ नहीं लगा लेकिन मीडिया ने बोल दिया था की आफताब ने श्रद्धा के ३५ टुकड़े किये हथोड़े से सर का चूरा कर दिया फिर फिर उस चूरे को हवा में उड़ा दिया तो अदालत भी बज़्ज़िन हो गई।  दूसरी बात हिन्दू मुस्लिम ज़ाविया आ गया अब ज़ाफ़रानी दबाव की आफताब को बैल नहीं मिलनी चाहिए।  

यह बात अक्सर देखने में आई है जब भी हुकूमत के ऊपर कोई आफ़त आई की लँगूरनियों ने अपने कपडे उतारे और बरहना हो कर मुद्दे को किसी और ही जानिब मोड़ दिया जिससे अवाम की तवज्जो मोदी की दरिंदगी और बीजेपी हुकूमत की नाकामी से हट कर ज़हरीली बातों पर मुतवज्जो हो जाए। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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